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रामचरित मानस की 101 कहानियां | डॉ. सुधीर दीक्षित

रामचरित मानस की 101 कहानियाँ- इसमे लेखक ने युवा पीढ़ी को कम शब्दों में रामचरितमानस के ज्ञान को प्राप्त करने के लिए लिखी है, इसे आप मात्र 1 घंटे का समय निकाल कर आसानी से पढ़ सकते हैं। लेखक (डॉ. सुधीर दीक्षित जी) ने इसमें इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि आप अध्ययन के दौरान रोचकता का अनुभव करेंगे।

इस के प्रकाशन का एकमात्र कारण ब्लॉग पाठकों को रामचरित मानस के गूढ़ ज्ञान को सरल भाषा व कम समय में प्राप्त करवाना है। जिसके रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी है। डॉ. सुधीर दीक्षित जी को सादर आभार क्योंकि उन्होंने इसके महत्व को जनसामान्य के लिए इस कृति का लेखन किया।

रामचरित मानस की 101 कहानियाँ

इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा कैसे मिली?

“कौन बनेगा करोड़पति' क्विज़ शो में अमिताभ बच्चन ने भारत की मशहूर फ़िल्म अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा से यह सवाल पूछा, 'रामायण के अनुसार हनुमान किसके लिए संजीवनी बूटी लाए थे?”

जवाब में चार विकल्प थे: सुग्रीव, लक्ष्मण, सीता और राम। पहले सोनाक्षी सिन्हा ने कहा सीता, फिर कहा राम, जबकि असल जवाब था लक्ष्मण।

इसके बाद तो सोशल मीडिया पर सोनाक्षी सिन्हा की हँसी उड़ाने वाले पैसेजों का ताता लग गया। सबकी राय थी कि सोनाक्षी सिन्हा को इस बात पर शर्म आनी चाहिए कि उन्हें इतना नहीं मालूम! ख़ास तौर पर तब, जब उनके घर का नाम रामायण था, शत्रुघ्न उनके पिता का नाम था, लव और कुश उनके भाई का नाम था, जबकि राम, लक्ष्मण और भरत उनके ताऊ थे।

बहरहाल, सोशल मीडिया पर एक ऐसा मैसेज भी आया, जो सच्चाई को उजागर करता है। इसमें सोनाक्षी सिन्हा के पिता शत्रुघ्न सिन्हा ने यह सवाल पूछा था, बच्चों को मुगलों का इतिहास पढ़ाते हो और फिर उनसे रामायण के सवाल पूछते हो, यह तो अन्याय है!

सोनाक्षी सिन्हा अकेली नहीं हैं; वे तो भारत की उस युवा पौढ़ी का प्रतीक हैं, जो विदेशी संस्कृति की चकाचौंध में अपनी ख़ुद की संस्कृति को भूल चुकी हैं।

इस प्रसंग से मेरे मन में यह पुस्तक लिखने की प्रेरणा आई... एक ऐसी पुस्तक जो रामचरित मानस की कहानियां रोचक भाषा में और संक्षेप में
बताए। आज की इंस्टैंट पीढ़ी धर्म से भी कतराती है और मोटी पुस्तकों से भी... इसलिए मेरी कोशिश गागर में सागर भरने की रही है। इस पुस्तक को एक तरह से रामचरित मानस का सार मान लें, जो संक्षेप में सारी महत्वपूर्ण जानकारी देती है।

पहले मैंने इस पुस्तक में कुछ सबक़ भी जोड़ दिए थे, लेकिन फिर मेरे बेटे ने कहा कि उन सबक़ों की वजह से पुस्तक ज़्यादा लंबी हो रही है। युवा पीढ़ी को अगर आप कोई चीज देना चाहते हैं, तो उसकी पसंद की होनी चाहिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए मैंने सबक हटा दिए हैं। तो आप इसे पढ़े, जो आपको एक घंटे में रामचरित मानस का सार बता देगी और वह सारी महत्वपूर्ण जानकारी दे देगी, जो कौन बनेगा करोड़पति के सवाल का जवाब देने के लिए चाहिए!

विषय सूची

1. ईश्वरीय संकेत
2. रामचरित मानस का महत्व

बालकाण्ड
3. नाम का प्रताप
4. कलियुग में नाम का ही महत्व है
5. रामचंद्रजी की परीक्षा
6. शिवजी का अपमान
7. शिव-पार्वती विवाह की भूमिका
8. कामदेव हुए भस्म
9. नारदजी का अहंकार
10. पुत्रकामेष्टि यज्ञ
11. रामचंद्र जी की बाल लीला
12. विश्वामित्रजी ने माँगा राम-लक्ष्मण को
13. ताड़का वध
14. अहिल्या का उद्धार
15. रामचंद्र जी-सीताजी का आकर्षण
16. सीताजी का स्वयंवर
17. जनक जी का प्रण
18. जनक जी की निराशा
19. लक्ष्मण परशुराम संवाद
20. अयोध्या आगमन

अयोध्याकाण्ड
21. रामचंद्रजी को युवराज बनाने का निर्णय
22. मंथरा और बुद्धि का फेर
23. वचन सोच समझकर दें
24. सीताजी का निर्णय
25. वनगमन
26. केवट का हठ
27. पदचिन्हों का सम्मान
28. चित्रकूट
29. परशुरामजी की पितृभक्ति
30. भरतजी पर संदेह
31. भ्रातृप्रेम
32. लक्ष्मणजी का क्रोध
33. कर्म की गति
34. सत्संग का प्रभाव
35. रामचंद्रजी का बड़प्पन
36. प्रेम का नियम
37. सेवाधर्म की कठिनता
38. देवराज इंद्र का भय
39. यथासंभव सहायता
40. खड़ाऊ सिंहासन पर

अरण्यकाण्ड
41. जयंत कौए का प्रसंग
42. स्त्री धर्म
43. दर्शन की अभिलाषा
44. शूर्पणखा प्रसंग
45. रावण की दुविधा
46. सीता जी की छायामूर्ति
47. स्वर्णमृग
48. सीताहरण
49. जटायु रावण युद्ध
50. जटायु का दाहकर्म
51. शबरी के बेर

किष्किंधाकाण्ड

52. हनुमानजी दूत बनकर मिले
53. बालि और सुग्रीव की कहानी
54. बालि वध
55. सुग्रीव का राजमोह
56. स्वयंप्रभा की सहायता
57. सम्पाती गीध से भेंट
58. सम्पाती और जटायु की कहानी
59. सम्पाती की दूर दृष्टि
60. समुद्र लाँघने की चुनौती

सुंदरकाण्ड
61. हनुमानजी की कर्मठता
62. सुरसा की परीक्षा
63. सिंहिका वध
64. लंकिनी प्रसंग
65. हनुमानजी विभीषण परिचय
66. सीताजी को रावण की धमकी
67. त्रिजटा का सपना
68. हनुमानजी सीताजी संवाद
69. अशोकवाटिका का ध्वंस
70. लंकादहन
71. मधुवन में उत्पात
72. मंदोदरी की नेक सलाह
73. मंत्रियों की चापलूसी
74. विभीषण का राजतिलक
75. समुद्र से प्रार्थना
76. रामचंद्रजी का क्रोध

लंकाकाण्ड
77. रामसेतु
78. अंगद दूत बनकर गए
79. सभासदों ने दिया अंगद को सम्मान
80. रावण के मनोबल पर चोट
81. रावण की डींगें
82. रावण के मुकुट
83. अंगद का पैर
84. काल की चाल
85. मायावी युद्ध
86. वीरघातिनी शक्ति
87. संजीवनी बूटी लाने का बीड़ा
88. कालनेमि प्रसंग
89. हनुमानजी ने उठाया पर्वत
90. भरतजी हनुमानजी प्रसंग
91. कुम्भकर्ण प्रसंग
92. कुम्भकर्ण वध
93. जाम्बवान का पराक्रम
94. मेघनाद वध
95. रावण लक्ष्मण युद्ध
96. रावण का यज्ञ
97. विभीषण-रावण युद्ध
98. विभीषण ने खोला अमृतकुंड का भेद
99. अग्नि परीक्षा
100. अमृतवर्षा
101. पुष्पक विमान

1. ईश्वरीय संकेत

रामचरित मानस कैसे लिखी गई, इसके पीछे भी एक कहानी है और वह कहानी काफ़ी दिलचस्प है। एक दिन तुलसीदास जी के मन में रामकथा लिखने का विचार आया। अगले ही दिन वे वाराणसी के प्रहलाद घाट पर गए और संस्कृत में रामकथा लिखने लगे। लेकिन उनके साथ एक विचित्र घटना होती थी। वे दिन में जितनी भी कविताएं लिखते थे, वे सभी रात को ग़ायब हो जाती थीं। उन्होंने अपनी कविताओं को सुरक्षित रखने की बहुत कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद रात को कविताएं ग़ायब हो जाती थीं। यह सिलसिला आठ दिनों तक चलता रहा।

आठवीं रात को तुलसीदासजी को एक सपना आया और यह राज़ खुला कि उनका संस्कृत में लिखा काव्य रात को ग़ायब क्‍यों हो जाता था। सपने में तुलसीदासजी को भगवान शिव दिखे, जिनका मशहूर काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में है। शिवजी ने तुलसीदास जी को आदेश दिया कि वे संस्कृत के बजाय अवधी में रामकथा लिखें। सपने में उन्होंने यह भी कहा कि वे यह काम वाराणसी में रहकर न करें, बल्कि अयोध्या जाकर करें। ईश्वर के आदेश को मानकर तुलसीदासजी अयोध्या गए। वहां उन्होंने चैत्र मास शुक्ल पक्ष नवमी को अवधी में रामचरित मानस लिखना शुरू किया और इसे लिखने में उन्हें ढाई साल लग गए।

2. रामचरित मानस का महत्व

रामचरित मानस के बारे में यह किंवद्दंती भी बहुत लोकप्रिय है। वाराणसी के संस्कृत विद्वान और पंडित तुलसीदासजी के रामचरित मानस के कट्टर आलोचक थे। उनका आरोप था कि तुलसीदासजी ने कोई बड़ा काम नहीं किया है। उन्होंने तो बस वाल्मीकिजी की संस्कृत रामायण का अवधी में संक्षिप्त अनुवाद किया है। विद्वानों ने रामचरित मानस को महत्वहीन साबित करने के लिए एक परीक्षा ली। रात को विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में रामचरित मानस को संस्कृत ग्रंथों के नीचे दबाकर ताला लगा दिया गया। कसौटी यह थी कि अगर रामचरित मानस में सचमुच दम होगा, तो ईश्वर की कृपा से यह ऊपर आ जाएगा। सुबह जब दरवाज़ा खुला, तो सभी भौंचक्के रह गए, क्यांकि रामचरित मानस सभी ग्रंथों के ऊपर रखा मिला और उस पर सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌ भी लिखा मिला।

बालकाण्ड

3. नाम का प्रताप

तुलसीदासजी ने पुस्तक के प्रारंभ में आदिकवि श्री वाल्मीकिजी का स्मरण किया है, जिन्होंने संस्कृत में रामायण लिखी थी। उन्होंने लिखा है कि वाल्मीकिजी राम नाम के प्रताप को जानते हैं, क्योंकि वे उलटा नाम 'मरा, मरा,' जपकर पवित्र हो गए। राम का नाम अपने आप में विपुल संपदा है और सहस्त्र नामों के समान हैं।

वाल्मीकिजी का मूल नाम रत्नाकर था। वे डाकू थे, जो संतों और राजाओं से धन चुराते थे। एक बार उन्होंने नारद मुनि को लूटने की कोशिश की, तो उन्होंने पूछा कि तुम लोगों को क्‍यों लूटते हो। रत्नाकर ने जवाब दिया कि वह यह काम परिवार का पेट पालने के लिए करता है। तब नारद मुनि ने पूछा कि जिस परिवार की ख़ातिर तुम यह पाप कर रहे हो, क्या वे लोग तुम्हारे पाप के परिणामों में भागीदार बनेंगे। रत्नाकर डाकू ने जब परिवार वालों से पूछा, तो सभी ने इंकार कर दिया कि वे पाप के भागीदार नहीं बनेंगे। इस पर रत्नाकर डाकू का मोहभंग हो गया और उनका हृदय परिवर्तन हो गया।

तब नारद मुनि ने रल्नाकर को राम नाम का मंत्र दिया और कहा कि इसके जाप से वे संसार के सबसे अमीर आदमी बन जाएंगे। रत्नाकर के मुंह से राम नाम निकल नहीं रहा था, इसलिए नारदजी ने कहा कि वे “मरा, मरा! शब्द का उच्चारण करें, अर्थात मैं कष्टों से मरा। नारदजी ने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि डाकू “मरा” शब्द का उच्चारण आसानी से कर सकता था। बार बार जपने से वह राम, राम की ध्वनि में बदल गया और उनका उद्धार हुआ। इस मंत्र को बोलते बोलते रत्नाकर राम में ऐसे रमे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब वे तपस्या में लीन हो गए और उनके शरीर पर दीमकों ने बांबी बना ली। रत्नाकर की तपस्या से प्रसन्‍न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें दर्शन दिए और इनके शरीर की बांबी को देखकर वाल्मीकि नाम दिया। ब्रह्माजी ने ही उन्हें रामायण का सृजन करने की प्रेरणा दी।

4. कलियुग में नाम का ही महत्व है

तुलसीदासजी राम नाम की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि कलियुग में नाम का महत्व सबसे ज़्यादा है। सतयुग में भगवान ध्यान से प्रसन्न होते थे। त्रेता युग में भगवान यज्ञ से प्रसन्‍न होते थे। द्वापर युग में भगवान पूजन से प्रसन्‍न होते थे। किंतु कलियुग तो घोर पाप का युग है, जिसमें मनुष्य का मन पाप के समुद्र में मछली की तरह रहता है। इसलिए कलियुग में केवल नाम ही कल्पवृक्ष है, जिसे लेते ही संसार के समस्त दुख दूर हो जाते हैं और राम नाम के जप से तो हर इच्छा पूरी हो जाती है।

5. रामचंद्रजी की परीक्षा

रामचरित मानस के शुरू में शिव पार्वती के प्रसंग विस्तार से बताए गए हैं। एक बार शिवजी सती के साथ जंगल में घूम रहे थे। यह तब की बात थी, जब रावण सीताजी का हरण करके ले गया था और राम उनके वियोग में व्याकुल थे। तब शिवजी ने रामचंद्रजी के दर्शन किए और उ्हें प्रणाम करके बहुत ख़ुश हुए। सती को संदेह हुआ कि पत्नी के विरह में व्याकुल यह साधारण इंसान भगवान विष्णु का अवतार कैसे हो सकता है। तब शिवजी बोले कि अगर तुम्हें मेरी बात पर शक है, तो तुम स्वयं परीक्षा ले लो, ताकि तुम्हारा भ्रम दूर हो जाए।

सती ने सीताजी का रूप बनाकर परीक्षा ली। रामचंद्रजी सती के बनावटी वेष से भ्रमित नहीं हुए और सती को प्रणाम करके बोले, शिवजी कहां हैं? आप यहां वन में अकेली कैसे घूम रही हैं? सती उनकी परीक्षा ले रही हैं, यह जानकर रामचंद्रजी ने उन्हें हर तरफ़ राम सीता लक्ष्मण की छवियों के दर्शन दिखाए, ताकि उनका संदेह दूर हो जाए। पूरी तरह संतुष्ट होकर सती शिवजी के पास लौटीं। उन्होंने शिवजी से यह बात छिपा ली कि वे सीताजी के वेष में रामचंद्रजी के सामने गई थीं। जब शिवजी ने पूछा कि क्या परीक्षा ली, तो सती ने झूठ बोल दिया कि मैंने तो कोई परीक्षा नहीं ली, बस प्रणाम करके चली आई। त्रिलोकपति शिवजी ने ध्यान करके यह पता लगा लिया कि सती ने सीताजी का वेश बनाया था। वे सोचने लगे कि सीताजी का वेष बनाने के कारण अब मैं सती से शारीरिक संपर्क कैसे रख सकता हूं, क्योंकि ऐसा करने पर भक्ति मार्ग लुप्त हो जाएगा! इस कारण उन्होंने संकल्प लिया कि सती के इस शरीर से पति पत्नी के रूप में मेरी भेंट नहीं हो सकती।

6. शिवजी का अपमान

जब सती ने देवताओं को विमान में बैठकर आसमान में जाते देखा, तो उन्होंने शिवजी से पूछा कि ये सारे देवता कहां जा रहे हैं। शिवजी ने बताया कि दक्ष प्रजापति यज्ञ करा रहे हैं और ये देवता वहीं जा रहे हैं। वे शिवजी से बोलीं कि मेरे पिता के घर इतना बड़ा उत्सव है, तो क्या मैं उसे देखने जाऊं? शिवजी ने कहा कि उन्होंने न्योता नहीं भेजा है। हे सती, दक्ष ने अपनी सब लड़कियों को बुलाया है, केवल तुम्हें ही नहीं बुलाया। शिवजी ने सती से कहा कि बिना बुलाए जाओगी, तो शील स्नेह और मान मर्यादा नहीं रहेगी। लेकिन सती मायके के मोह और विधि के विधान से विवश थीं, इसलिए उन्होंने शिवजी की बात नहीं मानी और यज्ञ में चली गईं। उनके पिता दक्ष ने उन्हें देखकर मुंह फेर लिया और हालचाल भी नहीं पूछे। सती को यज्ञ में शिवजी का भाग कहीं दिखाई नहीं दिया। पति का अपमान देखकर सती क्रोधित हो गईं और उन्होंने योगाग्नि में अपना शरीर भस्म कर डाला। सती के मरण के बाद शिवजी के गणों ने यज्ञ का विध्वंस कर दिया।

7. शिव-पार्वती विवाह की भूमिका

यज्ञ में प्राणोत्सर्ग के समय सती ने भगवान हरि से यह वर मांगा कि मेरा जन्म-जन्मांतर तक शिवजी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण शरीर भस्म होने के बाद उनका जन्म हिमाचल के घर पर उमा यानी पार्वती के रूप में हुआ। एक बार नारदजी घूमते हुए हिमाचल के घर पहुचे। हिमाचल ने नारदजी से कहा कि आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, अतः आप इस कन्या का भविष्य बताएं। नारदजी बोले कि कन्या की रेखाओं से यह स्पष्ट है कि इसे गुणहीन, मानहीन, उदासीन, लापरवाह, योगी, जटाधारी, नंगा और अमंगल वेष वाला मिलेगा। यह सुनकर पार्वती के माता पिता हिमाचल और मैना दोनों को भारी दुख हुआ, जबकि पार्वतीजी बहुत ख़ुश हुईं, क्योंकि वे जानती थीं कि ये सारे अवगुण तो शिवजी की ओर संकेत करते हैं।

8. कामदेव हुए भस्म

तारक नाम के असुर ने जब देवताओं को हरा दिया, तो वे ब्रह्माजी के पास जाकर गिड़गिड़ाने लगे। तब ब्रह्माजी ने उपाय बताया कि यह दैत्य शिवजी के वीर्य से उत्पन्न पुत्र से ही मरेगा।

यह पता चलने के बाद देवताओं ने विचार किया कि शिवजी से पुत्र कैसे उत्पन्न कराएं। सती ने देहत्याग कर दिया था और हिमाचल के घर पैदा हो गई थीं, इसलिए सबसे आसान उपाय यह था कि उनकी शादी शिवजी से करा दी जाए। समस्या यह थी कि शिवजी समाधि लगाकर बैठे हुए थे। उनकी समाधि को तोड़ना काफ़ी मुश्किल काम था और इसके लिए देवताओं ने कामदेव से अनुरोध किया कि वह शिवजी की समाधि भंग करदे। कामदेव ने फूलों के पांच पैने बाण मारकर शिवजी की समाधि तो तोड़ दी, लेकिन शिवजी को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को तुरंत भस्म कर दिया। जब कामदेव की पत्नी रति शिवजी के पास पहुचकर रोई, तो शिवजी को दया आ गई। उन्होंने रति से कहा कि कामदेव का नाम अब से अनंग होगा और वह बिना शरीर के ही सबको व्यापेगा। उन्होंने आगे यह भी कहा कि जब यदुवंश में श्रीकृष्ण का अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र प्रद्युम्न के रूप में पैदा होगा। कामदेव के भस्म होने के बाद देवाताओं ने शिवजी से शादी करने का आग्रह किया। शिव पार्वती विवाह के बाद छह मुख वाले स्वामिकार्तिक का जन्म हुआ, जिन्होंने युद्ध में तारकासुर को मार डाला।

9. नारदजी का अहंकार

रामचंद्रजी ने अवतार क्‍यों लिया, इसकी कई कहानियां हैं, जिनमें से एक यह है।
एक बार नारद मुनि के तप से इंद्र घबरा गए और कामदेव से बोले कि वह नारद के तप को भंग करे। जब कामदेव ऐसा नहीं कर पाया, तो नारदजी ने शिवजी के सामने अहंकार से बताया कि उन्होंने काम को जीत लिया है। तब शिवजी ने उन्हें यह सलाह दी कि यह बात विष्णुजी को मत बताना। पर नारदजी को तो अहंकार था, इसलिए उन्होंने विष्णुजी को यह कहानी सुना दी। भगवान ने सोचा कि मेरे भक्त नारद के मन में अहंकार आ गया है, अगर इसके अहंकार का नाश नहीं किया, तो इसका सर्वनाश हो जाएगा।

इसलिए विष्णुजी ने एक सुंदर नगर रचा और विश्वमोहिनी नामक रूपवती कन्या भी बनाई, जिसके स्वयंवर में असंख्य राजा गए। नारदजी भी विश्वमोहिनी पर मोहित हो गए। नारदजी जानते थे कि वे सुंदर नहीं हैं, लेकिन वे उस कन्या पर बहुत ज़्यादा मोहित थे। उन्होंने विष्णुजी से प्रार्थना की, हे भगवान, अपना रूप मुझे दे दो, ताकि वह राजकुमारी मेरे ही गले में वरमाला डाले। इस पर विष्णुजी बोले, “जिसमें आपका परम हित होगा, हम वही काम करेंगे।' जिस तरह रोगी कोई नुक़सानदेह चीज़ खाने को मांगता है, तो वैद्य उसे नहीं देता, उसी तरह ईश्वर भी अपने भक्तों को ग़लत चीज़ नहीं देता।

इसी कारण विष्णुजी ने नारद मुनि की शक्ल सुंदर न बनाकर बंदर जैसी बना दी। भगवान विष्णु भी वहां राजा के वेष में पहुचे थे और विश्वमोहिनी ने उनके गले में जयमाला डाल दी। बाद में नारदजी ने जब जल में अपनी छवि देखी, तो उन्हें दिखाई दिया कि विष्णुजी ने उनका चेहरा बंदर जैसा बना दिया था। इस बात पर क्रोधित होकर नारदजी ने भगवान को शाप दिया कि आपने हमारा रूप बंदर जैसा बनाया है, इसलिए बंदर ही आपकी सहायता करेंगे। मैं जिस स्त्री को चाहता था, उससे आपने मेरा वियोग कराया, इसलिए आपको भी स्त्री के वियोग में दुखी होना पड़ेगा।

अरण्यकाण्ड में नारदजी ने रामचंद्रजी से पूछा कि आपने किस कारण विश्वमोहिनी से मेरी शादी नहीं होने दी? तब प्रभु ने कहा कि मैं सदा अपने सच्चे भक्तों की वैसे ही रखवाली करता हूँ, जैसे माता बालक की रक्षा करती है। मेरा भक्त केवल मेरे भरोसे रहता है, इसलिए उसे सभी तरह के कष्टों से बचाने की ज़िम्मेदारी भी मुझ पर रहती है। काम, क्रोध, लोभ और मद तो मोह यानी अज्ञान की प्रबल सेना है। हे नारद, इसीलिए मैंने आपको विवाह करने से रोका था।

10. पुत्रकामेष्टि यज्ञ

राजा दशरथ के पुत्र नहीं थे, जिस कारण वे चिंतित रहते थे। उचित समय आने पर राजगुरु वशिष्ठजी ने राजा को सलाह दी कि वे संतान के लिए ऋष्यश्रृंग मुनि से पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराएं। यज्ञ पूरा होने पर अग्निदेव हाथ में खीर लेकर प्रकट हुए और दशरथ से बोले कि वे इसे उनकी रानियों में बाँट दें। पहली रानी कौसल्या, दूसरी रानी कैकेयी और तीसरी रानी सुमित्रा। राजा ने तीनों को यह प्रसाद दे दिया। इसके बाद चैत्र मास की शुक्ल पक्ष को नवमी के दिन अभिजित मुहूर्त में श्रीरामजी का जन्म हुआ। कैकेयी ने भरतजी को जन्म दिया। सुमित्रा ने लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी नामक जुड़वां भाइयों को जन्म दिया।

11. रामचंद्रजी की बाललीला

जब रामचंद्रजी बालक थे, तो माता कौसल्या ने उन्हें नहलाकर पालने में सुला दिया और पूजा करने लगीं। फिर जब वे रसोई में जाकर लौटीं, तो उन्होंने देखा कि उनका पुत्र पूजाघर में बैठा हुआ था और भगवान का भोग खा रहा था। कौसल्याजी डर गईं कि अभी कुछ देर पहले ही तो इसे पालने में सुलाकर आई थी, यहां किसने लाकर बैठा दिया? वे घबराकर पालने के पास पहुंचीं, तो उन्होंने रामचंद्रजी को वहीं सोया देखा। फिर पूजाघर लौटने पर उन्होंने देखा कि रामचंद्रजी वहां बैठकर भगवान का भोग खा रहे हैं। रामचंद्रजी के दो जगहों पर होने की लीला देखकर माता कौसल्या घबरा गईं। तब रामचंद्रजी ने उन्हें अपना अखंड अद्भुत रूप दिखलाया, जिसे देखने के बाद कौसल्याजी ने कहा कि हे प्रभु, मुझे आपकी माया अब कभी न व्यापे! इसके बाद राम ने बाललीलाएं तो कीं, लेकिन माता को अपना विराट स्वरूप दोबारा कभी नहीं दिखाया।

12. विश्वामित्रजी ने माँगा राम-लक्ष्मण को

राक्षस ब्रह्मर्षि विश्वामित्रजी के यज्ञ में विघ्न डालते थे, जिससे उनकी तपस्या में बाधा आती थी। परेशान होकर वे राजा दशरथ के दरबार में आए। उन्होने राजा दशरथ से कहा कि उनकी यज्ञ की रक्षा करे और राक्षसों का वध करने के लिए राजा राम लक्ष्मण को उनके साथ भेज दें। यह सुनकर दशरथजी का दिल कांप गया और वे हाथ जोड़कर बोले, 'मुझे बुढ़ापे में पुत्र मिले हैं, अतः इन्हें न ले जाएं। आप मेरी सेना मांगे, खज़ाना मांगें, मेरा शरीर मांगें मैं सब कुछ ख़ुशी ख़ुशी दे दूंगा, पर राम को न मांगें।!

अंत में गुरु वशिष्ठजी ने राजा को समझाया बुझाया, जिसके बाद दशरथजी ने अपने दोनों पुत्रों राम लक्ष्मण को विश्वामित्रजी के साथ भेज दिया। बाद में विश्वामित्रजी ने रामचंद्रजी को अस्त्र शस्त्र विज्ञान की शिक्षा के साथ साथ ऐसी विद्या भी सिखाई, जिससे भूख प्यास न लगे और शरीर में अतुलित बल व तेज़ का प्रकाश हो।

13. ताड़का वध

ताड़का राक्षसी और उसके पुत्र ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के यज्ञों में निरंतर बाधा डालते थे। विश्वामित्रजी ने रामचंद्रजी को आदेश दिया कि वे ताड़का को मार डालें। रामचंद्रजी हिचक रहे थे, क्योंकि वह स्त्री थी, इसलिए शुरुआत में उन्होंने उसके दोनों हाथ काट डाले, ताकि उसे सबक मिल जाए और वह भविष्य में यज्ञ में बाधा न डाले। लेकिन आसुरी शक्तियों के बल पर ताड़का अदृश्य होकर हमला करने लगी। जब ताड़का नहीं मानी, तो विश्वामित्र ने रामचंद्रजी से कहा कि राजकुमार या राजा को स्त्री पुरुष में भेद नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भेदभाव के बिना अपने कर्तव्य का पालन करें और बिना किसी संकोच के ताड़का का वध कर दें।

ताड़का में हज़ार हाथियों का बल था, क्योंकि उसके पिता सुकेतु ने संतान प्राप्ति के लिए ब्रह्माजी की तपस्या की थी और ताड़का के बली होने का वर मांगा था। ताड़का वध के बारे में पता चलते ही मारीच और सुबाहु नाम के राक्षस सेना लेकर आ गए। लक्ष्मणजी ने राक्षस सेना का संहार किया, जबकि रामचंद्रजी ने मारीच और सुबाहु से युद्ध किया। रामचंद्रजी ने सुबाहु को मार डाला और मारीच को ऐसा बाण मारा, जिससे वह सौ योजन (लगभग 800 मील) दूर समुद्र के पार जा गिरा। इस तरह रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी ने मिलकर राक्षसों का संहार किया तथा ब्राह्मणों को निर्भय कर दिया।

14. अहल्या का उद्धार

जब राम लक्ष्मण विश्वामित्रजी के साथ जा रहे थे, तो उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया, जहां कोई नहीं था, सिर्फ़ पत्थर की एक शिला थी। जब रामचंद्रजी ने विश्वामित्रजी से पूछा कि यह क्या है, तब मुनि ने इसके पीछे की कहानी बताई। उन्होंने बताया कि गौतम मुनि की पत्नी अहल्या पर इंद्र मोहित हो गए थे। अहल्या भी इंद्र के प्रति आकर्षित हो गई थीं, जिस कारण गौतम मुनि ने अहल्या को जड़ बनकर पत्थर होने का शाप दे दिया। बाद में दया करके उन्होंने यह भी कहा कि प्रभु के चरण पड़ने पर अहल्या फिर से जीवित हो जाएंगी। विश्वामित्रजी के कहने पर रामचंद्रजी ने जैसे ही उस शिला पर पैर लगाया, अहल्या सचमुच जीवित हो गईं और उनका उद्धार हुआ।

15. रामचंद्रजी-सीताजी का आकर्षण

विश्वामित्रजी रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी को सीताजी के स्वयंवर में ले गए। राजा जनक ने यह घोषणा की थी कि जो भी वीर शिवजी का धनुष तोड़ेगा, उसी के साथ सीताजी का ब्याह होगा। विवाह से पूर्व जय सीताजी गौरीपूजन के लिए जा रही थीं, तो राम ने उन्हें देखा और उनके मंगलदायक दाहिने अंग फड़कने लगे। उन्होंने सोचा कि मैने तो स्वप्न में भी कभी परायी स्त्री पर दृष्टि नहीं डाली है, फिर सीताजी को देख आकर्षण क्‍यों हो रहा है। उधर सीताजी भी रामचंद्रजी को देखने के बाद विकल होकर प्रेम के वश में हो गईं। उन्होंने मन ही मन रामचंद्रजी का वरण कर लिया, लेकिन इस चिंता में पड़ गईं कि इतने सुकुमार रघुनाथजी इतने भारी घनुष को कैसे तोड़ पाएंगे।

फिर सीताजी ने पार्वतीजी की मूर्ति के सामने प्रार्थना की कि वे उनका मनोरथ पूरा करें। पार्वतीजी के मले की माला थोड़ी खिसक गई और सीताजी ने उसे प्रसाद की तरह धारण किया। पार्वतीजी ने सीताजी को आश्वस्त किया कि तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी और तुम्हें तुम्हारा मनचाहा वर मिलेगा।

16. सीताजी का स्वयंवर

सीताजी के स्वयंवर में रामचंद्रजी को लोगों ने अलग-अलग रुप में देखा। जिसकी जैसी भावना थी, प्रभु उसे वैसे ही नज़र आए। राजा रामचंद्रजी को इस तरह देख रहे थे, मानो स्वयं वीर रस सामने खड़ा हो। कुटिल राजा रामचंद्रजी को देखकर डर रहे थे। जो राक्षस छल से वहां राजा के वेष में बैठे थे, उन्हें रामचंद्रजी प्रत्यक्ष काल के समान दिखाई दिए। उन्हें देखकर नगरवासियों की आंखों को ठंडक मिल रही थी। स्त्रियां खुश होकर उन्हें अपनी अपनी रुचि के अनुसार देख रही थीं, मानो श्रृंगार रस अनुपम मूर्ति धारण करके आ गया हो। विद्वानों को प्रभु विराट रूप में दिखाई दिए और हरिभक्तों को वे इष्टदेव के रूप में दिखाई दिए। जनक समेत रानियां उन्हें अपने बच्चे के समान देख रही थीं और योगियों को वे शांत व स्वतः प्रकाशित परम तत्व के रूप में दिख रहे थे।

और सीताजी जिस स्नेह और सुख के भाव से रामचंद्रजी को देख रही थीं, उसे तो कहा ही नहीं जा सकता,
'स्थाम ग़ौर किमि कहौं बखानी।
गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।'
इस तरह हर व्यक्ति अपने दृष्टिकोण से रामचंद्रजी को देख रहा था, जो इस बात पर निर्भर करता था कि वह ख़ुद कैसा था।

17. जनकजी का प्रण

जनकजी ने भरी सभा में यह प्रण किया कि जो भी इस धनुष को तोड़ेगा, जानकीजी बिना किसी विचार के उसका वरण कर लेंगी। शिवजी का धनुष राहु की तरह भारी और कठोर था। सुमेरु पर्वत उठाने वाला बाणासुर भी हृदय में हारकर उसकी परिक्रमा करके चला गया और कैलास पर्वत को उठाने वाला रावण भी उस सभा में पराजय को प्राप्त हुआ। धनुष को उठाना तो दूर रहा, रावण और बाणासुर इसकी कोशिश करने की भी हिम्मत नहीं कर पाए।

18. जनकजी की निराशा

धनुष तोड़कर सीताजी से ब्याह करने के लिए बहुत से राजा उतावले थे। वे सोच रहे थे कि वे सबसे पहले कोशिश कर लें, ताकि कोई दूसरा उनसे पहले यह काम न कर ले। लेकिन जब ये उतावले राजा पूरी शक्ति से धनुष को पकड़ते थे, तो वह उठता भी नहीं था। जब बहुत से राजा हार गए और कोई अन्य राजा कोशिश करने के लिए नहीं आया, तो जनकजी निराश होकर बोले, “बीर बिहीन मही मैं जानी।' यानी पृथ्वी वीरों से ख़ाली हो गई। ऐसा लगता है जैसे ब्रह्माजी ने सीताजी का विवाह लिखा ही नहीं। यदि प्रण छोड़ता हू, तो पुण्य जाता है। यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरों से शून्य है, तो प्रण करके हसी का पात्र न बनता।

तब विश्वामित्रजी ने अत्यंत प्रेम भरी वाणी में रामचंद्रजी को शिवजी का धनुष तोड़ने का आदेश दिया। सभी नगरवासियों ने देवताओं से प्रार्थना की कि यदि हमारे पुण्यों का कुछ भी प्रभाव हो, तो रामचंद्रजी यह धनुष कमल की डंडी की तरह तोड़ दें। सीताजी निवेदन कर रही थीं, है गौरी माता, मुझ पर स्नेह करके धनुष के भारीपन को कम कर दीजिए। गणेशजी, मैंने आज ही के लिए आपकी सेवा की थी। धनुष का भारीपन कम कर दीजिए। अंत में सीताजी ने कहा कि यदि मेरा स्नेह सच्चा है, तो रामचंद्रजी मुझे अवश्य ही मिलेंगे।
'जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू।
सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू।

19. लक्ष्मणपरशुराम संवाद

परशुरामजी अत्यंत पराक्रमी थे और उन्होंने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन किया था। वे बहुत बड़े शिवभक्त थे और शिव धनुष टूटने का समाचार सुनकर भरी सभा में आ गए थे। जब वे क्रोधित होकर पूछने लगे कि घनुष किसने तोड़ा, तो लक्ष्मणजी ने हसी हसी में कह दिया, धनुष पुराना था, छूते ही टूट गया। उन्होंने कहा, देवता, ब्राह्मण, भगवान के भक्त और गाय इन पर हमारे कुल में वीरता नहीं दिखाई जाती, क्योंकि इन्हें मारने से पाप लगता है और हार जाने पर अपकीर्ति होती है। इसलिए अपनी शक्ति का दर्प न दिखाएं। तब परशुरामजी ने अपना पराक्रम कहकर सुनाया।

इस पर लक्ष्मणजी बोले, हे मुनि आपके रहते आपकी प्रशंसा दूसरा कौन कर सकता है? शूरवीर तो युद्ध में शूरवीरता का काम करते हैं, ख़ुद अपनी तारीफ़ करके अपने पराक्रम का डंका नहीं बजाते हैं। लक्ष्मणजी ने कहा कि धनुष टूट गया है और आपके क्रोध करने से जुड़ नहीं जाएगा। यदि धनुष अत्यंत ही प्रिय हो तो किसी बड़े कारीगर को बुलवाकर जुड़वा लें। जब यह सुनकर परशुरामजी बहुत गुस्से में आ गए, तो रामचंद्रजी ने अपने कोमल वचनों से परशुरामजी को शांत किया। फिर परशुरामजी ने रामचंद्रजी की परीक्षा लेते हुए कहा कि राम, अब तुम यह विष्णु का धनुष लेकर इसे चढ़ाओ, ताकि मेरा संदेह मिट जाए। परशुरामजी के देने से पहले ही धनुष अपने आप रामचंद्रजी के हाथों में चला गया। तब परशुरामजी को ज्ञान हुआ कि रामचंद्रजी तो साक्षात अवतार हैं और वे उनकी जय जयकार करते हुए वहां से चले गए।

20. अयोध्या आगमन

रामचंद्रजी और सीताजी के विवाह के बाद भरतजी का विवाह माण्डवी से हुआ, लक्ष्मणजी का विवाह उर्मिला के साथ हुआ और शत्रुघ्नजी का विवाह श्रुतकीर्ति से हुआ। जब चारों पुत्र विवाह के पश्चात अयोध्या लौटे, तो माताओं ने रामचंद्रजी से कहा कि यह सब विश्वामित्रजी की कृपा से हुआ है, जिस कारण उन्होंने राक्षसों को मारा और शिवजी का नुष तोड़ा।

उन्होंने यह भी कहा कि “जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।' अर्थात्‌ तुमको बिना देखे जो दिन बीते हैं, उन्हें ब्रह्मा हमारी आयु में न जोड़े।

भाग 2

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