सठ सुधरहिं सत संगति पाई सूक्ति पर निबंध

 सठ सुधरहिं सत संगति पाई सूक्ति पर निबंध 

संकेत बिंदु- (1) रामचरितमानस के बालकांड में सत्संगति का प्रभाव (2) सुधरहिं का अर्थ (3) विभिन्न ग्रंथों में सत्संगति का महत्त्व (4) महापुरुषों की सत्संगति का प्रभाव (5) उपसंहार।

रामचरितमानस के बालकांड में सत्संगति का प्रभाव

रामचरितमानस के बालकांड में तुलसीदास सत्संगति के प्रभाव का चित्रण करते हुए कहते हैं, 'सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परसि कुधातु सुहाई।' अर्थात् दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुन्दर स्वर्ण बन जाता है।

स्वभाव से दुष्ट, धोखेबाज और मूर्ख 'सठ' (शठ) है। चालक, जालसाज, मक्कार बेईमान और कपटी भी 'सठ' है। एक स्त्री के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते हुए दूसरी स्त्री में मन रमाने वाला भी 'सठ' है।

सत्संग की व्याख्या करते हुए तुलसी कहते हैं, 'ऋषियों का दर्शन मात्र सत्संग है (तुम्हारे दरस जाहिं अघ खीसा। बड़े भाग पाइअ सत्संगा।) आगे चलकर संतों के साथ रहकर 'हरिकथा श्रवण' को सत्संग कहा है। (बिनु सतसंग न हरिकथा तेहि बिनु मोहन भाग)। एक स्थान पर संत समागम को सत्संगति कहा है। (आजु धन्य मैं धन्यअति जद्यपि सब विधि हीन। निज जन जानि मोहि प्रभु संत समागम दीन्ह।) 'संत समागम' में संत मिलन, उनके दर्शन, कथावार्ता आदि का उनसे श्रवण सम्मिलित है। योग वाशिष्ठ का भी यही कहना है, 'पूर्ण महात्मा और सज्जनों के साथ को ही सत्संग कहते हैं।' कोशकार रामचन्द्र वर्मा का मत है, 'सज्जनों, साधु-महात्मा या धर्मनिष्ठ व्यक्तियों के साथ उठना-बैठना, धर्म सम्बन्धी चर्चा करना सत्संगति है।' (मानक हिन्दी कोश)

सुधरहिं का अर्थ

'सुधरहिं' से तात्पर्य है, दोषों, विकारों आदि का उन्मूलन कर अथवा उनमें परिवर्तन लाकर स्थिति में सुधार होना। श्री संतसिंह 'पंजाबी' इसका अर्थ महिमा बढ़ने में मानते हैं, जिससे इस लोक में शोभा होती है और परलोक में गति मिलती है। (मानस की भाव प्रकाश टीका)। 'सुधरहिं' की एक शर्त है निष्कपट सत्संग। सत्संग में किंचित् भी कपट हुआ तो वैसे ही सुधार नहीं होगा जैसे लोहे और पारस के बीच में महीन कागज या कपड़ा भी हुआ तो लोहा सोना नहीं होगा।

इस प्रकार इस चौपाई का अर्थ हुआ- स्वभाव से दुष्ट, धोखेबाज, जड़ बुद्धि वाले, चालाक, जालसाज, मक्कार, बेईमान, कपटी, पर-स्त्री गामी भी सज्जनों, साधु-महात्मा या धर्मनिष्ठ व्यक्तियों के साथ उठने-बैठने या धर्म चर्चा करने से अपने दोषों और विकारों का उन्मूलन कर अपनी महिमा बढ़ाते हैं। वे न केवल इस लोक में शोभा पाते हैं बल्कि परलोक में भी उनकी गति मिलती है, स्वर्ग प्राप्ति होती है।

विभिन्न ग्रंथों में सत्संगति का महत्त्व

भर्तृहरि ने भी सत्संगति के प्रभाव का निम्न शब्दों में उल्लेख किया है-

जाड्यं धियो हरित सिञ्चति वाचि सत्यं / मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्ति / सत्संगतिः कथय किन्न करोति पुंसाम्॥ 

अर्थात् सत्संगति बुद्धि की जड़ता नष्ट करती है, वाणी में सत्य को सींचती है, मान बढ़ाती है, पाप मिटाती है, चित्त को प्रसन्नता देती है, संसार में यश फैलाती है। सत्संगति मनुष्य के लिए क्या क्या (हित) नहीं करती?

'मालविकाग्निमित्र' में कालिदास कहते हैं, 'विद्वानों की संगति में बैठकर मूर्ख भी उसी प्रकार विद्वान् बन जाता है जैसे मटमैला पानी मैल को काटने वाले निर्मली के फल के सम्पर्क से स्वच्छ हो जाता है।'

'हितोपदेश' में लिखा है- सुवर्ण के सम्बन्ध से काँच भी सुन्दर रत्न की शोभा को प्राप्त करता है, इसी प्रकार मूर्ख भी सज्जन के संसर्ग से चतुर हो जाता है।

'सठ सुधरहिं' कहकर तुलसी चुप नहीं रह गए, उन्होंने इसके लिए कुछ उदाहरण भी दिए हैं, 'बाल्मीक नारद घट जोनी' तथा 'जलचर थलचर नभचर नाना।' 'मति कीरति गति भूति भलाई।' 'जे जड़ चेतन जीव जहाना जेहि जब जतन जहाँ जेहि पाइ।'

महापुरुषों की सत्संगति का प्रभाव

एक पौराणिक कथा के अनुसार त्रेता युग के वाल्मीकि पहले रत्नाकर नामक दस्यु थे। नारद के सत्संग से उनके जीवन में परिवर्तन आया और वे तपस्वी वाल्मीकि बन गए। एकजन्म में दासीपुत्र नारद ब्रह्मर्षियों की कृपा से उच्छिष्ट सीथ प्रसादी प्राप्त कर मुनीश्वर बने। धर्म शास्त्र-रहित योनी से अगस्त्य (घट योनी) की उत्पत्ति हुई तथा शाप द्वारा जो मृत्युलोक में उत्पन्न हुए वे भी सत्संग के प्रभाव से देव और ऋषि तुल्य पूज्य बने।

जलचर, स्थलचर, नभचर, जड़ और चेतन को सत्संगति से क्रमश मति, कीरति, गति, भूति और भलाई प्राप्त हुई। राघव मत्स्य (जलचर) को सुमति उपजी। गजेन्द्र (स्थलचर) को कीर्ति मिली। नभचर (जटायु) को सद्गति मिली। (जड़ बनी) अहल्या अपने पति को प्राप्त हुई। सुग्रीव, हनुमान् आदि वानरों (चेतन) को इतनी भलाई प्राप्त हुई कि स्वयं प्रभु श्रीराम ने अपने को उनका ऋणी माना।

पुराणकाल के अनन्तर भी 'सठ सुधरहिं सत्संगति पाई' के सहस्रों उदाहरण मिलते हैं। महामूर्ख कालिदास गुरु सान्निध्य प्राप्त कर संस्कृत-साहित्य का उज्ज्वल नक्षत्र बना। महात्मा बुद्ध के सत्संग से वैशाती की नगरवधू आम्रपाली का जीवनोद्धार हुआ। ऐश्वर्य के मद में चूर चालाक, कपटी व्यभिचारी भारतीय नरेश गाँधी जी की सत्संगति से देशभक्ति की ओर मुड़े। अस्पृश्य कहलाया जाने वाला हिन्दू-वर्ग का महात्मा गाँधी के सत्संग से उद्धार हुआ। आत्म-गौरव शून्य राष्ट्रीयता की पहचान से अनभिज्ञ लाखों नवयुवक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तथा श्री माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरु जी) की सत्संगति में आकर भारतमाता के सच्चे सपूत सिद्ध हुए। वनवासी बन्धु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क से आधुनिक जीवन जीने की शैली से परिचित हुए।

धर्म-तीर्थ, पाँचों मठ, भारत में फैले स्वामी रामकृष्ण आश्रम, गुरुवर रवीन्द्रनाथ का शांति-निकेतन, पांडिचेरी में स्थित महर्षि अरविन्द आश्रम तथा अन्य अनेक धार्मिक स्थल आज भी राह से भटके, दिग्भ्रान्त और निराश प्राणियों को अपनी शरण में लेकर उनके जीवन में आमूल परिवर्तन कर रहे हैं।

कहावत है कि एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है। क्या एक 'सठ' सत्संगति को भ्रष्ट नहीं कर पाता। इसका समाधान तुलसी ने इसी चौपाई के उत्तरार्द्ध में यह कह कर किया है-

विधिवस सुजन कुसंगति परहीं।
फनिमनि सम निज गुन अनुसरहीं।

मणि सर्प के मस्तक में रहती है और विष भी। पर मणि में विष का मारक गुण नहीं आने पाता। सर्प का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती, प्रत्युत मणि विष को मारती है। इसी प्रकार सन्त यदि दुष्टों के बीच में पड़ भी जाएं, तो भी दुष्टों की दुष्टता उनमें नहीं आ पाती, दुष्टों की संगति का उन पर प्रभाव नहीं पड़ता। भक्त प्रवर प्रह्लाद का जन्म और पालन-पोषण ही नास्तिक वातावरण में हुआ था और विभीषण महाबली राक्षसराज रावण के अनुज थे। फिर भी, उन दोनों पर कुसंगति का प्रभाव नहीं पड़ा।

व्यक्ति अपने वातावरण से प्रभावित होता है, यह प्रकृति-सत्य है। शठ व्यक्ति दण्ड के भय से कुकर्म त्याग दे, पर स्वभाव से वह नहीं बदलेगा। कहावत भी प्रसिद्ध है, 'चोर चोरी से जाए, हेरा फेरी से नहीं जाता।' यह स्वभाव परिवर्तन केवल 'सत्संगति' से सम्भव है। गाँधी जी का हृदय-परिवर्तन सिद्धांत स्वभाव-परिवर्तन ही तो है। यह हृदय-परिवर्तन संतों-सज्जनों के समागम के बिना असम्भव है। 'सठ सुधरहिं' का यही मूल भाव है।

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