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26 July, 2020

स्थान चित्तौड़गढ़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

स्थान चित्तौड़गढ़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

स्थान चित्तौड़गढ़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

प्रातः काल गंगाराम और बुलाखी ने सुबह उठकर अपना शौचादि नित्य कर्म किया, और नित्य की भांति नाश्ता कर अपना सब सामान संभाला और मारवाड़ से उन्होंने मेवाड़ की ओर प्रस्थान किया। मेवाड़ राज्य राजधानी राज्यों में अति प्रसिद्ध राज्य है। यहां एक समय राणा वंश का राज्य था। इस क्षेत्र में पर्वत अधिक है। यहां रास्ता कंकरीला तथा पथरीला है। यहां सबसे प्रसिद्ध नगर चित्तौड़ है। जोकि कभी राज्य की राजधानी था। गंगाराम और बुलाखी सायंकाल चलते-चलते चित्तौड़ नगर में आए। उन्होंने देखा कि चित्तौड़ नगर गंभीरी नदी के तट पर बसा हुआ है। चित्तौड़ का किला भारत के सभी किलों में बड़ा है। जो कई मील में बना हुआ है। किले के सात दरवाजे हैं। पांडवपोल, भैरोपोल, हनुमानपोल, गणेशपोल, नारेला, लक्ष्मण द्वार तथा राम द्वार है। सातवां दरवाजा ही राम द्वार है।

यहीं से किले के अंदर प्रवेश करते हैं। किले के भीतर पद्मिनी का महल, रतनसिंह का महल, फतेह सिंह का महल, शिव मंदिर, काली मंदिर, मीराबाई का मंदिर, जैन मंदिर, विजय स्तंभ तथा चारभुजा आदि के प्रसिद्ध मंदिर तथा कुछ बावड़ी और कुंड आदि है। सब स्थानों को देखने के बाद वह दोनों गंभीरी नदी के तट पर एक बड़े वृक्ष के नीचे ठहरे। यहां और बहुत से यात्री भी ठहरे हुए थे। गंगाराम ने बुलाखी को सामान खरीदने को रुपए दे दिए वह खाने का सामान लेने के लिए शहर में आया। जब वह सामान खरीदने के लिए जा रहा था, तो उसने देखा कि एक भटियारा, एक फौजी जवान तथा एक वेश्या, एक आदमी को पकड़े हुए राजदरबार की ओर जा रहे हैं। यह तीनों कह रहे थे, कि यह आदमी बड़ा ठग है इसने हम सब को ठगा है। आज मुश्किल से पकड़ा गया है। इसे राजा के यहां ले जाकर सजा दिलाएंगे।

उनके साथ बहुत भीड़ थी। यह सब देखता हुआ वह सामान खरीदने चला गया, और कई दुकानों से जा कर सामान खरीदा। जब सामान खरीद कर वापस आया तो देखा नगर निवासियों के साथ वह ठग आजादी से घूमता आ रहा था। लोगों से पूछने पर पता चला कि इसने भी राजा के सामने सब अपराध स्वीकार कर लिया था। फिर भी इसे निर्दोष कह कर छोड़ दिया गया। यह सुनकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि अपराध स्वीकार कर लेने के बाद राजा ने उसे बिना दंड दिए क्यों छोड़ दिया? यह विचार करता हुआ वह गंगाराम पटेल के पास आया सामान सामने रखकर बोला कि मेरी राम-राम लो। मैं घर चला। पटेल जी बोले तुमने जरूर कोई चरित्र देखा है। पहले खाना तो बनाओ फिर मैं तुम्हारी बात का जवाब दूंगा। पटेल की यह बात सुनकर बुलाखी जल लाया। बर्तन साफ किए, उसके बाद उन्होंने मिलजुल कर खाना बनाकर खाया। फिर बुलाखी ने पटेल जी का बिस्तर लगा दिया। हुक्का ताजी करके उनके सामने रखा। जब तक पटेल जी हुक्का पीकर आराम करने लगे तब तक बुलाखी ने बर्तन साफ कर सब सामान संभाल कर रखा। फिर वह पटेल जी के पैर दबाने लगा। और पटेल जी से बोला आपने मेरी बात का उत्तर देने को कहा था तो अब उत्तर दीजिए। जब पटेल जी ने कहा कि पहले अपनी आज की देखी हुई अजूबी बात तो सुनाओ। बुलाखी की सारी बात सुनकर गंगाराम पटेल बोले कि मैं बात कहूं तो तुम हूँकारा देते रहना। पटेल जी बोले- सुनो एक जाट बहुत गरीब हो गया था। उसके पास जब कुछ नहीं रहा तो वह अपनी टूटी हंडिया और थोड़े से चावल बांधकर अपने घर से चल दिया। चलते-चलते एक सराय में जाकर ठहरा और भटियारी से कहा कि हमारे यह चावल हमारी हंडिया में ही बनाना। मैं जब तक घूम कर आ रहा हूं। भटियारी ने उस छोटी सी हंडिया में चावल पकने रख दिए।

वह आदमी कहीं बाहर नहीं गया। उसी के घर में छिपकर बैठ गया और भटियारी को छुपे छुपे देखता रहा। जब चावल पक गए तो भटियारी का लड़का बोला थोड़े चावल मुझे दे दो। भटियारी ने दो चम्मच चावल उसे खाने को दे दिए। थोड़ी देर बाद दूसरा लड़का आया उसने भी भटियारी से चावल मांगे भटियारी ने दो चम्मच चावल उसे भी दे दिए। वह भी खा कर चला गया। वह आदमी यह सब देखता रहा फिर निकल कर बाहर आया और भटियारी से चावल खाने को मांगे भटियारी ने उसकी हंडिया उसके सामने लाकर रख दी।

उसने हंडिया को कान से लगाया और बोला- अरे चुप भी हो जा, भटियारी ने बस दो दो चम्मच चावल अपने दोनों लड़कों को ही तो दिए हैं, ज्यादा तो नहीं दिए। इतना कहकर हंडिया में से चावल प्लेट में रखकर खा लिए। जब वह चावल खा चुका तो भटियारी बोली कि तुम यह क्या कर रहे थे भटियारी ने दोनों लड़कों को दो दो चम्मच चावल दिए। इतनी सुनकर वह आदमी बोला
दोहा
हंडिया जादू की भरी, कहती है सब हाल।
चोरी सारी कान में, बतलाती तत्काल।।
जब उस आदमी कि यह सुनी तो भटियारी ने सोचा कि यह हंडिया तो वास्तव में जादू की है। मैंने जो चावल निकाले वह इसने बता दिए मेरे यहां तो अधिक चोरी होती है। अगर यह हंडिया मुझे मिल जाए तो मैं चोरी का पता लगा लिया करूंगी। ऐसा विचार कर वह कहने लगी।
दोहा
हंडिया दे दे यह मुझे होय बड़ा अहसान।
इसकी कीमत अभी, मैं नगद करूं भुगतान।।
भटियारी की यह बात सुनकर हंडिया का मालिक बोला-
दोहा
सौ रुपैया का मोल है सुन, भटियारिन बात।
लेना जो चाहे इसे, सौ रुपया धर हाथ।।
भटियारिन को हंडिया से मोह हो गया था। उस ने सौ चांदी के रुपए लाकर उसे दिए और हंडिया अपने हाथ में ले ली। वह आदमी ₹100 लेकर वहां से बड़ी जल्दी चला गया। इतने में ही भटियारी का पति आया तो भटियारी ने उसे हंडिया दिखाई और कहा कि यह ₹100 में खरीदी है।

भटियारिन की बात सुनकर भटियारे को क्रोध हो गया। और बोला यह फूटी हंडिया सौ की बताती है। उसने उठाकर वह हंडिया जमीन पर दे मारी तो वह टुकड़े-टुकड़े हो गई। उस भटियारी ने उसे चोरी बताने वाली करामात बताई तो भटियारा बोला वह कोई ठग था, जो तुझे ₹100 में फूटी हंडिया देकर ठग ले गया है  अब मैं जाता हूं। उसे पकड़कर रुपए वसूल कर लूंगा। यह कहकर भटियारा लाठी ले लोगों के बताए हुए रास्ते पर उस ठग की तलाश में जंगल की ओर चल दिया। ठग ₹100 लेकर जंगल के रास्ते जा रहा था कि एक रीछ ने उसे देखा और रीछ उसके पीछे दौड़ा। वह भागकर एक पेड़ की ओट में हो गया। पेड़ के दूसरी ओर से रीछ ने उसे पकड़ने को अपने हाथ बढ़ाए। परंतु उस आदमी ने रीछ के दोनों हाथ पकड़ लिए बीच में ही पेड़ था। रीछ और वह आदमी पेड़ के चारों ओर घूम रहे थे। वह आदमी सोचता था कि यदि मैं रीछ के हाथ छोड़ दूंगा तो रीछ अवश्य मुझे मार डालेगा। इतने में उसकी अन्टी से ₹20 निकलकर पेड़ के इधर-उधर गिर गए। उसी समय घोड़े पर सवार एक फौजी जवान उधर से निकला। उसने रीछ और उस आदमी को पेड़ के चारों और घूमते देखा तो वह समझ गया कि रीछ इसे मार डालेगा। यह विचार कर उसने अपनी बंदूक रीछ को मारने को उठाई। यह देखकर आदमी बोला-
दोहा
रीछ पाालतू तू है मेरा, सुनो लगाकर कान।
मनमानी देता है रकम, देखो स्वयं प्रमान।।
यह रुपया अकेले में निकालता है। तुमको आया हुआ देखकर इसने रुपया देना बंद कर दिया है। अब तक तो मैं सैकड़ों रुपया पैदा कर लेता। घोड़े के सवार ने जब यह बात सुनी और ₹20 पड़े भी देखे तो उसने समझा कि वास्तव में रीछ करामाती है। रुपया इसके पेट में भरे हैं। अगर यह मुझे मिल जाए तो मैं मनमानी रकम कमा लूं। यह विचार कर कहने लगा
दोहा
मुझको दे दे रीछ यह, मैं बतलाऊं तोय।
रुपए की है इस समय, बहुत जरूरत मोय।।
उस आदमी ने जब घुड़सवार की यह बात सुनी तो कहने लगा कि यदि तुम रीछ चाहते हो तो ₹400 और अपना घोड़ा मुझे दे दो। मैं तुम्हें रीछ के हाथ पकड़ा दूंगा। मेरे चले जाने के बाद जितना रुपया चाहो तो रीछ से निकलवा लेना। हां जो यह ₹20 जमीन पर पड़े हैं इन्हें भी मैं ले जाऊंगा। सवार के पास ₹300 थे कहने लगा कि मेरे पास सिर्फ ₹300 हैं तुम मुझे रीछ दे दो। उसने घुड़सवार की बात मान ली फौजी ने घोड़े से उतर कर ₹300 जमीन पर रख दिए और उसने रीछ के हाथ कसकर पकड़ लिए। उस आदमी ने रीछ को छोड़ने के बाद ₹300 और ₹20 जो जमीन पर पड़े थे उठाए और घोड़े पर चढ़कर भाग गया।
 
अब फौजी जवान रीछ के हाथ पकड़े पेड़ के चारों और घूम रहा था। जब रीछ से एक रुपया भी ना निकला, तो वह अपनी भूल पर पछताया। अगर रीछ को छोड़ता है तो रीछ उसे मार डालेगा। इस कारण वह उसके हाथ पकड़े पेड़ के चारों ओर घूमता रहा। इतने में वह भटियारा बोला वह आदमी जो तुम्हारा घोड़ा और रुपया ले गया बड़ा ठग है। हमारे यहां ₹100 में फूटी हंडिया दे आया है। तुम यह तो सोचो कि रीछ के पेट में रुपया कहां से आए। यह कहकर उसने अपनी लाठी से रीछ को मार डाला और फौजी के प्राण बचाए। अब वह भटियारा तथा फौजी दोनों उसको पकड़ने के लिए घोड़े के पांव के निशान देखते हुए चल दिए।

उधर वह ठग घोड़े पर सवार होकर दूसरे शहर में शाम के समय एक तवायफ के यहां सराय में जा ठहरा। उसने घोड़े को दो सेर दाना खिलाया और तवायफ से कहा तुम सुबह मेरे घोड़े की लीद मत फिंकवाना। उसने 4:00 बजे रात को उठकर घोड़े की लीद में ₹200 मिला दिए। और सवेरे उठकर तवायफ के सामने पानी मांग कर लीद को धोना शुरू किया। उसमें से ₹200 जो उसने मिलाए थे सो निकाल लिए और बोला यह मेरा घोड़ा करामाती है। देखो तुम्हारे सामने मैंने इसे दो सेर दाना खिलाया था। इसने लीद में से ₹200 दिए इसे जितने सेर दाना खिलाता हूं। उतने ही सैकड़ा रूपया लीद के साथ निकालता है। यह सुनकर तवायफ को लालच आ गया और कहने लगी यह घोड़ा मुझे दे दो। और जो कुछ चाहो तो ले लो। तवायफ के बहुत विनय करने पर ₹1000 लेकर उसने वह घोड़ा दे दिया और चला गया। तवायफ ने सोचा कि ₹1000 एक ही दिन में वसूल कर लूं। इसलिए उसने घोड़े को 10 सेर दाना खिला दिया। जिसे खाकर घोड़े का पेट फूल गया और वह मर गया।

वह मरा हुआ घोड़ा सराय के दरवाजे पर पड़ा हुआ था। उधर से भटियारा और फौजी निकले। फौजी ने अपना घोड़ा पहचाना और भटियारे से बोला मेरा घोड़ा तो यहां मरा पड़ा है। ठग भी यहीं कहीं होगा।

जब उन्होंने तवायफ से पता लगाया तो उसने कहा कि एक आदमी इसे करामाती घोड़ा बताकर ₹1000 में बेच गया है। फौजी बोला घोड़ा मेरा है। इसमें कोई करामात नहीं थी। तुम्हारी भांति ही उस ठग ने हम दोनों को भी ठगा है। चलो अब हम दोनों मिलकर उसे तलाश करेंगे और पकड़ कर अपना रुपया वसूल करेंगे। अब वह तवायफ भी उनके साथ में हो गई अब भटियारे, फौजी और तवायफ तीनों ही उसको ढूंढने के लिए चल दिए। और उसी शहर में घूमते हुए उसको पकड़ भी लिया। और जब वह नहीं माना तो वे अपना न्याय कराने के लिए उसे राजदरबार में ले गए।

सबसे पहले राजा के सामने भटियारे ने अपना दावा रखा। वह बोला कि यह आदमी ठग है। मेरी पत्नी को फूटी हंडिया ₹100 में देकर ठग लाया है। जिसने उसे यह लालच दिया था, की हंडिया मेरी करामाती है और चोरी बताती है।
राजा ने उससे पूछा कि भटियारा जो कुछ कह रहा है क्या ठीक है। वह आदमी बोला वास्तव में मेरी हड्डियां करामाती थी और वह चोरी बताती थी। आप उस हंडिया को मंगा कर जांच कर लीजिए। राजा ने भटियारे से कहा कि वह हंडिया लाओ। भटियारा बोला वह तो मैंने फोड़ दी। राजा कहने लगा जब हंडिया ही नहीं तो मैं न्याय कैसे करूं।

इसके बाद फौजी ने अपनी फरियाद की। कि यह आदमी ठग है। यह ₹300 और घोड़ा मुझसे बहका कर ले गया। और एक रीछ का हाथ पकड़ा आया। इसने कहा था कि यह रीछ अकेले में पेट से टट्टी की राह रुपए निकालता है। राजा ने उससे पूछा क्या तुमने ₹300 और घोड़ा लेकर इन्हे रीछ दिया था। उसने उत्तर दिया महाराज मेरा रीछ करामाती था। मैंने जो कुछ भी कहा था सत्य है। रीछ को मंगवा कर जांच कर ली जाए। भटियारा बोला उसको मार कर तो मैंने इसकी जान बचाई है। राजा बोला तुम्हारे मामले में भी यह निर्दोष है, क्योंकि तुमने रीछ मार दिया है।

इसके बाद तवायफ ने कहा यह हजार रुपए में अपना घोड़ा मुझे इस शर्त पर बेंच आया था कि इसे जितने सेर दाना खिलाते हैं। उतने सौ रुपए लीद के साथ देता है। इस प्रकार इसने मुझे धोखा दिया है। ठग बोला श्रीमान जी घोड़े को मंगा कर आप मेरी सांच झूठ की जांच कर लें। वैसे मेरी बात झूठ हो तो मुझे कठोर सजा दीजिए। राजा के पूछने पर तवायफ ने बताया कि घोड़ा तो मर गया है। राजा ने कहा बिना घोड़े के फैसला क्या करूं। हे बुलाखी नाई! तुम इसी ठग को देख कर आए हो। जिसे सबूत ना मिलने पर राजा ने निर्दोष छोड़ दिया। अब रात अधिक हो गई है सवेरे जल्दी जागना है इसलिए अब सो जाओ।

17 July, 2020

 स्थान मारवाड़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

स्थान मारवाड़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

 स्थान मारवाड़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

प्रातः काल बुलाखी दास नाई गंगाराम पटेल को सोते हुए देखा तो उन्हें आवाज देकर बोला कि पटेल जी अब दिन निकलने वाला है मुर्गा बहुत देर का बांग दे चुका है। अब कौवा और चिरैया भी बोलने लगे हैं। बुलाकी की आवाज सुनकर गंगाराम पटेल आंखें मलते हुए उठ गए थे। इसके बाद गंगाराम तथा बुलाकी ने अपना समाचार नित्य कर्म किया नाश्ता आदि करके अपना सामान संभाला और आबू रोड स्टेशन से मारवाड़ को प्रस्थान किया। यह इलाका रेगिस्तान था, कहीं पर कांटों की झाड़ियां तथा छोटे-छोटे पौधे अवश्य दिखाई दे जाते थे। कहीं कहीं कुछ लोग भेड़ बकरियों को चलाते हुए नजर आ रहे थे। अधिकांश लोग ऊंटों पर सवार होकर चलते थे। स्त्री पुरुष तंदुरुस्त दिखाई देते थे। 

मारवाड़ नगर राजस्थान का प्राचीन प्रसिद्ध नगर है। यह कभी मारवाड़ प्रदेश की राजधानी थी। उन्हें वहां राजा का मारवाड़ी महल देखने को मिला।
एक बाग में गंगाराम पटेल और बुलाखी आकर ठहरे वहां और भी बाहर से आए हुए बहुत से यात्री ठहरे हुए थे। इससे वहां अच्छी चहल-पहल थी। 

गंगाराम पटेल ने बुलाखी को सामान लाने के लिए कुछ रुपए दिए और कहने लगे कि तुम सामान लेकर जल्दी लौटना। क्योंकि यहां रेगिस्तान है, हवा चलने से रेत के ढेर इधर से उधर उड़ जाते हैं और आदमी भी रास्ता भूल जाता है। गंगाराम पटेल से बुलाखी ने कहा मैं ऐसा ही करूंगा। अब सामान लेकर आता हूं। बुलाखी नाई बाग से बाजार को गया और कई दुकानों से अपना काम का सामान खरीद कर वापस आ रहा था। वह इधर उधर देखता भी जाता था कि कोई अजूबा चीज नजर आ जाए। चलते चलते नगर के बाहर आया तो पेड़ के पास बहुत भीड़ लगी देखी। बुलाखी भी वहां चला गया उसने देखा वहां कुछ आदमी खड़े हुए थे। जो राज्य के सिपाही मालूम पढ़ते थे। वहां राजा भी उनके साथ था। वह नीम का पेड़ था और खोखला था। राजा ने उस पेड़ में आग लगवा दी तो पेड़ जलने लगा उसमें से हाय हाय बचाओ बचाओ मैं मरा की आवाजें आ रही थी। सब भीड़ यह देख कर हंस रही थी।

बुलाखी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पेड़ में कोई भूत प्रेत था या किसी आदमी को आग में जिंदा जलाने को राजा ने उस में आग लगवाई थी। वहां से किसी के रोने की आवाज भी आ रही थी। बुलाखी ने विचार किया कि आज की घटना बड़ी अनोखी है। शायद पटेल जी इस घटना को पूरी तरह ना बता सके अपने मन में ऐसे विचार बनाते हुए सामान को लेकर वह उसी बाग में आया जहां पटेल भी उसका काफी देर से इंतजार कर रहे थे। बुलाखी को आता हुआ देखकर गंगाराम पटेल कहने लगे कि आज तो तुम बहुत देर से सामान लेकर लौटे मैं तो समझ रहा था कहीं रास्ता भूल गए। इस शंका में परेशान होकर तुम्हारी राह निहार रहा था। पटेल जी की बात सुनकर वह हंसा और लाया हुआ सामान उनके सामने रख कर कहने लगा। पटेल जी आपने खूब सोंची मै भला कहीं खो भी सकता हूं। मैंने घाट घाट का पानी पिया है मुझे देर इसलिए लगी कि आज मैं एक बड़ी अनोखी बात देखता रह गया।
बुलाखी दास की बात सुनकर पटेल भी मुस्कुराने लगे और बोले।
दोहा
अन्न बिना सब अन्मने, नर नाहर और भूख।
तीनपहर के बीच में, बिगड़ जात सब रूप।।
सो हे बुलाखी भाई इस समय बहुत भूख लगी है। लोगों ने यहां तक कहा है। "भूखे भजनहोय गोपाला, यह लो कंठी माला" भूखे तो भजन भी नहीं हो सकता फिर और बात की क्या?

चलो पहले नित्य की भांति भोजन बनाए खाए। तब चित्त में शांति आएगी। तुम्हारी अजूबी बात का जवाब भी उसके बाद दिया जाएगा। गंगाराम पटेल की बात सुनकर बुलाखी पहले पानी भरकर लाया, बर्तन साफ किए, चूल्हा तैयार करके लाया साग सब्जी बनाकर ठोक दी फिर आटा गूंदा। जब साग सब्जी तैयार हो गई तो पटेल जी को आवाज दी पटेल जी चौका में आकर बैठे बुलाखी रोटी बेलता जाता था और पटेल जी सेंकते जाते थे। इस प्रकार दोनों ने भोजन बनाया खाया फिर बुलाकी ने पटेल जी का बिस्तर लगाया और हुक्का भर कर सामने रखा। वह आराम से हुक्का पीने लगे। जब तक बुलाकी ने बर्तन साफ किए अपना सब सामान संभाला और फिर पटेल जी के पैर दबाने लगा। उसी समय गंगाराम पटेल बुलाखी से कहने लगे कि आज तुमने जो अनोखी बात देखी हो वह बतलाओ तो उसने देखा हुआ सारा हाल बयान कर दिया और बोला अब बताएं यह क्या बात थी?

बुलाकी की बात सुनकर गंगाराम पटेल बोले- एक नगर में मोहन और सोहन दो मित्र थे। दोनों अपना-अपना अलग व्यापार करते थे। मोहन ईमानदार व्यक्ति था। उसके नौकर भी सच्चे थे। जो व्यापार उसने 1000 से शुरू किया 1 साल में ₹50000 का हो गया। सोहन की आदत अच्छी ना थी, वह बेईमान था। इसलिए उसके नौकर भी बेईमानी करने लगे थे। उसने 1 साल में 40000 का नुकसान उठाया। जिससे उसकी हालत खराब हो गई। सोहन एक दिन मोहन से कहने लगा।
दोहा
धन सब घाटे में गया, बंद हुआ व्यापार।
मित्र बताओ किस तरह, मेरा हो उद्धार।।
सोहन की बात सुनकर मोहन कहने लगा तुम मेरे पुराने मित्र हो। अगर व्यापार में धन नष्ट कर दिया तो कोई बात नहीं।
दोहा धन मेरे पास है सुन लो कान लगाय।
साझे में हम तुम दो लेंगे काम चलाय।।
मोहन की बात सुनकर सोहन बहुत प्रसन्न हुआ और बोला तुम धन्य हो। मित्र हो तो ऐसा हो। अब मेरी समझ में आता है कि-
दोहा
चल परदेस में करें, हम दोनों व्यापार।
लाभ में बहुत कमाए धन, मेरा यही विचार।।
सोहन की बात मोहन ने मान ली और उसके साथ परदेश को व्यापार करने के लिए चल दिया। दोनों ने परदेस में जाकर चित्त लगाकर परिश्रम से अपना व्यापार शुरू किया। दोनों ने बाहर की यात्रा भी कर ली और धन भी कमाया। बहुत पुरानी कहावत है कि कुछ भी करो "कुत्ते की पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी रहती है"। जिसकी जो आदत पड़ जाती है। वह छूटती नहीं सोहन तो बेईमानी करने वाला आदमी था। वह परदेस में मौका देखा करता था। कि कब मोहन को जान से मार कर उसका सब धन हड़प ले। परंतु मोहन के नौकर स्वामी भक्त थे। इसलिए सोहन अपनी योजना में सफल नहीं हो पाया था। वह दिखावटी बातों में तो मोहन से भोली भाली बातें करता था। मगर उसके मन में कपट की कतरनी चलती रहती थी।

मोहन बहुत सीधा आदमी था। वह यह समझ भी नहीं पाया कि सोहन के विचार इतने गंदे भी होंगे। परंतु मोहन के नौकरों ने उसे एकांत में बताया कि सोहन के विचार बुरे हैं और किसी ना किसी दिन आपको अवश्य धोखा देगा। हम आपको सचेत कर रहे हैं। मोहन ने अपने सेवकों से ऐसी बात सुनी तो उसमें सोहन के साझे में व्यापार खत्म करना ही ठीक समझा। अब मोहन के पास कुल मिलाकर ₹200000 हो चुका था। मोहन सोहन से कहने लगा।
दोहा
बहुत दिनों परदेस में दीने मित्र बिताय।
बहुत दिनों से है रही, घर की याद सताय।।
इतनी बात सुन सोहन कहने लगा-
दोहा
जो इच्छा हो आपकी तो मुझको स्वीकार।
सभी भक्तों से आपके संग में हूं तैयार।।
सोहन की बात सुनकर मोहन बोला- हे मित्र परमेश्वर ने और भाग्य ने बड़ा साथ दिया इस प्रकार यहां आकर दो लाख कमाया। अब हम तुम दोनों एक एक लाख बंटेंगे और अपने घर चल कर कुछ समय चैन से बैठेंगे। सोहन बोला रुपए बांटने की ऐसी जल्दी क्या है, घर चलना है चलो वहीं बांट लिया जावेगा। मोहन यह बात सुनकर राजी हो गया और सोहन को साथ लेकर धन समेत अपने नगर को वापस आ गया।

नगर में  पहले सोहन का मकान पड़ता था। इसलिए सब धन को लेकर मोहन सोहन के मकान पर गया। कुछ देर बैठने के बाद मोहन ने सोहन से जाने का विचार किया और सोहन को धन बांटने को कहा। सोहन बोला ऐसी जल्दी क्या है? जो कि हम धन बांटने की परेशानी करें। अभी रात है कल दिन में बांट लेंगे। तब मोहन विश्वास करके सब धन वहीं छोड़ कर अपने घर चला गया। दो-तीन दिन के बाद मोहन सोहन के यहां आया और उसने धन बांटने की बात कही। उस समय सोहन ने उससे साफ कह दिया कि अपने हिस्से का धन तो पहले ही तुम ले गए थे। मेरे पास तुम्हारा कुछ नहीं है। मोहन दुखी होकर अपने घर चला आया फिर बाद में एकदिन नगर के प्रतिष्ठित लोगों की पंचायत जोड़ी। उसमें भी सोहन ने साफ इंकार कर दिया। सब बातचीत मोहन और सोहन के बीच में थी कोई गवाह नहीं था। जो पंचायत वाले ठीक फैसला करते।

अंत में मोहन ने राजा के पास जाकर न्याय की प्रार्थना की। राजा ने सोहन को बुलाकर कहा कि तुम मोहन का एक लाख रुपया क्यों नहीं देते। सोहन ने कहा कि मैंने सोते समय ही मरघट के पास वाले नीम के पेड़ के पास रुपया मोहन को दे दिया था। यह रुपयों का झूठा दोष मेरे ऊपर लगाता है। राजा ने कहा कि तुम लोगों का कोई गवाह भी है। मोहन ने उत्तर दिया कि हमारा गवाह कोई नहीं है। किंतु सोहन कहने लगा मैं उस पेड़ से गवाही दिलवा दूंगा। दूसरे दिन राजा ने पेड़ की गवाही देने का निश्चय किया मोहन और सोहन अपने अपने घर चले आए घर आकर सोहन ने अपने बाप को सिखा कर रात में ही उस पेड़ की खोह में बिठा दिया और कहा कि जब राजा पूछे तो कह देना। कि यहां एक लाख सोहन ने मोहन को दिया था।

दूसरे दिन राजा दरबारियों तथा मोहन के साथ उस पेड़ के पास गए और कहा। तू सच बता कि क्या सोहन ने मोहन को एक लाख रुपये दिया था। पेड़ से आवाज आई हां दिया था। मोहन ने सोहन के बाप की आवाज पहचान ली तो राजा से कान में कहा कि यह सोहन के पिता की आवाज है। राजा सोहन की बेईमानी पर बहुत क्रोध आया। उसने उस पेड़ में आग लगा दी जिसमें जलकर उसका बाप रो रो कर मर गया। तब राजा ने सोहन से मोहन का एक लाख रुपया भी दिला दिया। और कहा बेईमानी बहुत बुरी चीज है। उसका फल बहुत बुरा होता है। हे बुलाखी नाई! तुम यही घटना आज देख कर आए हो अब सो जाओ रात अधिक हो गई है सवेरे जल्दी जागना है।

16 July, 2020

 स्थान आबू पर्वत (गंगाराम पटेल और बुलाखी दास की कहानियां)

स्थान आबू पर्वत (गंगाराम पटेल और बुलाखी दास की कहानियां)

 स्थान आबू पर्वत  (गंगाराम पटेल और बुलाखी दास की कहानियां)

प्रातः काल का समय था बुलाखी दास और गंगाराम पटेल सोने से उठने के बाद अपने नित्य कर्म से फारिग हुए। सब सामान संभाला और कुछ नाश्ता किया। बाद में आश्रम के महात्मा को गंगाराम पटेल ने माथा नवाकर कुछ रुपए भेंट किए और आज्ञा लेकर अपने घोड़ों को आश्रम में ही छोड़ दिया। और रेल द्वारा चल दिए आबू पर्वत की ऊंची ऊंची चोटियां तथा उन पर हरे-भरे फल फूलों वाले वृक्ष मन को लुभाते हुए प्रतीत होते थे।

शाम के समय वे दोनों आबू पर्वत पर आ गए। पर्वत बड़ा रमणीक था, उस पर अनेक बड़े बड़े मंदिर थे। जिनमें जैन मंदिर तथा अंबाजी का मंदिर तो बहुत ही प्रसिद्ध है, तथा शोभायमान थे। वहीं अनेक साधु संतों के आश्रम थे। जहां बहुत से महात्मा शोभा पा रहे थे। कहीं सत्संग होता था, तो कहीं उपदेश और प्रवचन हो रहे थे।

पुराने महात्माओं की अनेक गुफाएं थी। जिनके दर्शन मात्र को यात्री आते जाते थे। जैसे- भर्तृहरि गुफा, गोरखनाथ की गुफा इत्यादि जिधर देखो उधर आनंद ही आनंद दिखाई देता था। मुख्य दर्शनीय स्थानों को देखते हुए गंगाराम पटेल और बुलाखी दास पर्वत के नीचे उतरे नीचे एक सुंदर छोटा सा नगर था। जहां खाने पीने की वस्तुएं उपलब्ध हो जाती थी। वही एक झरने के पास उत्तम जगह देखकर गंगाराम पटेल ने ठहरने का विचार किया और बुलाखी से कहने लगे कि देखो पानी का यह झरना बह रहा है। पड़ोस में जंगल भी है यहां ठहरने से शौच आदि में किसी बात का भय नहीं है। मेरे विचार से तो यही रुक जाए तो अच्छा है। बुलाखी को भी पटेल जी का विचार अच्छा ही मालूम पड़ा, और उसने अच्छी सी जगह देखकर वहां सब सामान रख दिया। वहां जंगल में मंगल हो रहा था। कुछ लोग भगवान का भजन कीर्तन कर रहे थे, तो कुछ देवी जी की भेंट गा रहे थे। वहां सभी संप्रदाय के महात्मा जा रहे थे। स्थान स्थान पर धर्म चर्चाएं होने से यह स्थान साक्षात स्वर्गधाम सा प्रतीत होता था।

गंगाराम पटेल ने बुलाखी को कुछ रुपए सामान लाने को दिए। वह बस्ती में सामान लेने के लिए गया वह इधर उधर देखता जाता था। कि उसे कोई ऐसी अनोखी बात दिखे जिसे जाकर पटेल जी से पूछे वह देखते-देखते बहुत दूर निकल गया। उसे कोई भी अनोखी बात दिखाई नहीं दी घूमते घूमते उसे अंधेरा हो गया था। इसलिए उसने जल्दी से खाने का सब सामान खरीद लिया और जब अपने ठहरने के स्थान की ओर चला आ रहा था तो आज उसका चित्त कुछ उदास जैसा था। क्योंकि उसने कोई अनोखी बात नहीं देखी थी। वह सोच रहा था कि रोज की भांति मैं आज पटेल जी से क्या पूछूंगा? यही विचार करता हुआ वह बस्ती के बाहर आया। यहां से उसके ठहरने का स्थान थोड़ी ही दूर था। अंधेरे में जब अपने दाहिनी ओर नजर डाली तो उसे एक बहुत बड़ा तालाब दिखाई दिया वह तालाब की ओर देख ही रहा था। कि उसे आकाश मार्ग में कुछ प्रकाश होता हुआ दिखाई दिया। जो धीरे-धीरे उसी की ओर आ रहा था। यह देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ। थोड़ी देर में उसने देखा, कि वहां एक उड़न खटोला रुका और उसमें से स्वर्ण कुंडल और राजसी वस्त्र धारण किए हुए एक पुरुष उतरा। तब उसकी समझ में आया कि उसे जो प्रकाश दूर से दिखाई दे रहा था। इसी खटोले से उतरने वाले महापुरुष के मुख्य मंडल की ज्योति थी।

वह पुरुष उड़न खटोले से उतरकर तीन चार कदम चला होगा कि वही पास खड़े एक मुर्दे के पास पहुंच गया। पुरुष अपने हाथ में एक फरसा लिए हुए था उसी से वह उस लाश में से मांस काट काट कर खाने लगा। और जब उसका पेट भर गया तो तालाब से जल पिया और अपने उड़न खटोले में बैठ गया। उड़न खटोला ऊपर को उड़ गया। इस तरह वह तेजस्वी पुरुष जिधर से आया था। उधर को ही चला गया। इसके बाद जो कटी कटी लाश वहां पड़ी थी वह भी गायब हो गई। यह सब कुछ देख कर बुलाखी दास के आश्चर्य की सीमा न रही। वह विचार करने लगा कि उड़न खटोले से उतरने वाला आदमी देखने से तो कोई देवता विद्याधर या गंधर्व ही मालूम पड़ता था। और इतना तेजवान था कि उसके मुख्य मंडल का उजाला सब दिशाओं को प्रकाशित कर रहा था। वह शव से मांस काट कर खा रहा था। यही बुलाखी नाई के आश्चर्य का कारण था कि ऐसा तेजवान पुरुष शव का मांस क्यों खा रहा था? फिर उस आदमी के जाने के बाद वह मृत व्यक्ति भी गायब हो गया। अपने मन में नए-नए विचार बनाता हुआ बुलाखी गंगाराम के पास गया और उनके सामने सामान रख दिया और कहने लगा कि आज मैं एक ऐसी अद्भुत बात देख कर आया हूं। जिसका जवाब आप कभी नहीं दे सकते हैं। इस कारण मेरी राम-राम लो मैं अपने घर जा रहा हूं। इतनी सुनकर पटेल कहने लगे तुम्हें मालूम है कि तुमने अब तक जितनी भी अजीब बातें देखी हैं। उनका जवाब मैंने दिया है। आज भी तुम्हारी बात का जवाब दूंगा लेकिन पहले खाना बना खा लो बाद में पूछना।

गंगाराम की बात सुनकर बुलाखी पास के झरने से पानी भरकर लाया और बर्तन साफ किए, चूल्हा चेताया, साग बना कर चढ़ाया और आटा गूंथा। जब साग बन गया तो पटेल जी पराठे बनाने लगे। जब वह भोजन बनकर तैयार हो गया तो दोनों ने आनंदपूर्वक भोग लगाया। फिर बुलाखी ने पटेल जी का बिस्तर लगाया और हुक्का भर कर उनके सामने रखा। जितनी देर में पटेल जी ने हुक्का पिया बुलाखी ने सब बर्तन साफ किए और अब अपना सामान संभाल कर रखा। फिर बुलाखी धीरे-धीरे पटेल जी के पैर दबाने लगा। पाँव दबाते दबाते जब पटेल जी को नींद आने लगी तो वह बोला पहले मेरी बात का जवाब दो, बाद में सोना। इतनी बात सुनकर गंगाराम पटेल बोले- हां बताओ तुम्हारी ऐसी कौन सी अनोखी बात है। जिसका जवाब सुनने के लिए तुम इतने बेचैन हो रहे हो।

तब बुलाखी ने उड़न खटोले से उस महापुरुष के उतरने के बाद सारा देखा हुआ हाल बयान कर दिया। बुलाखी की इस प्रकार की बात सुनकर गंगाराम पटेल कहने लगे कि आज वास्तव में तुमने एक विचित्र घटना देखी है इसे जो सुनेगा आश्चर्य ही करेगा। मैं तुम्हें अब उस तेजस्वी पुरुष के विषय में सब कुछ बताता हूं। तुम ध्यान लगाकर सुनो। जिस तरह फौज में नक्कारा विशेष महत्व रखता है, उसी प्रकार किस्सा कहानी में हूंकारा का महत्व है। जब तक तुम हुंकारा देते जाओगे मैं बात कहता चलूंगा और हूंकारा बंद होते ही मैं बात करना बंद कर दूंगा। बुलाकी ने हूँकारा भरना स्वीकार कर लिया। गंगाराम पटेल वह कहानी आरंभ करते हुए बोले- हे बुलाखी! तुम्हें अब मैं जो कुछ बताता हूं वह सुनो,
एक राजपूत था। बचपन से ही उसकी तंदुरुस्ती बड़ी अच्छी थी। मलाई करने कराने का उसे बड़ा चाव था। व्यायाम करता था और कुश्ती भी लड़ता था। उसने बड़े-बड़े पहलवानों की कुश्ती में पछाड़ा था। वह ब्याह लायक हुआ तो राजा ने उसका विवाह करने का विचार किया। जब राजकुमार को यह बात मालूम हुई तो उसने कहा-
दोहा
ब्याह रचाने का पिता, छोड़े आप विचार।
ब्रह्मचर्य पालन करूं, ली मैंने चितधार।।
इस पर राजा ने राजकुमार से कहा-
दोहा
बिन ब्याह के सुत मेरे चले न वंश अगार।
ब्याह रचा ओहे कुमार बना रहे परिवार
राजा बोला- हे पुत्र! तुम मेरे इकलौते पुत्र हो। अगर ब्याह नहीं करोगे तो हमारा वंश डूब जाएगा। इस प्रकार राजा ने समझा-बुझाकर उसका विवाह कर दिया। थोड़े दिन बाद राजा का स्वर्गवास हो गया और राजकुमार को राजगद्दी मिली। पुत्र होने के बाद उसका मन राजकाज में नहीं लगता था। वह सांसारिक जीवन से मुक्त होकर भगवान का भजन कर मुक्त पद प्राप्त करना चाहता था। उसके बाद उसने अपनी पत्नी और मंत्रियों को राजकाज सौंप दिया। अपने नगर निवासियों तथा पारिवारिक जनों को समझा बुझा और धीरज बंधा कर राज्य छोड़कर चला गया।

उसने इधर-उधर तीर्थों के दर्शन किए और पवित्र सरिता सरोवरों में स्नान किया। एक अच्छे महात्मा को गुरु बनाकर उनसे दीक्षा ली। वह संत समाज में विचरण करने लगा। वह एक बड़ा सदाचारी व्यक्ति था। उसकी आत्मा पवित्र थी। उसने कभी किसी पर स्त्री को बुरी नजर से भी नहीं देखा था। जब वह इस प्रकार देश के सभी तीर्थ कर चुका और उसकी विचरण करने की इच्छा समाप्त हो गई। तो वह एक पर्वत पर आया और सुंदर तालाब एकांत में देखा तो वहां रहकर उसने तपस्या करने का विचार किया। जब उसे भूख लगती थी तो फल फूल लाकर खा लेता था। और सरोवर से पानी पी लेता था। भगवान के भजन में तल्लीन रहने से उसके मुख पर तेज चमकने लगा था। उसने कभी किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुंचाया किंतु इतना सब कुछ करने पर भी उसने कभी साधु महात्मा दीन अथवा अतिथि को खाने के लिए नहीं पूछा। खुद अपनी भूख का ध्यान रखा और परलोक सुधारने के उपाय में लगा रहता। कोई साधु संत अगर उसके आश्रम पर आज ही जाता था तो वह उससे खाने को नहीं पूछता था। और एकांत में बैठकर अकेला अपना पेट भर लेता था।

दीर्घकाल तक जीवित रहने के पश्चात उसकी आयु जब पूरी हुई तो धर्मराज के दूत उसे अपने दिव्य रथ में बैठकर दिव्य लोक में ले गए। अपने कर्मों के फल से उसे उत्तम लोग की प्राप्ति हुई। सुंदर स्त्री तथा वाहन वैभव सब उसको वहां प्राप्त था। परंतु वहां उसे खाने को कुछ भी नहीं मिला करता। कुछ समय तो उसने भूखे रहकर बिताया। एक दिन ब्रह्मा जी से जाकर उसने निवेदन किया कि मुझे उत्तम लोग धन वाहन वैभव तथा इस्त्री आज सर्व सुख तो प्राप्त हैं। परंतु मेरे खाने के लिए कुछ भी नहीं है इसका क्या कारण है? उसकी यह बात सुनकर ब्रह्मा जी समझा कर कहने लगे कि तुमने अपने अच्छे कर्मों के पुण्य से यह उत्तम लोग तो प्राप्त कर लिया, परंतु कभी भी किसी ब्राह्मण साधु-संत तथा भूखे को भोजन नहीं कराया। सदा अपना पेट पालने में लगे रहे हो इसी कारण तुम्हें यहां भोजन नहीं मिल पा रहा है। भोजन उन्हीं को प्राप्त होता है। जो भोजन का भी दान करते हैं। ब्रह्मा जी की ऐसी बात सुनकर वह कहने लगा कि आप मुझे ऐसा उपाय बताएं। जिससे मैं भूख से ना मरूँ। तब ब्रह्माजी कहने लगे कि तुम जिस सरोवर पर रहते थे। जहां तुम ने तप किया था। तुम वही रात में जाया करो और वहां तुम्हारी अपनी लाश ही तुम्हें रखी मिला करेगी तुम उसी में से मांस काटकर खाओ और तालाब का पानी पीकर अपनी भूख प्यास मिटाओ।

हे बुलाखी नाई! यह वही पुरुष तुमने आज मुर्दे का मांस खाते हुए देखा है। जिसका हाल मैंने सुनाया है देखो रात अधिक हो गई है। अब सो जाओ सवेरे जल्दी उठकर आगे चलेंगे।

14 July, 2020

स्थान मेहसाना (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास नाई की कहानियां)

स्थान मेहसाना (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास नाई की कहानियां)

स्थान मेहसाना (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास नाई की कहानियां)

प्रातः काल के 4:00 बजे के करीब मुर्गे ने कुकड़ू कूँ की आवाज लगाई। जिसे सुनकर गंगाराम पटेल और बुलाखीदास दोनों उठ बैठे उन्होंने अपना शौच आदि नित्य कर्म किया। कुछ नाश्ता करके अपना सब सामान संभाल कर भावनगर से प्रस्थान किया। मार्ग के किनारे के दृश्यों को देखते हुए वह घोड़े पर जल्दी-जल्दी जा रहे थे, क्योंकि अब तो उन्हें अपने घर पहुंचने की फिकर थी। जहां प्यास लगती थी वहां कुएँ से जल खींच कर पानी पी लिया करते थे। आज तो उन्होंने मार्ग में कहीं विश्राम भी नहीं किया। वह बीकानेर होते हुए सुरेंद्र नगर आए वहां से मार्ग तो अहमदाबाद की तरफ जाता था और दूसरा मेहसाना की ओर अहमदाबाद का मार्ग छोड़कर वह मेहसाना के मार्ग पर चले।

चलते-चलते सांयकाल वह मेहसाना आ गए। नगर के किनारे पर ही संत का एक आश्रम था। गंगाराम पटेल ने वहां के महात्मा से अपने ठहरने का विचार प्रकट किया तो उन्हें ठहरने की आज्ञा मिल गई। पटेल जी और बुलाखी ने देखा कि आश्रम पर अनेक संत महात्मा ठहरे हुए हैं। कोई वैष्णव है, तो कोई सन्यासी, कहीं पर उदासीन अपना धूनी जमाए चिमटा गाड़े हुए आसन पर बिराज रहे हैं। अनेक भक्त संतों की सेवा में लगे हुए हैं। पटेल जी अपना सामान महात्माओं से अलग एक ओर कुएं के पास रखवाया। उसके बाद बुलाखी को ₹50 देकर कहा कि तुम सामान लेकर जल्दी आना कहीं ऐसा ना हो कि तुम बाजार में जाकर इधर उधर घूमते रहो अगर बाजार बंद हो गया और सामान ना मिला तो भूखा ही मरना पड़ेगा।

बुलाखी रुपए लेकर बाजार गया वहां उसने अपना आवश्यक सामान खरीदा और जब वह आ रहा था तो उसने देखा कि एक अच्छा जुलूस जा रहा है। लोगों से पूछने पर पता चला है कि वह राजा के राजगुरु हैं कभी-कभी यहां राजा के महल में इसी भाँति जुलूस के साथ धूमधाम से आते रहते हैं। बुलाखी ने देखा राजगुरु बहुमूल्य वस्त्र पहने हुए हैं। साथ में बाजे बज रहे हैं। उसी समय वहां एक आदमी आया जिसके साथ 4 सिपाही थे। उस आदमी के आदेश से सिपाहियों ने राजगुरु को पकड़कर उसके हाथों में हथकड़ी डाल दी। बुलाखी यह सब देखता रहा जुलूस में हलचल मच गई लोगों ने राजा को खबर की। राजा भी वहां आया और उसने राजगुरु को प्रणाम तो किया, परंतु उन्हें सिपाहियों से मुक्त नहीं करा सका। यह देख बुलाखी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मामूली आदमी के कहने से सिपाहियों ने राजगुरु के हथकड़ी डाल दी और राजा अपने गुरु को मुक्त नहीं करा सका। बुलाखी सोच रहा था कि राजगुरु को गिरफ्तार करने वाला यह कौन आदमी हो सकता है? यों विचार करता हुआ बुलाखी अपना सामान लेकर संत के आश्रम पर आया और पटेल जी के सामने सब सामान रख कर कहने लगा कि अब मैं अपने घर जाता हूं। मेरी राम-राम लो।

पटेल जी बोले- हे बुलाखी! मैं समझता हूं तुम अवश्य कोई अजूबा चरित्र देखकर आए हो। अभी पहले भोजन का प्रबंध तो करो फिर सोते समय तुम्हारी बात को सुन लूंगा और उसका जवाब दूंगा। तब बुलाखी ने कुएं से पानी खींचा। बर्तन व नित्य की भांति मिलजुल कर भोजन बनाकर खाया फिर बुलाखी ने पटेल जी का बिस्तर लगा दिया। हुक्का भर कर रख दिया। पटेल जी हुक्का पीने लगे। तब बुलाकी ने बर्तन साफ करके रखें और सब सामान चौकशी के साथ रख दिया और फिर पटेल जी के पैर दबाने लगा। जब पटेल जी को नींद आने लगी तो बुलाखी बोला कि आज तो मेरी बात का जवाब दिए बिना ही सोने लगे।

इतनी सुनकर पटेल जी कहने लगे मैं थक गया था। इसलिए नींद आने लगी मुझे तुम्हारी बात का ध्यान नहीं रहा था। खैर अब जल्दी बताओ कि तुमने आज क्या देखा तब बुलाखी ने बाजार में जुलूस देखने और उसके बाद राजगुरु की गिरफ्तारी की बात बताई। और अंत में बोला-हे पटेल जी! मुझे यह आश्चर्य हुआ कि राजा की तो शक्ति सबसे बड़ी होती है। राजगुरु राजा के भी पूज्य हैं, तो ऐसा क्या कारण है कि राजगुरु को एक मामूली आदमी ने गिरफ्तार करा दिया और राजा यह सब कुछ देखता ही रहा।

बुलाखी दास नाई की बात सुनकर गंगाराम पटेल बोले- हे बुलाखी! तुम नित्य की भाँति हुंकारा देते जाना तभी मैं अपनी बात को सुनाऊंगा। बुलाखी को समझा कर गंगाराम पटेल ने बात करनी शुरू की और वह हूँकारा देने लगा। पटेल जी बोले- हे बुलाखी! अब मैं तुम्हारी शंका का निवारण कर रहा हूं। सुनो एक नगर में एक पुरुष अपनी पत्नी सहित रहता था। वह अपने परिवार में पति-पत्नी दो ही प्राणी थे।

एक दिन प्रातः काल पत्नी सोते से जाग कर पति से कहने लगी-
दोहा
सोवत में सपनों लखों, सुनो नाथ चितलाय।
भिक्षा मांगने को गयो, एक भिखारी आय।।
भिक्षुक को जब मैं गई, उठकर भिक्षा देन।
उंगली बासे छू गई, हृदय भई बेचैन।।
मेरे पतिव्रत धर्म पर, आय गई है आंच।
उंगली मेरी काट दो, तुम्हें बताऊं सांच।।
अपनी पत्नी की इस प्रकार की बात सुनकर उसका पति बोला कि
दोहा
भीख भिखारी को दई, सपने में सुकुमारि।
उंगली बासे छू गई, तोका भयो बिगारि।।
अरे यह तो सपने की बात है। अगर सपने में किसी भिखारी को भीख देने पर उंगली छू गई तो इसमें कोई पाप नहीं है। ना तेरे पतिव्रत धर्म पर ही कुछ आँच आती है। इसलिए यह उंगली काटने की बात तेरी व्यर्थ है। उसने अपनी पत्नी को समझा कर उसके पतिव्रत धर्म की प्रशंसा की। और अपने अपने नित्य कर्म दोनों ने किए। बाद में पत्नी ने भोजन बनाकर पति को खिलाया और कहने लगी कि यह हमारे कपड़े हैं। इन्हें बाजार से अभी सिला लाओ। वह आदमी अपनी पत्नी के कपड़े लेकर बाजार सिलाने गया। एक दुकान के आगे एक दर्जी बैठा कपड़े सी रहा था। वही उसकी मशीन तथा सब सामान रखा था। उसी के पास जाकर उसने कहा कि हमारी पत्नी के यह कपड़े तुम्हें आज ही सीने हैं। दर्जी ने वह कपड़ा उससे ले लिया और दिए हुए नाप के अनुसार कपड़ा उसी समय काट दिया और बचा कपड़ा व कपड़े की कतरन देकर बोला।
दोहा
कपड़ा यह लो प्रथम तुम, घर रख आओ जाय।
कपड़े तब मैं सीऊंगा, सुन लो कान लगाय।।
यहां ईमानदारी का काम है। मैं किसी की कतरन भी अपने यहां नहीं रहने देता। इतनी बात दर्जी की सुनकर वह पुरुष कहने लगा
दोहा
कपड़े तुम सी दो मेरे, सुनो लगाकर कान।
कतरन रखने से कोई, कहे ना तुम्हें बेईमान।।
लेकिन दर्जी बोला भाई मैंने अपना नियम ऐसा ही बना लिया है। कि मैं अपने यहां किसी की कतरन नहीं रखता पहले उसे घर रख कर आओ तभी कपड़े सिलूँगा। बहुत समझाने से भी दर्जी नहीं माना तो वह आदमी कतरन लेकर अपने घर को चल दिया, और मन में विचार करने लगा कि यह दर्जी तो मेरी पत्नी से भी अधिक धर्मात्मा है। देखो यह तो कतरन भी नहीं रखता। ऐसा विचार था हुआ वह जब घर लौट कर अपने घर आया तो देखा कि उसकी पत्नी घर पर नहीं है। वह घर की नकदी, अपने कपड़े और जेवर लेकर कहीं चली गई है। बक्सों के ताले खुले पड़े हैं। यह देखकर वह आश्चर्य में पड़ गया और सोचने लगा कि मेरी पत्नी का पति धर्म की अधिक बातें बनाना ढोंग निकला। सवेरे तो कह रही थी कि सपने में भिखारी को भीख देने में उंगली छू गई और वह उंगली अपवित्र हो गई है। इसे काट दो, मैं समझा कि बहुत पतिव्रता है परंतु देखो तो वह सब कपड़े जेवर और नकद रुपया लेकर भाग गई। दर्जी उससे भी अधिक ईमानदार बन रहा है। उसने कतरन भी अपने पास नहीं रखी। जब मेरी पत्नी इतनी धर्म की बात करने वाली हो कर भाग गई तो मुझे ऐसा लगता है कि इतना ईमानदार वह दर्जी भी वहां नहीं होगा।
यह विचार कर वह बाजार को वापस गया। वहां आकर क्या देखता है कि ना वहां दर्जी है, ना उसकी मशीन है, और ना कोई कपड़े। अब तो वह अपने मन में विचार करने लगा कि यह दुनिया भी कितनी अजीब है। मैंने जहां जहां अत्यधिक सच्चाई देखी। वहां पर अधिक बेईमानी और बुराई ही पाई।

मेरी पत्नी पतिव्रत होने का इतना पाखंड दिखाती थी। और वह भाग गई। दर्जी इतना ईमानदार बन रहा था कि किसी की कतरन भी रखना मंजूर ना था। वह सब कपड़ा ही लेकर भाग गया। खैर हुआ सो हुआ अब इतना ज्ञान अवश्य हो गया है। कि अब मैं किसी भी आडंबर वाले पर विश्वास नहीं करूंगा। जो अधिक दिखावे की बात करते हैं। वही अधिक बेईमान हैं। यह विचार करता वह अपने घर चला आया। पत्नी के बिना उसने घर में बड़ी मुश्किल से रात काटी। सवेरे उठकर उसने सोचा कि अब यहां रहना ठीक नहीं। अब मोहल्ले के लोगों को पता चलेगा कि मेरी पत्नी भाग गई है, तो वह लोग मेरी हंसी करेंगे। उसने अपने मकान में ताला लगाया और सोचा कि कहीं परदेस में चलकर नौकरी करनी चाहिए। घूमता हुआ वह एक राजा के यहां पहुंचा और अपनी नौकरी की इच्छा प्रकट की।

राजा उन दिनों अपने मन में एक कारण से परेशान रहता था। बात यह थी कि राजा के नगर से बालक चोरी हो जाते थे और बहुत प्रयत्न करने पर भी बालकों को चुराने वाला पकड़ा नहीं गया था। राजा ने उस आदमी को बालकों के चोर को पकड़ने के लिए नौकर रख लिया। वह आदमी राजा से बोला कि चार सिपाही मेरी आज्ञा पालन करने को मुझे दिए जाएं। और मैं जिसे बताऊं उसे गिरफ्तार कर लें। राजा ने ऐसा ही किया उसे नौकरी करते हुए कई महीने हो गए। आज जब राजगुरु की सवारी आई तो वह आदमी भी सिपाहियों सहित वहां था। उसने देखा कि राजगुरु बहुमूल्य वस्त्र पहने हैं। इत्रों की सुगंध आ रही है, गाजे-बाजे बज रहे हैं। यह देखकर वह आदमी विचार करने लगा कि राजा के गुरु का तो राजा सहित सभी लोग सम्मान करते हैं। फिर इन्हें इतना आडंबर दिखाने की क्या आवश्यकता। अधिक आडम्बर देखकर मुझे मालूम होता है, कि मेरी पत्नी और दर्जी के समान यह भी पूरे बेईमान होंगे। मेरा विश्वास है कि यही बालकों को चुराने वाले भी हैं। ऐसा विचार कर उसने सिपाहियों को आदेश दिया कि यही बालकों के चोर हैं इसलिए सिपाहियों इन्हें गिरफ्तार कर लो। जब राजा को समाचार ज्ञात हुआ तो वहां आकर उसने गुरु को प्रणाम किया। बालक पकड़ने की जांच कराई तो वहां नगर से बहुत से चोरी हुए बच्चे पाए गए। बात यह पता लगी थी कि जब राजगुरु धूमधाम से आते थे, तो लौटती बार कुछ बालकों की चोरी कराकर अपने आश्रम ले जाते थे। राजगुरु होने के कारण राजा या कोई अन्य पुरुष उन पर संदेह भी नहीं कर पाता था। कि गुरु बालकों के चोर होंगे। जिन लोगों के बालक राजगुरु के आश्रम पर मिले, वे लोग उन्हें वहां से अपने साथ में ले आए।

राजा ने उस आदमी को बुलाकर कहा- मैं तुमसे प्रसन्न हूं, कि तुमने बालकों के चोर का पता लगा लिया, परंतु यह बताओ कि राजगुरु पर तो कोई बालकों को चुराने का संदेह भी नहीं कर सकता था। परंतु तुमने उन्हें किस प्रकार चोर माना।

तब वह आदमी कहने लगा कि आज की दुनिया में मेरा अनुभव है कि जिस का अधिक आडंबर देखो उसी को अधिक बेईमान समझो। इसके बाद उसने राजा को आपबीती घटनाओं को सुनाया। जिसे सुनकर राजा ने उसे बहुत सम्मान दिया। गंगाराम पटेल बोले कि हे बुलाखी! तुम यही घटना आज देख कर आए हो। अब मैंने तुम्हारा सब आश्चर्य दूर कर दिया है। रात भी अधिक हो गई है सवेरे जल्दी उठना है इस कारण तुम सो जाओ।
 स्थान भावनगर (गंगाराम और बुलाखी दास नाई की कहानियां)

स्थान भावनगर (गंगाराम और बुलाखी दास नाई की कहानियां)

 स्थान भावनगर (गंगाराम और बुलाखी दास नाई की कहानियां)

प्रातः काल उठकर गंगाराम पटेल तथा बुलाखी दास ने अपने शौच आदि नित्य कर्म किए फिर नाश्ता करके अपना सब सामान संभाला। उसके बाद जूनागढ़ से प्रस्थान किया रास्ते में उन्होंने देखा कि इस क्षेत्र में निवास बड़े धार्मिक, दयालु और धनाढ्य हैं। उन्होंने रास्ते में बहुत से मंदिर भी देखें जहां सदावर्त लगे हुए थे। वहीं महात्माओं तथा भूखे लोगों को भोजन दिया जाता था। इस प्रकार अनेक प्राकृतिक दृश्यों को देखते हुए वह भावनगर में आए। भावनगर गुजरात का एक प्रसिद्ध शहर है। यहां शहर के किनारे एक सुंदर बाग में आकर ठहरे। बुलाखी नाई ने सब सामान ठीक प्रकार से लगा दिया तो उसके बाद गंगाराम पटेल ने ₹50 बाजार से सामान लाने को दिए। बुलाखी दास खाने का सामान लेकर बाजार से जिस समय वापस आ रहा था, तो उसने देखा की एक बहुत बड़ा जुलूस निकल रहा है उसमें एक वृद्ध पुरुष तथा एक वृद्ध महिला भी थी। इनका एक स्थान पर अभिनंदन हो रहा था। बुलाखी दास ने वहां खड़े हुए लोगों से पूछा कि यह जुलूस किस कारण से निकाला जा रहा है?

लोगों ने उसे बताया कि यह वृद्ध और वृद्धा दोनों पति-पत्नी हैं। कई साल पहले इन्हें मृत घोषित कर दिया था। यह शहर के प्रसिद्ध सेठ और सब जनता के प्रिय तथा हितकारी हैं। इनके मरने के समाचार है सब जनता बहुत दुखी थी, परंतु आज यह जीवित यहां आए हैं तो जनता ने इसी उपलक्ष्य में इनका जुलूस निकालकर खुशी मनाई है। जगह-जगह दोनों का अभिनंदन हो रहा है। बुलाखीदास को यह बात सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ और वह कहने लगा कि कई साल पहले जो व्यक्ति मर चुके थे आज भी जीवित कैसे हो गए हैं? और उनका जुलूस इस उत्साह से क्यों निकल रहा है?

अपने मन में विचार करता हुआ बुलाखी नाई सामान लेकर पटेल जी के पास आया और उनके सामने सामान रखकर कहने लगा- पटेल जी! अब तो मुझे आज्ञा दो। इतनी सुनकर गंगाराम पटेल कहने लगे कि मालूम होता है, तुम कोई अजूबा चरित्र देखकर आए हो। तभी यह बात कह रहे हो अब तुम पहले तो खाना बनाओ खाओ, रोज की भाँति सोते समय मैं तुम्हारी बात का जवाब दूंगा। गंगाराम पटेल की बात सुनकर बुलाखी दास पानी भर कर लाया, चूल्हा जलाया। फिर दोनों ने मिलकर भोजन बनाकर खाया। बुलाखी नाई पटेल जी का बिस्तर लगा दिया और हुक्का भरकर उनके सामने रख दिया। फिर बर्तन साफ कर अपना सब सामान ठिकाने पर लगाया और पटेल जी के पैर दबाने लगा और पटेल जी से बोला कि आपने कहा था कि सोते समय जो भी बात है उसका जवाब दूंगा। अब जवाब दो।

इतनी सुनकर गंगाराम पटेल बोले- बताओ तुमने आज क्या अनोखी बात देखी है? इतना सुनकर बुलाखी नाई बाजार में देखा हुआ वह दृश्य बयान कर दिया। इतनी बात बुलाखी नाई ने सुनकर गंगाराम पटेल- देखो, फौज में नक्कारा और बात में हुँकार जरूरी है। सो तुम जब हँकारा देते रहोगे तब तक मैं बात कहूंगा। जब हुंकारा देना बंद कर दोगे तो मैं भी बात बंद कर दूंगा। यह कहकर गंगाराम पटेल बात कहने लगे और बुलाखी नाई हुंकारा देने लगा। गंगाराम पटेल जी बोले-

इस नगर में एक समय सेठ जीवनलाल रहते थे। चंपा नाम की उनकी पत्नी थी। वह दोनो वृद्ध हो गए थे। परंतु उनके कोई संतान नहीं हुई थी। संतान के दुख में वह दुखी रहते थे। एक दिन चंपा अपने पति से कहने लगी।
दोहा
अब तक मेरे हैं प्रभु, हुई नहीं संतान।
ब्याह दूसरा कीजिए, भली करे भगवान।।
अपनी पत्नी की बात सुनकर सेठ बोले-
दोहा
हो करके रहता वही, जो विधि रचा विधान।
कैसे हो सकती प्रिय, बिना भाग्य संतान।।
हे प्यारी! संतान भाग्य से होती है। यदि मैं दूसरा ब्याह कर लूं और फिर भी संतान ना हो तो क्या होगा। इसलिए ऐसे ही रहना ठीक है। अब तक किसी को बुढ़ापे में ब्याह करके सुख नहीं मिला। इस सेठ ने सेठानी को बहुत समझाया परंतु वह ब्याह के लिए हठ पकड़ गई। अपनी पत्नी का हठ देखकर थोड़े दिन में एक 20 वर्ष की कन्या से विवाह कर लिया। सेठ जी विवाह कर नई वधू को अपने संग लाए तो दरवाजे पर आकर नई पत्नी कहने लगी-
दोहा
अलग रहूंगी सौत से, सुनो नाथ चितलाय।
कमरा मेरे लिए एक, खाली देए कराय।।
नई वधू की ऐसी बात सुनकर सेठ कहने लगा-
दोहा
पत्नी मेरी वृद्ध है, सभी गुणों की खान।
मिलकर के उससे रहो, पाओ सुक्ख महान।।
सेठ ने बहुत समझाया मगर नई पत्नी कहने लगी कि एक म्यान में दो तलवार नहीं समा सकती। सेठ ने परेशान देखकर सब हाल अपनी पहली पत्नी से कहा जिसे सुनकर उसने एक कमरा नई बहू के लिए अलग रहने को खाली कर दिया। नई बहू उस कमरे में आई और रहने लगी।

सेठ का एक मुनीम था जिसकी उम्र लगभग 24 साल की थी। थोड़े दिन में नई बहू की उस मुनीम से आंख लड़ गई तो वह दोनों छिपकर अपनी वासना की तृप्ति करने लगे। मोहल्ले में मुनीम ने खबर कर दी कि सेठ पागल हो गए हैं। धीरे-धीरे सेठ के पागल होने की खबर सब नगर में फैल गई। सेठ ने यह बात सुनी तो उसे बड़ा दुख हुआ, परंतु उसकी समझ में कोई बात नहीं आई। सेठ की पहली पत्नी ने मुनीम और सेठ की पत्नी का व्यवहार ताड़ लिया था। वह अपने पति से कहने लगी कि तुम्हारे मुनीम ने तुम्हारे पागल होने की खबर उड़ाई है। उसके नई बहू से दूषित संबंध हैं। यह लोग किसी षड्यंत्र से हम तुम दोनों को मरवा कर आप आनंद से जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। सेठ ने कहा कि अब मैं होशियार रहूंगा।

मुनीम और सेठ की नई पत्नी आपस में एक साथ रहती थी। एक दिन मुनीम ने सेठ की नई पत्नी को समझाया कि कहीं ऐसा ना हो कि पहली पत्नी को सेठ सभी जायदाद दे दें। इसलिए उचित है कि सेठ से उसकी संपत्ति को अपने हक में लिखवालूं। सेठ की नई पत्नी ने भी इस का समर्थन किया। मुनीम उस शाम को शराब पीकर आया और एक लिखा हुआ पत्र सेठ के सामने रख दिया। उसने सेठ को पिस्तौल दिखाकर जबरन उस कागज पर हस्ताक्षर करा लिए।
सेठ ने मरने के डर से उस पर हस्ताक्षर कर दिए। अब मुनीम और सेठ की नई पत्नी स्वच्छंद होकर रहने लगे। फिर एक दिन मुनीम ने सेठ को भोजन के साथ विष खिलाकर एक बड़े नाले में बहा दिया, और दूसरे दिन मोहल्ले में खबर उड़ा दी कि सेठ पागल थे। ना जाने वह रात में कहां चले गए। यह खबर सुनकर लोग बहुत दुखी हुए। अब पहली बहू के दुख का ठिकाना भी ना रहा। बेचारी बहुत रोई मगर क्या करती?

एक दिन उस मुनीम ने सेठ के कपड़ों में खून के कुछ दाग लगाकर और हड्डियों का एक पंजर तलाश कर के मोहल्ले में एक खबर सुनाई की। जंगल में सेठ की हड्डियां और वस्त्र मिले हैं, ऐसा मालूम होता है कि उन्हें जंगल में कोई जानवर खा गया। मोहल्ले के लोग वहां गए और सेठ के कपड़ों तथा हड्डियों के पंजर को उठा लाए और वैदिक रीति से दाह संस्कार कर दिया।
अब सेठ की नई पत्नी और मुनीम, पति-पत्नी की भाँति मकान में निडर होकर रहने लगे। और सेठ की पहली पत्नी को दुख पहुंचाने लगे। वह कहने लगी मैं सेठ की पत्नी हूँ। उसकी संपत्ति मालिक हूं। मुझे सेठ के मरने की बात में भी बहुत लोगों का षड्यंत्र दिखता है। मैं यह सब पुलिस को बताऊंगी। यह सुनकर मुनीम और सेठ की नई पत्नी ने विचार किया कि अभी मामला ताजा है। इसलिए थोड़े दिन तो इसे सुख से रखना चाहिए। जिससे यह सेठ को भूल जाए फिर इसका भी कुछ इंतजाम कर देंगे। यह विचार कर सेठ की नई पत्नी ने बनावटी प्रेम दिखाकर उसकी खुशामद की और कहा तुम मुझसे बड़ी हो मैंने बड़ी भूल की है, जो तुम्हें कष्ट दिया है, अब कष्ट नहीं दूंगी तुम्हें बड़ी बहन बना कर रखूंगी।

जिस नाले में सेठ को जहर खिलाकर फेंका गया था, आगे चलकर उस के किनारे एक महात्मा की कुटिया थी। महात्मा की नजर सेठ की लाश पर पड़ी तो उसने उसे निकलवाया। उसने देखा कि यह मरा नहीं है, बल्कि किसी ने जहर खिला दिया है। महात्मा ने जड़ी बूटियों से उसका इलाज किया तो सेठ का विष उतर गया और उसे होश आ गया। महात्मा ने उसे अच्छी तरह रखा जिससे कुछ दिनों में वह स्वस्थ हो गया। वह सेठ महात्मा का शिष्य होकर उसी स्थान पर भगवान का भजन करने लगा। अब उसका हृदय समाज से ऐसी घृणा करने लगा कि उसने अपने घर जाने का भी विचार छोड़ दिया। उधर मुनीम आनंदपूर्वक सेठ की नई पत्नी के साथ बिहार करता रहा। एक दिन उसने पहली पत्नी को भी विष देकर नौकर से रात में उसी नाले में फिंकवा दिया और महल में खबर करदी की सेठ की मृत्यु से दुखी होकर उसकी पत्नी भी ना जाने कहां चली गई है। जब यह बात मोहल्ले वालों ने सुनी तो उन्हें बहुत दुख हुआ। परंतु करते भी तो क्या करते?

सेठ की वृद्धा पत्नी की लाश भी उस नाले में बहती हुई उसी महात्मा की कुटिया के पास पहुंची तो महात्मा ने उसे भी निकलवाया और उसका भी जड़ी बूटियों से इलाज कर विष दूर कर दिया। जब उसे होश आया तो सेठ ने बताया कि यह तो मेरी पत्नी है। यह सुनकर महात्मा बहुत प्रसन्न हुआ और स्त्री को भी वही रखा। जब वह स्वस्थ हो गई तो उसने भी उस कुटी पर रहकर भगवान का भजन करने का विचार किया और अपने पति के सहित कुटी पर रहकर भगवान का भजन तथा महात्मा और अपने पति की सेवा करने लगी। महात्मा ने उन दोनों को समझाया कि जल्दी से जल्दी ही ऐसा समय आने वाला है कि मैं तुम्हें इस कुटी से तुम्हारे मकान को ले चलूंगा। पति-पत्नी दोनों ने महात्मा की आज्ञा शिरोधार्य मानकर उनके वचनों को मानने का वचन दिया।

थोड़े दिन के बाद मुनीम ने सोचा कि सेठ और वृद्ध सेठानी का अंत हो चुका है। मेरी इन बातों का पता सेठ की नई पत्नी को ही है। यदि इसको जा से मरवा दिया जाए, तो मैं इस सेठ की सभी जायदाद का अकेला मालिक बन जाऊं। उसने जिस नौकर से सेठ-सेठानी को जहर दिलवाया था। उसे ₹5000 देने का वादा करके अपनी ओर मिला लिया। रात में सेठ जी की सोती हुई नई पत्नी को भी चाकू से गोद दिया और उसी नौकर से गड्ढा खोदवा कर उसमें गढ़वा दिया। जब नौकर ने ₹5000 मांगे तो उसे मारने को पिस्तौल दिखा दी नौकर मुनीम की मनसा समझ गया और वहां से भागकर पुलिस के दफ्तर में गया। और सेठ, सेठानी को विष देने तथा नई सेठानी को जान से मारने की सभी बातें पुलिस को बताई। पुलिस अधिकारी मकान पर छापा मारकर सेठ की नई पत्नी की लाश गधे से निकालकर मुनीम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। 

जब यह समाचार एक दिन महात्मा ने कुटी पर सुना तो उसने सेठ-सेठानी को सम्मानपूर्वक उस नगर में भेजा। लोगों ने सेठ-सेठानी को पहचानकर बड़ी खुशी मनाई और उसी खुशी में जुलूस निकाल कर उनका जगह-जगह पर सम्मान किया। हे बुलाखी! लोग सच कहते हैं, बुराई का फल बुरा होता है और भलाई का भला। तुम जिन सेठ सेठानी का सम्मान होते हुए देख आए हो वह यही दोनों पति-पत्नी है। जिन्हे उनके मुनीम ने षड्यंत्र करके मृत घोषित करवाया था। देखो बुढापे में ब्याह करना बहुत बुरी बात है। दो पत्नी वाले किसी पुरुष को सुख नहीं मिलता, अब रात बहुत हो गई है इसलिए सो जाओ।

13 July, 2020

स्थान जूनागढ़ (गंगाराम पटेल और बुलाखी दास नाई की कहानियां)

स्थान जूनागढ़ (गंगाराम पटेल और बुलाखी दास नाई की कहानियां)

स्थान जूनागढ़ – गंगाराम पटेल और बुलाखी दास नाई

 जब बुलाकी नाई ने गंगाराम पटेल के साथ द्वारिका सुदामापुरी, सोमनाथ, मालिका तीर्थ तथा सत्ताधार आदि के दर्शन कर लिए और लौटने का विचार किया तो गंगाराम पटेल कहने लगे-
दोहा
होता है ना हर जगह, आना बारंबार।
आए हैं तो देख लें, चलकर के गिरनार।।
गंगाराम पटेल जी कि इतनी बात सुनकर बुलाखीदास नाई कहने लगा हे पटेलजी यह बात तो मैं भी आपसे कहने वाला ही था। क्योंकि
दोहा
सुन रक्खा गिरनार है, अतिशय शोभाखान।
गुफा अनेकन है वहां, संतन के स्थान।।
दर्शन वहां के किए से, दूर हो तो सब पाप।
इस कारण चलकर वहां, दर्शन कीजै आप।।
आपस में ऐसी सलाह मिलाकर बुलाखी नाई ने सब सामान तैयार किया और अपना प्रस्थान गिरनार को किया। चलते-चलते वह नरसी जी की पावन जन्मभूमि जूनागढ़ में पहुंच गए। वहां उन्होंने दामोदर कुंड में स्नान किया। नरसी जी का जन्म स्थान, पुराना किला, गिरनार पहाड़ पर भतृहरि गुफा, राम मंदिर, जैन मंदिर, गोमुख, अम्बाजी का मंदिर, गोरख धूना, दत्तात्रेय जी की चरण पादुका, कमंडल, कुंड, मुचुकुंद गुफा इत्यादि देख कर वह जूनागढ़ लौट आए और एक बगीची पर अपना आसन लगा दिया।

गंगाराम पटेल ने बुलाखी को सामान लाने के लिए रुपए दिए। बुलाखी बाजार को गया और वहां से अपना सामान खरीद कर बगीची की ओर आ ही रहा था, तो शहर के बाहर उसने एक स्वच्छ तालाब पानी से भरा हुआ देखा। उसमें शोभायमान कमल के फूल खिले हुए थे तालाब की ओर से संगीत की मनोहर ध्वनि तो आ रही थी, परंतु वहां गाने बजाने वाला कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था। बुलाखी को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह सामान लेकर सीधा बगीची पर आया और अनमना सा बैठ गया बोला मुझे घर जाना होगा।

बुलाखी नाई की बात सुनकर गंगाराम पटेल ने कहा कि अरे अब तो हम अपने घर को ही लौटेंगे। पहले भोजन बनाओ, खाओ फिर रोज की भांति आज भी सोते समय तुम्हारी समस्या का निदान कर तुम्हें संतुष्ट कर लूंगा। तब बुलाखी नाई पानी भरकर लाया बर्तन साफ किए फिर चूल्हा जलाकर खाना बनाया और खाया। बुलाखी ने पटेल जी का बिस्तर लगा कर हुक्का भर के रख दिया। सब सामान ठीक प्रकार से रखकर बुलाखी, पटेल जी के पांव दबाने लगा। तब पटेल जी ने मुस्कुराते हुए कहा भाई बुलाखी! आज तुम जो अनोखी बात देखकर आए हो वह मुझे बताओ। बुलाखी नाई कहने लगा कि आज मैं जब खाने पीने का सामान लेकर वापस आ रहा था, तो रास्ते में शहर के बाहर एक विशाल तालाब देखा था। जो स्वच्छ जल से भरा हुआ था। उसमें सुंदर सुहाने कमल खिल रहे थे कुछ लोग नौका विहार कर रहे थे। उस तालाब की ओर से गाने बजाने की बड़ी मनोहर ध्वनि सुनाई दे रही थी। परंतु वहां कोई गाने बजाने वाला दिखाई नहीं दे रहा था, ना वहां कोई ऐसा स्थान ही था जहां गाना बजाना हो सकता है। यह देख कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। आप कृपा करके बताएं कि यह कौन सा तालाब है?

गंगाराम पटेल कहने लगे एक ब्राह्मण था। जिसका विवाह नहीं हुआ था। उसने मन में  विचार किया कि भगवान ने अच्छा ही किया जो कि मैं गृहस्थी की सब बाधाओं से दूर हूं। तब मुझे परलोक सुधारना चाहिए। वह अपना घर छोड़कर निकल पड़ा और महात्मा हो गया। उसने बहुत कठोर तप किया किसी भी सांसारिक वस्तु पर ध्यान न देकर सदैव भगवान में लीन रहने लगा। कई-कई दिन निराहार उपवास किए और पानी के सहारे ही अपना जीवन निर्वाह किया। उसकी इस कठिन तपस्या से इंद्र का सिंहासन हिलने लगा। इंद्र भयभीत हो गए और नारद जी से कहने लगे कि हे मुनिदेव क्या कारण है कि आज मेरा सिंहासन चल रहा है।

देवराज की यह बात सुनकर नारदजी कहने लगे
दोहा
एक तपस्वी तप करे, जूनागढ़ दरम्यान।
तपसे सिंहासन हिला, सत्य करूं बखान।।
पूरन तप वह जो करे, लीजे आप विचार।
इंद्रासन पर आयके, कर ले वह अधिकार।।
देव ऋषि की बात सुनकर इंद्र चिंतित हुए और नारद जी से बोले
दोहा
मुझसे जो मुनिदेव यह, सिंहासन छिन जाय।
बात बिगड़ जाय सभी, अब कछु करो उपाय।।
इंद्रदेव की बात सुनकर नारदजी कहने लगे कि आप कुछ उपाय करें। साहस खोने से कोई लाभ नहीं, उनके जाने के पश्चात इंद्र ने विचार किया कि किसी अप्सरा को बुलाकर उस तपस्वी के पास भेजा जाए, तो उसका तप भंग करेगी। अप्सरा के प्रेम में आसक्त होकर तप से विमुख हो वह तपस्वी अप्सरा के साथ बिहार करने लगेगा। तो उसकी शक्ति क्षीण हो जाएगी।

इस प्रकार विचार करके इंद्रदेव ने एक अति चतुर अप्सरा को बुलाकर कहा जूनागढ़ में एक तपस्वी तपस्या कर रहा है। जिससे मेरा सिंहासन ही हिल गया है। अब तुम अपने समाज सहित वहां जाओ और उस तपस्वी को मोहित करके उसको सबसे भ्रष्ट करो।

इंद्रदेव के कहे अनुसार अप्सरा अपने समाज सहित उस स्थान पर आई जहां तपस्वी तपस्या कर रहा था।

उसने अपनी माया से एक सुंदर उपवन और एक विस्तृत सुंदर सरोवर की रचना की। जिसमें सुंदर कमल के फूल खिले हुए थे और भंवरे गुंजन कर रहे थे। इसके बाद उस सुंदर उपवन में अपने साथियों के सहित अप्सरा ने संगीत आरंभ किया था। जिन्होंने नाना प्रकार के साज बजाए। अप्सरा ने पंचम स्वर में मन को मोहने वाली रागिनी गाई तो सारा उपवन गूंज उठा और जो तपस्वी समाधि लगाए बैठा था। उसकी समाधि टूट गई और उसका ध्यान और अप्सरा के संगीत की ओर गया। वह तपस्वी अपना आसन छोड़कर उधर को चल दिया, जिधर से अप्सरा के गाने की मधुर आवाज आ रही थी।

जब तपस्वी अप्सरा के निकट पहुंचा तो अप्सरा ने उसको कनखियों से देखा। अब उसने और भी अधिक मधुर गायन से उसके चित्त को अपनी ओर आकर्षित किया। जिसके बाद तपस्वी भगवान का ध्यान करना बिल्कुल भूल गया और उस अप्सरा के वशीभूत हो कहने लगा।
कुंडली
बतलादे तू कौन है, हे मृगनैनी नारि।
भूला मैं जप-तप सभी, तेरी छटा निहारि।।
तेरी छटा निहारि, हृदय में मैं अपने हरसाया।
सुन तेरा संगीत यहां तक, आसन से आया।।
एक बार फिर मुझे, रागिनी मधुर सुना दे।
आई है किस लिए, यहां पर तू बतला दे।।
तपस्वी की इतनी बात सुनकर अप्सरा कहने लगी
कुंडली
आई हूं स्वर्गलोक से, सुन तपस्वी चितलाय।
सेवा करने आपकी, स्वामी दिया पठाय।।
स्वामी दिया पठाय, दरशकर चित हरसाया।
धन्य हमारा भाग, आपका दर्शन पाया।।
जो कुछ आज्ञा देउ करूं तो अब हूं सेवकाई।
इच्छा पूरन करन आपकी हूँ मैं आई।।
अप्सरा की ऐसी बात सुनकर तपस्वी बड़ा आनंदित हुआ। बोला मैंने अब तक संसार में तुम्हारे समान सुंदर स्त्री नहीं देखी और ना कोई ऐसा सुरीला संगीत सुना है।

मेरा मन तुम्हारी सुंदरता को देखकर ऐसा मोहित हो गया है। कि मैं यही चाहता हूं कि तुम सदा मेरे नेत्रों के सामने रहो और अपने मधुर संगीत द्वारा मेरी इच्छा पूर्ण करती रहो।

तपस्वी की यह बात सुनकर अप्सरा कहने लगी आप एक तपस्वी हैं आपकी इच्छा पूरी करना तो मेरा परमकर्तव्य तथा धर्म है। मैं आपकी आज्ञा को शिरोधार्य कर पालन करूंगी। अब आप मुझे सेवा की आज्ञा तो दीजिए। मैं वही करूंगी जिसे करके आपको सुख पहुंचे।

अप्सरा की यह बात सुनकर तपस्वी कहने लगा यदि तुम यहां उपवन में रह अपने संगीत एवं सहवास से मेरी इच्छा पूरी करोगी तो समाज वाले देखकर हसेंगे। अतः किसी अदृश्य स्थान में तुम मेरी कुछ समय तक इच्छा पूरी कर सको तो मैं अपने को अत्यंत भाग्यशाली समझूंगा।

अप्सरा ने यह बात सुनी तो समझ गई कि अब तो तपस्वी मेरे वश में है। इससे अपने बिगाड़ का कुछ भय नहीं और अब मैं आसानी से इंद्रदेव का कार्य पूरा कर सकूँगी। वह कहने लगी मैं कोई साधारण स्त्री नहीं हूं। स्वर्गलोक की रहने वाली हूं। अब तक मैं किसी पुरुष पर मोहित नहीं हुई हूं और ना किसी के साथ बिहार ही किया है। यदि आप सदैव मेरे साथ बिहार करने का प्रण करें तो मैं आपकी इच्छा पूरी कर सकती हूं। नहीं तो अपने स्थान को चली जाऊंगी।

अप्सरा की इतनी बात सुनकर तपस्वी बोला कि मेरी भी यही इच्छा है, जो तुम्हारी है। मेरा भी विवाह नहीं हुआ और ना मैंने अब तक किसी स्त्री पर दृष्टि डाली है। मेरी इच्छा है कि मेरा तुमसे आजीवन बिहार होता रहे तो अच्छा है। इतनी सुनकर अप्सरा कहने लगी कि ऐसा सुख तो आप जैसे बड़े तपस्वी जनों को ही प्राप्त हो सकता है, सबको नहीं। अब मैं आप जैसी इच्छा कर रहे हैं वैसा ही सदैव करूंगी।

अपने मन में विचार कर अप्सरा ने इंद्रदेव के कार्य को सिद्ध करने का उचित उपाय किया। उस सरोवर के नीचे उसने अपनी माया से एक ऐसे बहुत सुंदर भवन की रचना की जो कि दिखाई नहीं देता था। उस भवन के ऊपर जल भरा हुआ था। जिसमें कि सुहाने सुहाने कमल भी खिल रहे थे। भवरे फूलों पर गुंजार कर रहे थे।

भवन में अनेकों मणियाँ लगी हुई थी। जिनसे की अद्भुत प्रकाश होता था। स्वर्ग जैसे समस्त सुखों के साधन उस भवन में उपलब्ध थे। अप्सरा अपने साथियों सहित उस तपस्वी सहित निवास करने लगी। अन्य कक्षाओं में अपने साथियों को ठहराया और स्वयं अप्सरा तपस्वी से बिहार करने लगी। जब भी तपस्वी को संगीत सुनने की इच्छा होती है तभी अप्सरा अपने साथियों सहित वहां गाना बजाना आरंभ कर देती है। हे बुलाखीदास! इस तालाब में जल के नीचे उसी अप्सरा द्वारा बनाए हुए माया का भवन है। जो किसी को दिखाई नहीं देता और वहां अप्सरा उस तपस्वी सहित बिहार करती है। उस अप्सरा के साथी भी दूसरे कमरे में रहते हैं। तुमने जो गाने बजाने की आवाज सुनी है वह उसी अप्सरा और उसके साथियों की है। अब तुम्हारी बात का जवाब मिल गया रात भी अधिक हो गई है अतः अब सो जाओ क्योंकि सवेरे जल्दी उठना है।

10 July, 2020

पांचवीं पुतली लीलावती की कहानी- दानवीर विक्रमादित्य

पांचवीं पुतली लीलावती की कहानी- दानवीर विक्रमादित्य

पांचवीं पुतली लीलावती की कहानी

पांचवे दिन राजा भोज सिंहासन पर बैठने की तैयारी कर ही रहे थे कि पांचवीं पुतली लीलावती ने उन्हें रोक दिया। लीलावती बोली, राजन, क्या आप विक्रमादित्य की तरह दानवीर और शूरवीर हैं? अगर हां, तब ही इस सिंहासन पर बैठने के अधिकारी होंगे। मैं आपको कथा सुनाती हूं, परम दानव‍ीर विक्रमादित्य की।

एक दिन विक्रमादित्य दरबार में राजकाज निबटा रहे थे। तभी एक विद्वान ब्राह्मण दरबार में आकर उनसे मिला। उसने कहा कि अगर वे तुला लग्न में अपने लिए कोई महल बनवाएं तो राज्य की जनता खुशहाल हो जाएगी और उनकी भी कीर्ति चारों तरफ फैल जाएगी।

विक्रम को उसकी बात जंच गई और उन्होंने एक बड़े ही भव्य महल का निर्माण करवाया। कारीगरों ने उसे राजा के निर्देश पर सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात और मणि-मोतियों से पूरी तरह सजा दिया।

महल जब बनकर तैयार हुआ तो उसकी भव्यता देखते बनती थी। विक्रम अपने सगे-सम्बन्धियों तथा नौकर-चाकरों के साथ उसे देखने गए। उनके साथ वह विद्वान ब्राह्मण भी था। विक्रम मंत्रमुग्ध हुए साथ ही वह ब्राह्मण मुंह खोले देखता रह गया। बिना सोचे उसके मुंह से निकला-'काश, इस महल का मालिक मैं होता!' राजा विक्रमादित्य ने यह सुनते ही झट वह भव्य महल उसे दान में दे दिया।

ब्राह्मण के तो मानो पांव ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। वह भागता हुआ अपनी पत्नी को यह समाचार सुनाने पहुंचा। इधर ब्राह्मणी उसे खाली हाथ आते देख कुछ बोलती उससे पहले ही उसने उसे हीरे-जवाहरात और मणि-मुक्ताओं से जड़े हुए महल को दान में प्राप्त करने की बात बता दी।

ब्राह्मण की पत्नी की तो खुशी की सीमा न रही। उसे एकबारगी लगा मानो उसका पति पागल हो गया और यों ही अनाप-शनाप बक रहा हों, मगर उसके बार-बार कहने पर वह उसके साथ महल देखने के लिए चलने को तैयार हो गई। महल की शोभा देखकर उसकी आंखे खुली रह गईं।

महल का कोना-कोना देखते-देखते कब शाम हो गई उन्हें पता ही नहीं चला। थके-मांदे वे एक शयन-कक्ष में जाकर निढाल हो गए। अर्द्ध रात्रि में उनकी आंखें किसी आवाज से खुल गई।

सारे महल में महक फैली थी और सारा महल प्रकाशमान था। उन्होंने ध्यान से सुना तो लक्ष्मी बोल रही थी। वह कह रही थी कि उनके भाग्य से वह यहां आई है और उनकी कोई भी इच्छा पूरी करने को तैयार है।

ब्राह्मण दम्पति का डर के मारे बुरा हाल हो गया। ब्राह्मणी तो बेहोश ही हो गई। लक्ष्मी ने तीन बार अपनी बात दुहराई। लेकिन ब्राह्मण ने कुछ नहीं मांगा तो क्रुद्ध होकर चली गई। उसके जाते ही प्रकाश तथा महक- दोनों गायब।
काफी देर बाद ब्राह्मणी को होश आया तो उसने कहा- 'यह महल जरूर भुतहा है, इसलिए दान में मिला। इससे अच्छा तो हमारा टूटा-फूटा घर है जहां चैन की नींद सो सकते हैं।' ब्राह्मण को पत्नी की बात जंच गई।

सहमे-सहमे बाकी रात काटकर तड़के ही उन्होंने अपना सामान समेटा और पुरानी कुटिया को लौट आए। ब्राह्मण अपने घर से सीधा राजभवन आया और विक्रमादित्य से अनुरोध करने लगा कि वे अपना महल वापस ले लें। पर दान दी गई वस्तु को वे कैसे ग्रहण कर लेते।

काफी सोचने के बाद उन्होंने महल का उचित मूल्य लगाकर उसे खरीद लिया। ब्राह्मण खुशी-खुशी अपने घर लौट गया।

ब्राह्मण से महल खरीदने के बाद राजा विक्रमादित्य उसमें आकर रहने लगे। वहीं अब दरबार भी लगता था। एक दिन वे सोए हुए थे तो लक्ष्मी फिर आई।
जब लक्ष्मी ने उनसे कुछ भी मांगने को कहा तो वे बोले- 'आपकी कृपा से मेरे पास सब कुछ है। फिर भी आप अगर देना ही चाहती हैं तो मेरे पूरे राज्य में धन की वर्षा कर दें और मेरी प्रजा को किसी चीज की कमी न रहने दें।'

सुबह उठकर उन्हें पता चला कि सारे राज्य में धन वर्षा हुई है और लोग वर्षा वाला धन राजा को सौंप देना चाहते हैं। विक्रमादित्य ने आदेश किया कि कोई भी किसी अन्य के हिस्से का धन नहीं समेटेगा और अपने हिस्से का धन अपनी सम्पत्ति मानेगा। जनता जय-जयकार कर उठी।

इतना कहते ही पुतली लीलावती बोली, बोलो राजन, क्या इस कथा के बाद तुम इस सिंहासन के योग्य अपने आपको पाते हो? राजा भोज निराश हो गए और अपने कक्ष में लौट गए। अगले दिन राजा को रोका छठी पुतली रविभामा ने।

Story of the fifth dolly Lilavati

King Bhoj was preparing to sit on the throne on the fifth day that the fifth idol Lilavati stopped him. Lilavati quote, Rajan, are you like Monkeys and Knights like Vikramaditya? If yes, only then will the officer be seated on this throne. I tell you the story of Param Danvir Vikramaditya.

One day Vikramaditya was taking over the affairs of the court, when a scholar came to the court in Brahmin Darbar. He said that if they make a palace for themselves in the wedding ceremony, the people of the state will be happy and their reputation will spread all over.

Vikram got his point and he built a magnificent palace. On the instructions of the king, the craftsmen completely punished them with gold and silver, diamonds and gems and gems.

When the palace was ready, its grandeur was seen. Vikram went to see him with his relatives and servants. He was also a scholar Brahmin with him. As Vikram was enchanted, he continued to see Brahmin opened his mouth. Out of his mouth without thinking - 'I wish I could own the palace!' As soon as King Vikramaditya heard this, the grand palace donated it to him.

The Brahmin's feet were not falling on the ground. He ran away to tell his wife this news. Here, before the Brahminic speaks of seeing him empty-handed, he has already told him about getting the money in the diamond-jewels and gem-masked palaces.

Brahmin's wife had no boundaries of happiness. It seemed as if it was a time for her husband to go crazy and she would have been unconsciously bak, but repeatedly telling her, she got ready to walk with her to see the palace. Seeing the splendor of the palace, his eyes were kept open.

Seeing the corner of the palace and seeing when it was evening they did not know. Tired and tired, they fell into a bedroom and disappeared. In half an hour, his eyes were opened with a voice.

The smell spread across the palace and the whole palace was bright. He listened carefully and Lakshmi was speaking. He was saying that with his fate he has come here and is ready to fulfill any of his wishes.
Brahmin couple got worried about fear of couple Brahmini became unconscious. Lakshmi repeated her talk three times. But Brahmin did not ask for anything but went angry. As soon as he gets his light and smell - both disappear

After quite a while, the Brahmin realized the senses and said, "This palace is definitely scary, so donations are found in donation. Better than this, we have a broken house where the sleep of peace can sleep. ' Brahmin got married to wife

Suddenly, after spending the rest of the night in the morning, they wrapped their bags and returned to the old cottage. Brahmin came directly from his house to the Raj Bhawan and requested Vikramaditya to withdraw his palace. But how can they accept the donation given?

After thinking enough, they bought the fair value of the palace and bought it. Brahmin happily returned to his home.

After buying the palace from the Brahmin, King Vikramaditya came and settled in it. At the same time, the court also seemed to be there. One day he was asleep and Lakshmi came back.

When Lakshmi asked them to ask anything, they said, 'I have everything with my grace. Even if you want to give it, then pour the money in my entire state and let my people not lack any thing. '

When they got up in the morning, they came to know that money has rained in all the states and people want to give rain money to the king. Vikramaditya has ordered that no one will fund the share of anybody else and the wealth of his share will be his property. People jaise jai ho ho ho.

So say the effigy of lipstick, say, Rajan, do you find yourself worthy of this throne after this story? King Bhoj was disappointed and returned to his room. The next day Raja stopped the sixth pupil, Ravbhamma.

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