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07 September, 2020

सत्संगति का महत्व पर निबंध – Satsangati Ka Mahatva Nibandh In Hindi

सत्संगति का महत्व पर निबंध – Satsangati Ka Mahatva Nibandh In Hindi

सत्संगति का महत्व पर निबंध – Satsangati Ka Mahatva Nibandh In Hindi

इस निबंध के अन्य शीर्षक-

  • सत्संगति 
  • सठ सुधरहि सत्संगति पाई 
  • सत्संगति की उपादेयता

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. सत्संगति का अर्थ,
  3. सत्संगति से लाभ,
  4. कुसंगति से हानि,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में ही जन्मता और समाज में ही रहता, पनपता और अन्त तक उसी में रहता है। अपने परिवार, सम्बन्धियों और पास–पड़ोस वालों तथा अपने कार्यक्षेत्र में वह विभिन्न प्रकार के स्वभाव वाले व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है। निरन्तर सम्पर्क के कारण एक–दूसरे का प्रभाव एक–दूसरे के विचारों और व्यवहार पर पड़ते रहना स्वाभाविक है। बुरे आदमियों के सम्पर्क में हम पर बुरे संस्कार पड़ते हैं और अच्छे आदमियों के सम्पर्क में आकर हममें गुणों का समावेश होता चला जाता है।

सत्संगति का अर्थ

सत्संगति का अर्थ है अच्छे आदमियों की संगति, गुणी जनों का साथ। अच्छे मनुष्य . का अर्थ है वे व्यक्ति जिनका आचरण अच्छा है, जो सदा श्रेष्ठ गुणों को धारण करते और अपने सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों के प्रति अच्छा बर्ताव करते हैं। जो सत्य का पालन करते हैं, परोपकारी हैं, अच्छे चरित्र ‘ के सारे गुण जिनमें विद्यमान हैं, जो निष्कपट एवं दयावान हैं, जिनका व्यवहार सदा सभी के साथ अच्छा रहता है–ऐसे अच्छे व्यक्तियों के साथ रहना, उनकी बातें सुनना, उनकी पुस्तकों को पढ़ना, ऐसे सच्चरित्र व्यक्तियों की जीवनी पढ़ना और उनकी अच्छाइयों की चर्चा करना सत्संगति के ही अन्तर्गत आते हैं।

सत्संगति के लाभ

सत्संगति के परिणामस्वरूप मनुष्य का मन सदा प्रसन्न रहता है। मन में आनन्द और सद्वृत्तियों की लहरें उठती रहती हैं। जिस प्रकार किसी वाटिका में खिला हुआ सुगंधित पुष्प सारे वातावरण को महका देता है, उसके अस्तित्व से अनजान व्यक्ति भी उसके पास से निकलते हुए उसकी गंध से प्रसन्न हो उठता है, उसी प्रकार अच्छी संगति में रह कर मनुष्य सदा प्रफुल्लित रहता है। सम्भवत: इसीलिए महात्मा कबीरदास ने लिखा है-
“कबिरा संगति साधु की, हरै और की ब्याधि।
संगत बुरी असाधु की, आठों पहर उपाधि॥”
सत्संगति का महत्त्व विभिन्न देशों और भाषाओं के विचारकों ने अपने–अपने ढंग से बतलाया है। सत्संगति से पापी और दुष्ट स्वभाव का व्यक्ति भी धीरे–धीरे धार्मिक और सज्जन प्रवृत्ति का बन जाता है। लाखों उपदेशों और हजारों पुस्तकों का अध्ययन करने पर भी मनुष्य का दुष्ट स्वभाव इतनी सरलता से नहीं बदल सकता जितना किसी अच्छे मनुष्य की संगति से बदल सकता है। संगति करने वाले व्यक्ति का सद्गुण उसी प्रकार सिमट–सिमट कर भरने लगता है जैसे वर्षा का पानी सिमट–सिमट कर तालाब में भरने लगता है। अच्छे आचरण वाले व्यक्ति के सम्पर्क से उसके साथ के व्यक्तियों का चारित्रिक विकास उसी प्रकार होने लगता है जिस प्रकार सूर्य के उगने से कमल अपने आप विकसित होने लगते हैं।

कुसंगति से हानि

कुसंगति सत्संगति का विलोम है। दुष्ट स्वभाव के मनुष्यों के साथ रहना कुसंगति है। कुसंगति छूत की एक भयंकर बीमारी के समान है। कुसंगति का विष धीरे–धीरे मनुष्य के सम्पूर्ण गुणों को मार डालता है। कुसंगति काजल से भरी कोठरी के समान है। इसके चक्कर में यदि कोई चतुर से चतुर व्यक्ति भी फँस जाता है तो उससे बच कर साफ निकल जाना उसके लिए भी सम्भव नहीं होता। इसीलिए किसी ने ठीक ही कहा है-
“काजल की कोठरी में कैसो ह सयानो जाय,
एक लीक काजल की, लागि है पै लागि है।”
इस प्रकार की कुसंगति से बचना हमारा परम कर्तव्य है। बाल्यावस्था और किशोरावस्था में तो कुसंगति से बचने और बचाने का प्रयास विशेष रूप से किया जाना चाहिए क्योंकि इन अवस्थाओं में व्यक्ति पर संगति (चाहे अच्छी चाहे बुरी) का प्रभाव तुरन्त और गहरा पड़ता है। इस अवस्था में अच्छे और बुरे का बोध भी प्राय: नहीं होता। इसलिए इस समय परिवार के बुजुर्गों और गुरुओं को विशेष रूप से ध्यान रख कर बच्चों को कुसंगति से बचाने का प्रयास करना चाहिए।

उपसंहार

हिन्दी में एक कहावत है कि ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। इस कहावत में मनुष्य की संगति के प्रभाव का उल्लेख किया गया है। विश्व की सभी जातियों में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाते हैं जिनसे सिद्ध होता है कि सन्त महात्माओं और सज्जनों की संगति से एक नहीं अनेक दुष्ट जन अपनी दुष्टता छोड़कर सज्जन बन गये। पवित्र आचरण वाले व्यक्ति विश्व में सराहना के योग्य हैं। उन संगति से ही विश्व में अच्छाइयाँ सुरक्षित एवं संचालित रहती हैं।

27 August, 2020

स्थान नारायणी धाम - गंगाराम पटेल और बुलाखी दास की कहानी

स्थान नारायणी धाम - गंगाराम पटेल और बुलाखी दास की कहानी

स्थान नारायणी धाम - गंगाराम पटेल और बुलाखी दास की कहानी

प्रातः काल गंगाराम पटेल और बुलाखी ने सोते से जगने के बाद अपना नित्य कर्म किया। तब बुलाखी कहने लगा कि अब तो अपना गांव भी यहां से करीब ही है भगवान की कृपा से हमारी यात्रा भी सकुशल पूर्ण हो गई है
बुलाखी की बात सुनकर गंगाराम बोले- हे बुलाखी! यहां से हम नारायणी धाम होकर घर चलेंगे। गंगाराम की बात सुनकर बुलाखी पूछने लगा कि यह नारायणी धाम कहां है? और वहां कौन सी देवी हैं और वह क्यों प्रसिद्ध है?
पटेल जी बोले कि नारायणी धाम में कोई देवी नहीं है। यह एक सती का स्थान है और भानगढ़ के पास है। कहते हैं कि एक पति-पत्नी जो उस स्थान से होकर गर्मी के दिनों में जा रहे थे। तो वह वही एक पेड़ के नीचे आराम करने लगे। पति को नींद आ गई, स्त्री पास बैठी थी। उस समय एक काले नाग ने आदमी को डस लिया। स्त्री बहुत दुखी हुई और उसने सोचा कि मेरे पति का प्राणांत हो चुका है। अब मेरा संसार में जीवित रहना व्यर्थ है। मैं यहां अपने पति के साथ ही सती हो जाऊं तो उचित होगा। कुछ ग्वारिया वहां अपनी गाय भैस चरा रही थी। स्त्री ने कहा कि तुम्हारी बड़ी कृपा होगी जो यहां कुछ लकड़ी इकट्ठा कर दो। जिससे मैं पति के शरीर के साथ सती हो जाऊं।

गवरियों ने उसकी सहायता की। कुछ लकड़ी इधर उधर से इकट्ठी कर दी। अपने मृतक पति के शरीर को लेकर साध्वी स्त्री चिता में बैठ गई। उस चिता में अपने आप आग लगी तो ग्वारियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। तब उन्होंने उसे देवी का रूप समझा। गवारिया हाथ जोड़कर कहने लगीं। आप साक्षात देवी हो यहां हमारे पशु बिना पानी पिये बिना रहते हैं। आप कोई ऐसा आशीर्वाद दें जिससे पानी का संकट दूर हो जाए।

सती कहने लगी कि अब से यहां पानी का दुख दूर हो जाएगा। वह सती हो गई और उसके बाद कहते हैं कि उसी चिता में से ही एक झरना बह निकला। आज वहां सब पशु तथा स्त्री पुरुष आराम से पानी पीते हैं।
उस स्थान पर एक मंदिर बन गया और झरने के स्थान पर एक तालाब है। जहां सैकड़ों यात्री नित्य आते जाते हैं। वह दोनों अजमेर से नारायणी धाम को पहुंच गए। वहां पहुंचकर सुंदर रमणीक स्थान देख कर उन्हें बड़ा आनंद हुआ। उन्होंने झरने में स्नान किया। महासती के दर्शन किए और पुजारी से भोग लगवाकर प्रसाद पाया।

जलपान करने के बाद एक वृक्ष की छांव में आसन लगाकर वह विश्राम करने लगे। थोड़ी देर बाद बुलाखी को प्यास लगी तो वह पानी लेने आया। वहां पर उसने पानी पिया और लोटा में पानी भरकर पटेल जी के पास वापस जाना ही चाहता था। कि उसी समय एक स्त्री और अंधा पुरुष वहां आए। अंधा जब उस झरने में नहाया तो उसे आंखों से दिखने लगा। वह स्त्री पुरुष आनंदित हो उठे। नहा धोकर मंदिर से सती का भोग लगाकर खुश होते हुए अपने घर को चले गए।

यह सब देख और मन में विचार करता हुआ। वह पटेल जी के पास आया और उन्हें जल का लोटा दिया और झरने पर देखी वह बात बताई और बोला अब आप कृपा कर बताएं कि वह दोनों स्त्री पुरुष कौन थे? पुरुष कैसे अंधा हुआ था? यहां आकर उसे क्यों दिखने लगा?

तब गंगाराम कहने लगे एक गांव में एक ब्राह्मण रहता था। जिसका नाम सुदर्शन था। शीला नाम की उसकी पत्नी थी जो बड़ी पतिव्रता थी। लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी। एक बार वह दोनों पति-पत्नी तीर्थ यात्रा करते हुए जयपुर में आए और गलताजी पर ठहरे। स्थान बहुत रमणीक है बहुत से महात्मा और संत वहां ठहरे रहते हैं।

एक वयोवृद्ध महात्मा अपना आसन एक ओर लगाए हुए बैठा था। शीला और सुदर्शन उसके पास गए और उस महात्मा के चरण छू कर बैठ गए। सुदर्शन कहने लगा कि ईश्वर ने मुझे धन का तो सुख दिया है, खाने पीने की कोई कमी नहीं है, साधु सेवा तथा तीर्थयात्रा भी कर लेता हूं। परंतु इतना होने पर भी हम लोगों को एक बड़ा दुख है, कि हमारे कोई संतान नहीं है। सुदर्शन की बात सुनकर वयोवृद्ध महात्मा कहने लगे कि मैं तो साधारण साधु हूँ। सुना है बाबा रामदास जो कि हिमालय पर्वत पर रहते हैं। शायद उन के आशीर्वाद से तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो जाए। महात्मा के वचनों को सुनकर सुदर्शन और शीला बहुत प्रसन्न हुए।

आमेर, नरसिंहगढ़ रोड, किशनगढ़ इत्यादि होते हुए उन्होंने पुष्कर जी जाकर स्नान किया। ब्रह्मा जी का मंदिर, पंचकुंड, गौमुखी लीला, सेवरी, नौशेरा, चंडी देवी और मनसादेवी आदि के दर्शन किए और सायंकाल एक महात्मा की कुटी में ठहर गए। उस महात्मा की आयु लगभग 100 वर्ष थी। उसके आश्रम पर 18 वर्ष की एक परम सुंदरी कन्या रहती थी। सुदर्शन ने उस सुंदरी कन्या को देखा तो उसका मन उसकी सुंदरता पर मुग्ध हो गया। सुदर्शन को इस बात उस कन्या को निहारते देखकर उस साधु को बड़ा क्रोध आया और बोला तू जो इस कन्या को इस प्रकार देख रहा है इसलिए तू अब अंधा हो जा।

महात्मा के श्राप से सुदर्शन अंधा हो गया। यह सब देख उसकी पत्नी को बड़ा दुख हुआ और उसने महात्मा से बहुत विनय की कि श्राप को निष्फल कर दें। परंतु वह महात्मा नहीं माना शीला कहने लगी कि मैं भी एक पतिव्रता स्त्री हूं, मैं चाहूं तो तुम्हें शाप दे सकती हूं। परंतु मैं ऐसा नहीं करूंगी क्योंकि इससे मेरा पुण्य समाप्त हो जाएगा। तब दूसरे दिन प्रात काल उठकर शीला ने बाबा रामदास के स्थान का पता लगाया और सुदर्शन का हाथ पकड़कर बाबा रामदास के स्थान पर पहुंच गई। बहुत से संत उनके पास बैठे हुए थे। वह सुदर्शन का हाथ पकड़कर महात्मा जी के सामने ले गई और पति के सहित चरणों में गिर गई और रोते हुए बोली महाराज हम पति-पत्नी आपके दर्शनों को आ रहे थे तो रात में एक महात्मा की कुटी पर ठहर गए। कल तक मेरे पति ठीक थे, परंतु उस महात्मा के शाप से अंधे हो गए हैं। हे महात्मा आप मुझ दुखिया पर कृपा दृष्टि करें। महात्मा बोले देखो तुम्हारे पति से अनजाने में एक भूल हुई थी। इसने बालकपन में पेड़ पर बैठे हुए एक कबूतर के गुलेल से एक गुल्ला मारा था। उस कबूतर की आंख फूट गई थी। इसी पाप से आज तुम्हारा पति उस महात्मा के श्राप देने से अंधा हो गया है। तू बड़ी धर्म परायण पतिव्रता स्त्री है। पतिव्रताओं की शक्ति का भगवान भी पार नहीं पा सकते। तू अपने पतिव्रता धर्म की शक्ति से उस महात्मा का मनमाना अपकार कर सकते थे। परंतु तूने कुछ भी नहीं किया।

महात्मा कहने लगे बेटी जो करता है भगवान अच्छा ही करता है। मनुष्य तो एक निमित्त मात्र है। उसका तो बहाना हो जाया करता है अच्छे कर्मों का फल अच्छा ही होता है। तेरे पति को उस महात्मा ने शाप दिया है। मैं उसके साथ का निष्फल नहीं बना सकता। हां मैं तुझे एक ऐसा उपाय बताता हूं, जिससे इसको दृष्टि पुनः प्राप्त हो सकती है। तेरे भाग्य के विषय में भी मैंने पता लगा लिया है। अब तू नारायणी धाम से अपने घर को वापस जाएगी तो दो वर्षों में तेरे एक पुत्र रत्न उत्पन्न होगा और उसके बाद में एक-एक करके पुत्री तथा एक पुत्र और होंगे। हे बेटी तुम अपनी पतिव्रता धर्म को इसी प्रकार निभाना। जिस प्रकार अब तक निभाया है।

बाबा रामदास के इन वचनों को सुनकर सुदर्शन तथा शीला बहुत प्रसन्न हुए और आशीर्वाद ले कर चल दिए।

हे बुलाखी भाई तुम उसी सुदर्शन को आज देखकर आए हो। जो अंधे से सूझता हुआ है। अब तुम्हारी सब शंका दूर हो गई होगी। रात भी अधिक हो गई है इसलिए सो जाओ। सवेरे उठकर घर चलना है।

सुबह शौचादि से निवृत होकर दोनों ने अपने घर जयपुर की ओर प्रस्थान किया रेलगाड़ी छुक छुक करती भागी जा रही थी। पटेल जी के सामने बैठा बुलाखी खुशी से झूम रहा था। पटेल जी ने पूछा बुलाखी तुम्हें यात्रा पसंद आई। 
बुलाखी बोला हां महाराज आपके साथ मैंने जितनी भी यात्राएं की है उनमें मुझे सबसे अच्छी लगी है। जो कथाएं आपने सुनाई हैं मनोरंजक ही नहीं थी बल्कि उनमें शिक्षा तथा ज्ञान की बातें भी भरी थी। मैं आपका जन्म जन्म तक ऋणी रहूंगा। गंगाराम पटेल हँसकर बोले- अबकी बार मेरे मन में ब्रज की यात्रा के लिए मथुरा जाने की इच्छा है। देखो परमात्मा कब ऐसा शुभ अवसर देंगे।

19 August, 2020

स्थान अजमेर (बुलाखीदास और गंगाराम पटेल की कहानियां)

स्थान अजमेर (बुलाखीदास और गंगाराम पटेल की कहानियां)

स्थान अजमेर बुलाखीदास और गंगाराम पटेल की कहानियां

प्रातः काल गंगाराम पटेल और  बुलाखीदास नाई सोते से जगे, और उन्होंने शौच आदि नित्य कर्म किया फिर नाश्ता आदि करके सब सामान ठीक किया और चित्तौड़गढ़ से अजमेर की ओर प्रस्थान किया। रास्ते में अनेकों वन पर्वत शोभा दे रहे थे। भीलवाड़ा इत्यादि देखते हुए वह अजमेर में पहुंचे।

अजमेर नगर कभी मेवाड़ राज्य की राजधानी थी। पूरा नगर पहाड़ी से घिरा हुआ है और इसमें बड़े बड़े अच्छे सुंदर रमणीक स्थान हैं। यहां ख्वाजा की दरगाह बड़ी प्रसिद्ध है। अनाह सागर सागर और फाई सागर यहां के शाही तालाब हैं। जहां प्रातः और सायंकाल हजारों स्त्री पुरुषों की भीड़ रहती है। पृथ्वीराज के पुराने किले के अवशेष हैं। तारागढ़ उसी का एक भाग है जहां अनंगपाल की बाबरी आदि प्रसिद्ध स्थान और अड़ाई दिन का झोपड़ा आदि ऐतिहासिक भवन हैं। हनुमान मंदिर तथा दौलत बाग अनाह सागर के पास है। जहां दर्शकों की भीड़ बनी रहती है। आंतर नागफनी तथा झरनेश्वर यहां पहाड़ों के ऊपर अच्छे रमणीक स्थान हैं। जहां अधिकांश साधु संत आकर ठहरते हैं। भाटा बाबरी में ही चंद्रभाट का पृथ्वीराज के समय का मंदिर है। बुलाखी और गंगाराम शाम के समय आकर इस भाटा बाबरी पर ठहरे। गंगाराम ने बुलाखी को खाने का सामान लाने को रुपए दिए। बुलाखी नगर में सामान खरीदने के लिए गया। सामान खरीद कर वापस आ रहा तो उसके मन में आया कि झरनेश्वर महादेव के भी दर्शन करता चलूं।

झरनेश्वर महादेव पहाड़ के ऊपर हैं। यहां पहाड़ों में से एक झरना है। किंतु उसका फिर आगे यह पता नहीं चलता कि उसका पानी कहां चला जाता है। उस झरने को पक्का बना कर एक कुएं का रूप दे दिया गया है। इसका पानी कभी समाप्त नहीं होता वहां अनेकों संत महात्मा रहते हैं तथा महंत लोग आते जाते हैं। सब उसी झरने के पानी का प्रयोग करते हैं।

बुलाखी ने जाकर झरनेश्वर महादेव के दर्शन किए। जब वह नीचे उतरकर झरने के पास आया तो देखा की दो-चार महात्मा तो तथा कुछ और आदमी वहां खड़े हुए हैं। उनके बीच में एक स्त्री तथा एक पुरुष भी है। वह स्त्री हाथ में जल लेकर उस पुरुष से संकल्प कर रही है। ज्यों ही स्त्री ने संकल्प करके पृथ्वी पर जल डाला उसी समय उसकी मृत्यु हो गई। यह देखकर वहां के देखने वाले सभी लोगों को आश्चर्य हुआ। वह भी अपने मन में आश्चर्य कर रहा था। कि संकल्प करने से इस स्त्री की मृत्यु क्यों हो गई?

वह गंगाराम पटेल के पास आया और बोला अब राम-राम लो। मैं अपने घर जा रहा हूं। गंगाराम कहने लगे बुलाखी एक दो दिन में तो हम घर पहुंच जायेंगे। तुमने कोई अनोखी बात देखी होगी तो रोज की भांति खाना बना खा कर सोते समय तुम्हें उसका उत्तर दूंगा।

पटेल जी खाना खाकर जब आराम करने लगे तो बुलाखी ने हुक्का ताजी भर के सामने रखा और वह हुक्का पीने लगे। सब कामों से निश्चिंत होकर वह पटेल जी के पांव दबाने लगा। तो उन्होंने बुलाखी से कहा कि अब बताओ कि आज तुमने ऐसी क्या अजीब बात देखी है। तब सब घटना सुना कर बुलाखी ने कहा अब आप कृपा करके बताएं कि संकल्प करते ही वह स्त्री क्यों मर गई? बुलाखी ने हूँकारा भरने की हामी भरी तो पटेल जी ने भी बात कहना शुरू किया। गंगाराम पटेल बोले- सुनो एक गांव में रामनाथ नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सरस्वती था। रामनाथ के बड़े भाई उससे अलग रहते थे। रामनाथ के कोई संतान नहीं थी, वह दो ही प्राणी थे। संतान का अभाव उन्हें बहुत खटकता था। रामनाथ अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था। वह उसे एक क्षण को भी अकेला छोड़ने को तैयार नहीं था। एक दिन स्त्री रामनाथ से कहने लगी। 
दोहा
सब सुख ईश्वर ने दयौ, दई नहीं संतान।
प्राणनाथ संतान बिन, होता दुःख महान।।
पार परोसी ऊकते, वह कहैं निपूती मोय।
सुनकर उनकी बात को, शर्म आवती मोय।।
अपनी पत्नी की इस प्रकार दुख पूर्ण बातें सुनकर रामनाथ कहने लगा
दोहा
जो कुछु लिखी लिलार में, मेंट सके न कोय।
करम गति जग में प्रबल, पछिताये का होय।।
भाग्य में संतान नहीं है तो चाहे कुछ भी उपाय करो संतान का सुख नहीं होगा। अपने मन में भगवान का ध्यान धर धैर्य धारण करो। सरस्वती कहने लगी कि भगवान ने धन तो दे ही रखा है। हम तुम दो ही प्राणी हैं। चलो अब तीरथ यात्रा करें। शायद वहां किसी संत महात्मा के दर्शन हो जाएं और उनके आशीर्वाद से ही संतान का सुख मिल जाए। इतनी सुनकर रामनाथ कहने लगा।
दोहा
हे प्यारी स्वीकार है, उत्तम तेरा विचार।
तीरथ करने के लिए, होजा अब तैयार।।
अगले ही दिन सरस्वती ने यात्रा का सब सामान, नकद रुपया आदि संभाल कर रख लिया। और दोनों तीर्थ यात्रा को चल दिए। उन्होंने बहुत से तीर्थ स्थानों में दर्शन एवं स्नान किया। शाम को किसी साधु के आश्रम पर वे ठहरे और वहां सत्संग करते थे। इस प्रकार उनके चित्त को बड़ी शांति मिलती थी।

एक दिन की बात है। कि वे दोनों वृंदावन में यमुना के तट पर स्नान करके भजन ध्यान में बैठ गए। कुछ देर बाद ठहरने के स्थान का ध्यान आया तो जंगल में वहां से दो मील के लगभग एक महात्मा का आश्रम बताया था। वहां जाने का विचार उन दोनों ने किया। गर्मी का महीना था, धूप भी तेज पड़ रही थी। वह दोनों लगभग एक मील ही चले होंगे कि दोनों के कपड़े पसीने से भीग गए। रास्ते के किनारे पीपल का एक बहुत बड़ा पेड़ था। दोनों सामान सहित पीपल की छांव में बैठ गए और अपना बिस्तर बिछा कर आराम करने लगे। 
ठंडी ठंडी हवा लगी तो सरस्वती को नींद आ गई और वह अचेत होकर सो गई। रामनाथ को भी झपकी सी आ गई थी। परंतु जैसे ही उसकी आंख खुली तो उसने देखा कि एक काला सांप सरस्वती के पैर में काट कर, पीपल की जड़ में घुस गया। रामनाथ एकदम हड़बड़ा उठा और उसने अपनी पत्नी को झकझोरा किंतु उसे तो काला सांप काट गया था। जिससे उसका दम निकल चुका था।

रामनाथ बहुत दुखी हुआ और उसने समझ लिया कि जब उसकी पत्नी ही नहीं रही तो अब उसका भी संसार में जीवित रहना व्यर्थ है। वह प्यारी पत्नी का वियोग सह नहीं सकता था। इस कारण वह आत्महत्या करना ही चाहता था। कि साधारण स्त्री पुरुष के भेष में वहां शिव पार्वती प्रकट हुए। शिव जी ने रामनाथ से कहा कि तुम इतने दुखी क्यों दिखाई दे रहे हो? इसका क्या कारण है? रामनाथ ने सब बात बताई और कहा कि मैं तो अपनी पत्नी के बिना जीवित नहीं रह सकता। शिवजी उसे समझा कर कहने लगे कि मुझे कुछ सिद्धि प्राप्त है। उसके प्रताप से तुम्हें यह बात बताता हूं कि तुम्हारी पत्नी की आयु पैंतीस साल लिखी हुई थी। वह आयु इसकी पूरी हो गई है और तभी सांप ने इसको काटा है। तुम्हारी उम्र 85 वर्ष लिखी हुई है जिसमें से तुम्हारे 45 साल पूरे हो चुके हैं तुम अपनी स्त्री का शोक ना करो मौत तो एक दिन सबको आती है। रामनाथ कहने लगा- हे सिद्धराज! आपने जो कुछ भी कहा ठीक है। परंतु मैं अपनी पत्नी के बिना अब संसार में जीवित नहीं रह सकता। जब शिवजी के अनेकों भाँति समझाने पर भी रामनाथ नहीं माना, तो वह कहने लगे कि अब ऐसा करो तुम अपनी उम्र में से 20 वर्ष का संकल्प अपनी स्त्री को अर्पण कर दो। तुम्हारी उम्र पाकर यह जीवित हो उठेगी और तुम्हारी 20 वर्ष घट जाएगी अर्थात बाद में तुम दोनों एक साथ मरोगे परंतु तुम यह बात अपनी पत्नी को कभी मत बताना।

रामनाथ इस बात पर तैयार हो गया। हाथ में जल लेकर शिव जी ने रामनाथ की 20 साल की उम्र स्त्री को देने का संकल्प का जल पृथ्वी पर गिरते ही उसकी पत्नी उठ कर बैठ गई और अपने पति से कहने लगी आज तो दुपहरी में मुझे बड़ी अधिक नींद आ गई।

शिव पार्वती तो पहले ही वहां से अंतर्ध्यान हो गए थे। रामनाथ और सरस्वती भी उस स्थान से महात्मा की कुटी की ओर चल दिए कुछ देर चलते चलते वह महात्मा के आश्रम में पहुंच गए और महात्मा से आज्ञा लेकर वहां ठहर गए। वहां दो दिन रुकने के बाद उन दोनों की इच्छा हुई कि उस शांति दायक स्थान में थोड़े दिन और ठहरा जाए।

अगले दिन रामनाथ तो नहाने गया था। उसकी पत्नी से एक महात्मा ने बात करना शुरू किया वह 40 की आयु का एक तंदुरुस्त आदमी था। सरस्वती ने महात्मा को बताया कि उसके कोई संतान नहीं है। तो कहने लगा अरे तुम्हारे भाग्य में तो दो संतान हैं। परंतु वह तुम्हारे इस पति से नहीं होगी। तुम चाहो तो मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करके के लिए अपने तपस्या खत्म कर सकता हूं। 
सरस्वती उसके पैरों में पड़कर कहने लगी आप कृपा कर मेरे संतान उत्पन्न कर दे। मैं संतान की खातिर अपने पति को भी त्याग दूंगी। महात्मा ने उसे धीरज बँधाया। सरस्वती और महात्मा की आंखें तो लड़ चुकी थी। रामनाथ जब नहा कर आया तो उसे सरस्वती ने किसी प्रकार की शंका नहीं होने दी। अब तो जब भी मौका मिलता सरस्वती और महात्मा दोनों रामनाथ को छोड़कर कहीं भाग जाने का विचार बनाया करते। सरस्वती उसके इशारे पर सब कुछ छोड़ने व करने को तैयार थी।

आपस में सलाह कर एक दिन सरस्वती ने रामनाथ को खाने में विष दे दिया और जब वह बेहोश हो गया तो ढोंगी महात्मा सरस्वती को उस के सब धन के समेत अपने साथ लेकर भाग गया।

उसी दिन एक महात्मा शाम के समय ठहरने को उस स्थान पर आया। और उसने रामनाथ की दशा देखी तो समझ गया कि इस आदमी को जहर दिया गया है। उसने जड़ी बूटियों से उसका इलाज किया। विष का प्रभाव दूर होने पर उसे पता चला, कि उसकी पत्नी सरस्वती उसका सब धन लेकर यहां रहने वाले एक महात्मा के साथ भाग गई है। तो उसे बड़ा दुख हुआ महात्मा ने उसको सब प्रकार से धैर्य बंधाया और समझाया कि सब दुनिया स्वार्थी है। यहां कोई किसी का नहीं परंतु उसकी बातें रामनाथ की समझ में नहीं आई और उसने पत्नी को ढूंढने का निश्चय किया। वह कुटी छोड़ कर चल दिया और यहां वहां जगह जगह अपनी पत्नी का पता लगाने लगा। इस प्रकार उसे बरसों बीत गए आज झरनेश्वर महादेव पर वह आदमी सरस्वती सहित आया था। घूमता हुआ रामनाथ भी वहीं आ पहुंचा था। उसने अपनी पत्नी को पहचान लिया। जब उसने साथ चलने को कहा तो वह और उसके साथ का आदमी जो वही ढोंगी था, झगड़ा करने लगा। उसने लोगों को बताया कि यह स्त्री मेरी पत्नी है, मुझे जहर देकर इसके साथ चली आई है। सरस्वती ने कहा यह पुरुष मेरा कोई नहीं है। मैं कोई नहीं तो ठीक है। लेकिन मैंने तुझे जो वस्तु संकल्प की थी, वह मुझे संकल्प करके लौटा दे। सरस्वती ने हाथ में जल लेकर संकल्प किया कि मैंने जो कुछ इस पुरुष से लिया है। वह वापस करती हूं। तो संकल्प का जल पृथ्वी पर गिरते ही स्त्री की मृत्यु हो गई। हे बुलाखी! तुम यही घटना झरनेश्वर पर देख कर आए हो। जो मैंने सुनाई है। अब सो जाओ, रात ज्यादा हो गई है। सवेरे जल्दी जागना है।

26 July, 2020

स्थान चित्तौड़गढ़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

स्थान चित्तौड़गढ़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

स्थान चित्तौड़गढ़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

प्रातः काल गंगाराम और बुलाखी ने सुबह उठकर अपना शौचादि नित्य कर्म किया, और नित्य की भांति नाश्ता कर अपना सब सामान संभाला और मारवाड़ से उन्होंने मेवाड़ की ओर प्रस्थान किया। मेवाड़ राज्य राजधानी राज्यों में अति प्रसिद्ध राज्य है। यहां एक समय राणा वंश का राज्य था। इस क्षेत्र में पर्वत अधिक है। यहां रास्ता कंकरीला तथा पथरीला है। यहां सबसे प्रसिद्ध नगर चित्तौड़ है। जोकि कभी राज्य की राजधानी था। गंगाराम और बुलाखी सायंकाल चलते-चलते चित्तौड़ नगर में आए। उन्होंने देखा कि चित्तौड़ नगर गंभीरी नदी के तट पर बसा हुआ है। चित्तौड़ का किला भारत के सभी किलों में बड़ा है। जो कई मील में बना हुआ है। किले के सात दरवाजे हैं। पांडवपोल, भैरोपोल, हनुमानपोल, गणेशपोल, नारेला, लक्ष्मण द्वार तथा राम द्वार है। सातवां दरवाजा ही राम द्वार है।

यहीं से किले के अंदर प्रवेश करते हैं। किले के भीतर पद्मिनी का महल, रतनसिंह का महल, फतेह सिंह का महल, शिव मंदिर, काली मंदिर, मीराबाई का मंदिर, जैन मंदिर, विजय स्तंभ तथा चारभुजा आदि के प्रसिद्ध मंदिर तथा कुछ बावड़ी और कुंड आदि है। सब स्थानों को देखने के बाद वह दोनों गंभीरी नदी के तट पर एक बड़े वृक्ष के नीचे ठहरे। यहां और बहुत से यात्री भी ठहरे हुए थे। गंगाराम ने बुलाखी को सामान खरीदने को रुपए दे दिए वह खाने का सामान लेने के लिए शहर में आया। जब वह सामान खरीदने के लिए जा रहा था, तो उसने देखा कि एक भटियारा, एक फौजी जवान तथा एक वेश्या, एक आदमी को पकड़े हुए राजदरबार की ओर जा रहे हैं। यह तीनों कह रहे थे, कि यह आदमी बड़ा ठग है इसने हम सब को ठगा है। आज मुश्किल से पकड़ा गया है। इसे राजा के यहां ले जाकर सजा दिलाएंगे।

उनके साथ बहुत भीड़ थी। यह सब देखता हुआ वह सामान खरीदने चला गया, और कई दुकानों से जा कर सामान खरीदा। जब सामान खरीद कर वापस आया तो देखा नगर निवासियों के साथ वह ठग आजादी से घूमता आ रहा था। लोगों से पूछने पर पता चला कि इसने भी राजा के सामने सब अपराध स्वीकार कर लिया था। फिर भी इसे निर्दोष कह कर छोड़ दिया गया। यह सुनकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि अपराध स्वीकार कर लेने के बाद राजा ने उसे बिना दंड दिए क्यों छोड़ दिया? यह विचार करता हुआ वह गंगाराम पटेल के पास आया सामान सामने रखकर बोला कि मेरी राम-राम लो। मैं घर चला। पटेल जी बोले तुमने जरूर कोई चरित्र देखा है। पहले खाना तो बनाओ फिर मैं तुम्हारी बात का जवाब दूंगा। पटेल की यह बात सुनकर बुलाखी जल लाया। बर्तन साफ किए, उसके बाद उन्होंने मिलजुल कर खाना बनाकर खाया। फिर बुलाखी ने पटेल जी का बिस्तर लगा दिया। हुक्का ताजी करके उनके सामने रखा। जब तक पटेल जी हुक्का पीकर आराम करने लगे तब तक बुलाखी ने बर्तन साफ कर सब सामान संभाल कर रखा। फिर वह पटेल जी के पैर दबाने लगा। और पटेल जी से बोला आपने मेरी बात का उत्तर देने को कहा था तो अब उत्तर दीजिए। जब पटेल जी ने कहा कि पहले अपनी आज की देखी हुई अजूबी बात तो सुनाओ। बुलाखी की सारी बात सुनकर गंगाराम पटेल बोले कि मैं बात कहूं तो तुम हूँकारा देते रहना। पटेल जी बोले- सुनो एक जाट बहुत गरीब हो गया था। उसके पास जब कुछ नहीं रहा तो वह अपनी टूटी हंडिया और थोड़े से चावल बांधकर अपने घर से चल दिया। चलते-चलते एक सराय में जाकर ठहरा और भटियारी से कहा कि हमारे यह चावल हमारी हंडिया में ही बनाना। मैं जब तक घूम कर आ रहा हूं। भटियारी ने उस छोटी सी हंडिया में चावल पकने रख दिए।

वह आदमी कहीं बाहर नहीं गया। उसी के घर में छिपकर बैठ गया और भटियारी को छुपे छुपे देखता रहा। जब चावल पक गए तो भटियारी का लड़का बोला थोड़े चावल मुझे दे दो। भटियारी ने दो चम्मच चावल उसे खाने को दे दिए। थोड़ी देर बाद दूसरा लड़का आया उसने भी भटियारी से चावल मांगे भटियारी ने दो चम्मच चावल उसे भी दे दिए। वह भी खा कर चला गया। वह आदमी यह सब देखता रहा फिर निकल कर बाहर आया और भटियारी से चावल खाने को मांगे भटियारी ने उसकी हंडिया उसके सामने लाकर रख दी।

उसने हंडिया को कान से लगाया और बोला- अरे चुप भी हो जा, भटियारी ने बस दो दो चम्मच चावल अपने दोनों लड़कों को ही तो दिए हैं, ज्यादा तो नहीं दिए। इतना कहकर हंडिया में से चावल प्लेट में रखकर खा लिए। जब वह चावल खा चुका तो भटियारी बोली कि तुम यह क्या कर रहे थे भटियारी ने दोनों लड़कों को दो दो चम्मच चावल दिए। इतनी सुनकर वह आदमी बोला
दोहा
हंडिया जादू की भरी, कहती है सब हाल।
चोरी सारी कान में, बतलाती तत्काल।।
जब उस आदमी कि यह सुनी तो भटियारी ने सोचा कि यह हंडिया तो वास्तव में जादू की है। मैंने जो चावल निकाले वह इसने बता दिए मेरे यहां तो अधिक चोरी होती है। अगर यह हंडिया मुझे मिल जाए तो मैं चोरी का पता लगा लिया करूंगी। ऐसा विचार कर वह कहने लगी।
दोहा
हंडिया दे दे यह मुझे होय बड़ा अहसान।
इसकी कीमत अभी, मैं नगद करूं भुगतान।।
भटियारी की यह बात सुनकर हंडिया का मालिक बोला-
दोहा
सौ रुपैया का मोल है सुन, भटियारिन बात।
लेना जो चाहे इसे, सौ रुपया धर हाथ।।
भटियारिन को हंडिया से मोह हो गया था। उस ने सौ चांदी के रुपए लाकर उसे दिए और हंडिया अपने हाथ में ले ली। वह आदमी ₹100 लेकर वहां से बड़ी जल्दी चला गया। इतने में ही भटियारी का पति आया तो भटियारी ने उसे हंडिया दिखाई और कहा कि यह ₹100 में खरीदी है।

भटियारिन की बात सुनकर भटियारे को क्रोध हो गया। और बोला यह फूटी हंडिया सौ की बताती है। उसने उठाकर वह हंडिया जमीन पर दे मारी तो वह टुकड़े-टुकड़े हो गई। उस भटियारी ने उसे चोरी बताने वाली करामात बताई तो भटियारा बोला वह कोई ठग था, जो तुझे ₹100 में फूटी हंडिया देकर ठग ले गया है  अब मैं जाता हूं। उसे पकड़कर रुपए वसूल कर लूंगा। यह कहकर भटियारा लाठी ले लोगों के बताए हुए रास्ते पर उस ठग की तलाश में जंगल की ओर चल दिया। ठग ₹100 लेकर जंगल के रास्ते जा रहा था कि एक रीछ ने उसे देखा और रीछ उसके पीछे दौड़ा। वह भागकर एक पेड़ की ओट में हो गया। पेड़ के दूसरी ओर से रीछ ने उसे पकड़ने को अपने हाथ बढ़ाए। परंतु उस आदमी ने रीछ के दोनों हाथ पकड़ लिए बीच में ही पेड़ था। रीछ और वह आदमी पेड़ के चारों ओर घूम रहे थे। वह आदमी सोचता था कि यदि मैं रीछ के हाथ छोड़ दूंगा तो रीछ अवश्य मुझे मार डालेगा। इतने में उसकी अन्टी से ₹20 निकलकर पेड़ के इधर-उधर गिर गए। उसी समय घोड़े पर सवार एक फौजी जवान उधर से निकला। उसने रीछ और उस आदमी को पेड़ के चारों और घूमते देखा तो वह समझ गया कि रीछ इसे मार डालेगा। यह विचार कर उसने अपनी बंदूक रीछ को मारने को उठाई। यह देखकर आदमी बोला-
दोहा
रीछ पाालतू तू है मेरा, सुनो लगाकर कान।
मनमानी देता है रकम, देखो स्वयं प्रमान।।
यह रुपया अकेले में निकालता है। तुमको आया हुआ देखकर इसने रुपया देना बंद कर दिया है। अब तक तो मैं सैकड़ों रुपया पैदा कर लेता। घोड़े के सवार ने जब यह बात सुनी और ₹20 पड़े भी देखे तो उसने समझा कि वास्तव में रीछ करामाती है। रुपया इसके पेट में भरे हैं। अगर यह मुझे मिल जाए तो मैं मनमानी रकम कमा लूं। यह विचार कर कहने लगा
दोहा
मुझको दे दे रीछ यह, मैं बतलाऊं तोय।
रुपए की है इस समय, बहुत जरूरत मोय।।
उस आदमी ने जब घुड़सवार की यह बात सुनी तो कहने लगा कि यदि तुम रीछ चाहते हो तो ₹400 और अपना घोड़ा मुझे दे दो। मैं तुम्हें रीछ के हाथ पकड़ा दूंगा। मेरे चले जाने के बाद जितना रुपया चाहो तो रीछ से निकलवा लेना। हां जो यह ₹20 जमीन पर पड़े हैं इन्हें भी मैं ले जाऊंगा। सवार के पास ₹300 थे कहने लगा कि मेरे पास सिर्फ ₹300 हैं तुम मुझे रीछ दे दो। उसने घुड़सवार की बात मान ली फौजी ने घोड़े से उतर कर ₹300 जमीन पर रख दिए और उसने रीछ के हाथ कसकर पकड़ लिए। उस आदमी ने रीछ को छोड़ने के बाद ₹300 और ₹20 जो जमीन पर पड़े थे उठाए और घोड़े पर चढ़कर भाग गया।
 
अब फौजी जवान रीछ के हाथ पकड़े पेड़ के चारों और घूम रहा था। जब रीछ से एक रुपया भी ना निकला, तो वह अपनी भूल पर पछताया। अगर रीछ को छोड़ता है तो रीछ उसे मार डालेगा। इस कारण वह उसके हाथ पकड़े पेड़ के चारों ओर घूमता रहा। इतने में वह भटियारा बोला वह आदमी जो तुम्हारा घोड़ा और रुपया ले गया बड़ा ठग है। हमारे यहां ₹100 में फूटी हंडिया दे आया है। तुम यह तो सोचो कि रीछ के पेट में रुपया कहां से आए। यह कहकर उसने अपनी लाठी से रीछ को मार डाला और फौजी के प्राण बचाए। अब वह भटियारा तथा फौजी दोनों उसको पकड़ने के लिए घोड़े के पांव के निशान देखते हुए चल दिए।

उधर वह ठग घोड़े पर सवार होकर दूसरे शहर में शाम के समय एक तवायफ के यहां सराय में जा ठहरा। उसने घोड़े को दो सेर दाना खिलाया और तवायफ से कहा तुम सुबह मेरे घोड़े की लीद मत फिंकवाना। उसने 4:00 बजे रात को उठकर घोड़े की लीद में ₹200 मिला दिए। और सवेरे उठकर तवायफ के सामने पानी मांग कर लीद को धोना शुरू किया। उसमें से ₹200 जो उसने मिलाए थे सो निकाल लिए और बोला यह मेरा घोड़ा करामाती है। देखो तुम्हारे सामने मैंने इसे दो सेर दाना खिलाया था। इसने लीद में से ₹200 दिए इसे जितने सेर दाना खिलाता हूं। उतने ही सैकड़ा रूपया लीद के साथ निकालता है। यह सुनकर तवायफ को लालच आ गया और कहने लगी यह घोड़ा मुझे दे दो। और जो कुछ चाहो तो ले लो। तवायफ के बहुत विनय करने पर ₹1000 लेकर उसने वह घोड़ा दे दिया और चला गया। तवायफ ने सोचा कि ₹1000 एक ही दिन में वसूल कर लूं। इसलिए उसने घोड़े को 10 सेर दाना खिला दिया। जिसे खाकर घोड़े का पेट फूल गया और वह मर गया।

वह मरा हुआ घोड़ा सराय के दरवाजे पर पड़ा हुआ था। उधर से भटियारा और फौजी निकले। फौजी ने अपना घोड़ा पहचाना और भटियारे से बोला मेरा घोड़ा तो यहां मरा पड़ा है। ठग भी यहीं कहीं होगा।

जब उन्होंने तवायफ से पता लगाया तो उसने कहा कि एक आदमी इसे करामाती घोड़ा बताकर ₹1000 में बेच गया है। फौजी बोला घोड़ा मेरा है। इसमें कोई करामात नहीं थी। तुम्हारी भांति ही उस ठग ने हम दोनों को भी ठगा है। चलो अब हम दोनों मिलकर उसे तलाश करेंगे और पकड़ कर अपना रुपया वसूल करेंगे। अब वह तवायफ भी उनके साथ में हो गई अब भटियारे, फौजी और तवायफ तीनों ही उसको ढूंढने के लिए चल दिए। और उसी शहर में घूमते हुए उसको पकड़ भी लिया। और जब वह नहीं माना तो वे अपना न्याय कराने के लिए उसे राजदरबार में ले गए।

सबसे पहले राजा के सामने भटियारे ने अपना दावा रखा। वह बोला कि यह आदमी ठग है। मेरी पत्नी को फूटी हंडिया ₹100 में देकर ठग लाया है। जिसने उसे यह लालच दिया था, की हंडिया मेरी करामाती है और चोरी बताती है।
राजा ने उससे पूछा कि भटियारा जो कुछ कह रहा है क्या ठीक है। वह आदमी बोला वास्तव में मेरी हड्डियां करामाती थी और वह चोरी बताती थी। आप उस हंडिया को मंगा कर जांच कर लीजिए। राजा ने भटियारे से कहा कि वह हंडिया लाओ। भटियारा बोला वह तो मैंने फोड़ दी। राजा कहने लगा जब हंडिया ही नहीं तो मैं न्याय कैसे करूं।

इसके बाद फौजी ने अपनी फरियाद की। कि यह आदमी ठग है। यह ₹300 और घोड़ा मुझसे बहका कर ले गया। और एक रीछ का हाथ पकड़ा आया। इसने कहा था कि यह रीछ अकेले में पेट से टट्टी की राह रुपए निकालता है। राजा ने उससे पूछा क्या तुमने ₹300 और घोड़ा लेकर इन्हे रीछ दिया था। उसने उत्तर दिया महाराज मेरा रीछ करामाती था। मैंने जो कुछ भी कहा था सत्य है। रीछ को मंगवा कर जांच कर ली जाए। भटियारा बोला उसको मार कर तो मैंने इसकी जान बचाई है। राजा बोला तुम्हारे मामले में भी यह निर्दोष है, क्योंकि तुमने रीछ मार दिया है।

इसके बाद तवायफ ने कहा यह हजार रुपए में अपना घोड़ा मुझे इस शर्त पर बेंच आया था कि इसे जितने सेर दाना खिलाते हैं। उतने सौ रुपए लीद के साथ देता है। इस प्रकार इसने मुझे धोखा दिया है। ठग बोला श्रीमान जी घोड़े को मंगा कर आप मेरी सांच झूठ की जांच कर लें। वैसे मेरी बात झूठ हो तो मुझे कठोर सजा दीजिए। राजा के पूछने पर तवायफ ने बताया कि घोड़ा तो मर गया है। राजा ने कहा बिना घोड़े के फैसला क्या करूं। हे बुलाखी नाई! तुम इसी ठग को देख कर आए हो। जिसे सबूत ना मिलने पर राजा ने निर्दोष छोड़ दिया। अब रात अधिक हो गई है सवेरे जल्दी जागना है इसलिए अब सो जाओ।

17 July, 2020

 स्थान मारवाड़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

स्थान मारवाड़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

 स्थान मारवाड़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

प्रातः काल बुलाखी दास नाई गंगाराम पटेल को सोते हुए देखा तो उन्हें आवाज देकर बोला कि पटेल जी अब दिन निकलने वाला है मुर्गा बहुत देर का बांग दे चुका है। अब कौवा और चिरैया भी बोलने लगे हैं। बुलाकी की आवाज सुनकर गंगाराम पटेल आंखें मलते हुए उठ गए थे। इसके बाद गंगाराम तथा बुलाकी ने अपना समाचार नित्य कर्म किया नाश्ता आदि करके अपना सामान संभाला और आबू रोड स्टेशन से मारवाड़ को प्रस्थान किया। यह इलाका रेगिस्तान था, कहीं पर कांटों की झाड़ियां तथा छोटे-छोटे पौधे अवश्य दिखाई दे जाते थे। कहीं कहीं कुछ लोग भेड़ बकरियों को चलाते हुए नजर आ रहे थे। अधिकांश लोग ऊंटों पर सवार होकर चलते थे। स्त्री पुरुष तंदुरुस्त दिखाई देते थे। 

मारवाड़ नगर राजस्थान का प्राचीन प्रसिद्ध नगर है। यह कभी मारवाड़ प्रदेश की राजधानी थी। उन्हें वहां राजा का मारवाड़ी महल देखने को मिला।
एक बाग में गंगाराम पटेल और बुलाखी आकर ठहरे वहां और भी बाहर से आए हुए बहुत से यात्री ठहरे हुए थे। इससे वहां अच्छी चहल-पहल थी। 

गंगाराम पटेल ने बुलाखी को सामान लाने के लिए कुछ रुपए दिए और कहने लगे कि तुम सामान लेकर जल्दी लौटना। क्योंकि यहां रेगिस्तान है, हवा चलने से रेत के ढेर इधर से उधर उड़ जाते हैं और आदमी भी रास्ता भूल जाता है। गंगाराम पटेल से बुलाखी ने कहा मैं ऐसा ही करूंगा। अब सामान लेकर आता हूं। बुलाखी नाई बाग से बाजार को गया और कई दुकानों से अपना काम का सामान खरीद कर वापस आ रहा था। वह इधर उधर देखता भी जाता था कि कोई अजूबा चीज नजर आ जाए। चलते चलते नगर के बाहर आया तो पेड़ के पास बहुत भीड़ लगी देखी। बुलाखी भी वहां चला गया उसने देखा वहां कुछ आदमी खड़े हुए थे। जो राज्य के सिपाही मालूम पढ़ते थे। वहां राजा भी उनके साथ था। वह नीम का पेड़ था और खोखला था। राजा ने उस पेड़ में आग लगवा दी तो पेड़ जलने लगा उसमें से हाय हाय बचाओ बचाओ मैं मरा की आवाजें आ रही थी। सब भीड़ यह देख कर हंस रही थी।

बुलाखी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पेड़ में कोई भूत प्रेत था या किसी आदमी को आग में जिंदा जलाने को राजा ने उस में आग लगवाई थी। वहां से किसी के रोने की आवाज भी आ रही थी। बुलाखी ने विचार किया कि आज की घटना बड़ी अनोखी है। शायद पटेल जी इस घटना को पूरी तरह ना बता सके अपने मन में ऐसे विचार बनाते हुए सामान को लेकर वह उसी बाग में आया जहां पटेल भी उसका काफी देर से इंतजार कर रहे थे। बुलाखी को आता हुआ देखकर गंगाराम पटेल कहने लगे कि आज तो तुम बहुत देर से सामान लेकर लौटे मैं तो समझ रहा था कहीं रास्ता भूल गए। इस शंका में परेशान होकर तुम्हारी राह निहार रहा था। पटेल जी की बात सुनकर वह हंसा और लाया हुआ सामान उनके सामने रख कर कहने लगा। पटेल जी आपने खूब सोंची मै भला कहीं खो भी सकता हूं। मैंने घाट घाट का पानी पिया है मुझे देर इसलिए लगी कि आज मैं एक बड़ी अनोखी बात देखता रह गया।
बुलाखी दास की बात सुनकर पटेल भी मुस्कुराने लगे और बोले।
दोहा
अन्न बिना सब अन्मने, नर नाहर और भूख।
तीनपहर के बीच में, बिगड़ जात सब रूप।।
सो हे बुलाखी भाई इस समय बहुत भूख लगी है। लोगों ने यहां तक कहा है। "भूखे भजनहोय गोपाला, यह लो कंठी माला" भूखे तो भजन भी नहीं हो सकता फिर और बात की क्या?

चलो पहले नित्य की भांति भोजन बनाए खाए। तब चित्त में शांति आएगी। तुम्हारी अजूबी बात का जवाब भी उसके बाद दिया जाएगा। गंगाराम पटेल की बात सुनकर बुलाखी पहले पानी भरकर लाया, बर्तन साफ किए, चूल्हा तैयार करके लाया साग सब्जी बनाकर ठोक दी फिर आटा गूंदा। जब साग सब्जी तैयार हो गई तो पटेल जी को आवाज दी पटेल जी चौका में आकर बैठे बुलाखी रोटी बेलता जाता था और पटेल जी सेंकते जाते थे। इस प्रकार दोनों ने भोजन बनाया खाया फिर बुलाकी ने पटेल जी का बिस्तर लगाया और हुक्का भर कर सामने रखा। वह आराम से हुक्का पीने लगे। जब तक बुलाकी ने बर्तन साफ किए अपना सब सामान संभाला और फिर पटेल जी के पैर दबाने लगा। उसी समय गंगाराम पटेल बुलाखी से कहने लगे कि आज तुमने जो अनोखी बात देखी हो वह बतलाओ तो उसने देखा हुआ सारा हाल बयान कर दिया और बोला अब बताएं यह क्या बात थी?

बुलाकी की बात सुनकर गंगाराम पटेल बोले- एक नगर में मोहन और सोहन दो मित्र थे। दोनों अपना-अपना अलग व्यापार करते थे। मोहन ईमानदार व्यक्ति था। उसके नौकर भी सच्चे थे। जो व्यापार उसने 1000 से शुरू किया 1 साल में ₹50000 का हो गया। सोहन की आदत अच्छी ना थी, वह बेईमान था। इसलिए उसके नौकर भी बेईमानी करने लगे थे। उसने 1 साल में 40000 का नुकसान उठाया। जिससे उसकी हालत खराब हो गई। सोहन एक दिन मोहन से कहने लगा।
दोहा
धन सब घाटे में गया, बंद हुआ व्यापार।
मित्र बताओ किस तरह, मेरा हो उद्धार।।
सोहन की बात सुनकर मोहन कहने लगा तुम मेरे पुराने मित्र हो। अगर व्यापार में धन नष्ट कर दिया तो कोई बात नहीं।
दोहा धन मेरे पास है सुन लो कान लगाय।
साझे में हम तुम दो लेंगे काम चलाय।।
मोहन की बात सुनकर सोहन बहुत प्रसन्न हुआ और बोला तुम धन्य हो। मित्र हो तो ऐसा हो। अब मेरी समझ में आता है कि-
दोहा
चल परदेस में करें, हम दोनों व्यापार।
लाभ में बहुत कमाए धन, मेरा यही विचार।।
सोहन की बात मोहन ने मान ली और उसके साथ परदेश को व्यापार करने के लिए चल दिया। दोनों ने परदेस में जाकर चित्त लगाकर परिश्रम से अपना व्यापार शुरू किया। दोनों ने बाहर की यात्रा भी कर ली और धन भी कमाया। बहुत पुरानी कहावत है कि कुछ भी करो "कुत्ते की पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी रहती है"। जिसकी जो आदत पड़ जाती है। वह छूटती नहीं सोहन तो बेईमानी करने वाला आदमी था। वह परदेस में मौका देखा करता था। कि कब मोहन को जान से मार कर उसका सब धन हड़प ले। परंतु मोहन के नौकर स्वामी भक्त थे। इसलिए सोहन अपनी योजना में सफल नहीं हो पाया था। वह दिखावटी बातों में तो मोहन से भोली भाली बातें करता था। मगर उसके मन में कपट की कतरनी चलती रहती थी।

मोहन बहुत सीधा आदमी था। वह यह समझ भी नहीं पाया कि सोहन के विचार इतने गंदे भी होंगे। परंतु मोहन के नौकरों ने उसे एकांत में बताया कि सोहन के विचार बुरे हैं और किसी ना किसी दिन आपको अवश्य धोखा देगा। हम आपको सचेत कर रहे हैं। मोहन ने अपने सेवकों से ऐसी बात सुनी तो उसमें सोहन के साझे में व्यापार खत्म करना ही ठीक समझा। अब मोहन के पास कुल मिलाकर ₹200000 हो चुका था। मोहन सोहन से कहने लगा।
दोहा
बहुत दिनों परदेस में दीने मित्र बिताय।
बहुत दिनों से है रही, घर की याद सताय।।
इतनी बात सुन सोहन कहने लगा-
दोहा
जो इच्छा हो आपकी तो मुझको स्वीकार।
सभी भक्तों से आपके संग में हूं तैयार।।
सोहन की बात सुनकर मोहन बोला- हे मित्र परमेश्वर ने और भाग्य ने बड़ा साथ दिया इस प्रकार यहां आकर दो लाख कमाया। अब हम तुम दोनों एक एक लाख बंटेंगे और अपने घर चल कर कुछ समय चैन से बैठेंगे। सोहन बोला रुपए बांटने की ऐसी जल्दी क्या है, घर चलना है चलो वहीं बांट लिया जावेगा। मोहन यह बात सुनकर राजी हो गया और सोहन को साथ लेकर धन समेत अपने नगर को वापस आ गया।

नगर में  पहले सोहन का मकान पड़ता था। इसलिए सब धन को लेकर मोहन सोहन के मकान पर गया। कुछ देर बैठने के बाद मोहन ने सोहन से जाने का विचार किया और सोहन को धन बांटने को कहा। सोहन बोला ऐसी जल्दी क्या है? जो कि हम धन बांटने की परेशानी करें। अभी रात है कल दिन में बांट लेंगे। तब मोहन विश्वास करके सब धन वहीं छोड़ कर अपने घर चला गया। दो-तीन दिन के बाद मोहन सोहन के यहां आया और उसने धन बांटने की बात कही। उस समय सोहन ने उससे साफ कह दिया कि अपने हिस्से का धन तो पहले ही तुम ले गए थे। मेरे पास तुम्हारा कुछ नहीं है। मोहन दुखी होकर अपने घर चला आया फिर बाद में एकदिन नगर के प्रतिष्ठित लोगों की पंचायत जोड़ी। उसमें भी सोहन ने साफ इंकार कर दिया। सब बातचीत मोहन और सोहन के बीच में थी कोई गवाह नहीं था। जो पंचायत वाले ठीक फैसला करते।

अंत में मोहन ने राजा के पास जाकर न्याय की प्रार्थना की। राजा ने सोहन को बुलाकर कहा कि तुम मोहन का एक लाख रुपया क्यों नहीं देते। सोहन ने कहा कि मैंने सोते समय ही मरघट के पास वाले नीम के पेड़ के पास रुपया मोहन को दे दिया था। यह रुपयों का झूठा दोष मेरे ऊपर लगाता है। राजा ने कहा कि तुम लोगों का कोई गवाह भी है। मोहन ने उत्तर दिया कि हमारा गवाह कोई नहीं है। किंतु सोहन कहने लगा मैं उस पेड़ से गवाही दिलवा दूंगा। दूसरे दिन राजा ने पेड़ की गवाही देने का निश्चय किया मोहन और सोहन अपने अपने घर चले आए घर आकर सोहन ने अपने बाप को सिखा कर रात में ही उस पेड़ की खोह में बिठा दिया और कहा कि जब राजा पूछे तो कह देना। कि यहां एक लाख सोहन ने मोहन को दिया था।

दूसरे दिन राजा दरबारियों तथा मोहन के साथ उस पेड़ के पास गए और कहा। तू सच बता कि क्या सोहन ने मोहन को एक लाख रुपये दिया था। पेड़ से आवाज आई हां दिया था। मोहन ने सोहन के बाप की आवाज पहचान ली तो राजा से कान में कहा कि यह सोहन के पिता की आवाज है। राजा सोहन की बेईमानी पर बहुत क्रोध आया। उसने उस पेड़ में आग लगा दी जिसमें जलकर उसका बाप रो रो कर मर गया। तब राजा ने सोहन से मोहन का एक लाख रुपया भी दिला दिया। और कहा बेईमानी बहुत बुरी चीज है। उसका फल बहुत बुरा होता है। हे बुलाखी नाई! तुम यही घटना आज देख कर आए हो अब सो जाओ रात अधिक हो गई है सवेरे जल्दी जागना है।

16 July, 2020

 स्थान आबू पर्वत (गंगाराम पटेल और बुलाखी दास की कहानियां)

स्थान आबू पर्वत (गंगाराम पटेल और बुलाखी दास की कहानियां)

 स्थान आबू पर्वत  (गंगाराम पटेल और बुलाखी दास की कहानियां)

प्रातः काल का समय था बुलाखी दास और गंगाराम पटेल सोने से उठने के बाद अपने नित्य कर्म से फारिग हुए। सब सामान संभाला और कुछ नाश्ता किया। बाद में आश्रम के महात्मा को गंगाराम पटेल ने माथा नवाकर कुछ रुपए भेंट किए और आज्ञा लेकर अपने घोड़ों को आश्रम में ही छोड़ दिया। और रेल द्वारा चल दिए आबू पर्वत की ऊंची ऊंची चोटियां तथा उन पर हरे-भरे फल फूलों वाले वृक्ष मन को लुभाते हुए प्रतीत होते थे।

शाम के समय वे दोनों आबू पर्वत पर आ गए। पर्वत बड़ा रमणीक था, उस पर अनेक बड़े बड़े मंदिर थे। जिनमें जैन मंदिर तथा अंबाजी का मंदिर तो बहुत ही प्रसिद्ध है, तथा शोभायमान थे। वहीं अनेक साधु संतों के आश्रम थे। जहां बहुत से महात्मा शोभा पा रहे थे। कहीं सत्संग होता था, तो कहीं उपदेश और प्रवचन हो रहे थे।

पुराने महात्माओं की अनेक गुफाएं थी। जिनके दर्शन मात्र को यात्री आते जाते थे। जैसे- भर्तृहरि गुफा, गोरखनाथ की गुफा इत्यादि जिधर देखो उधर आनंद ही आनंद दिखाई देता था। मुख्य दर्शनीय स्थानों को देखते हुए गंगाराम पटेल और बुलाखी दास पर्वत के नीचे उतरे नीचे एक सुंदर छोटा सा नगर था। जहां खाने पीने की वस्तुएं उपलब्ध हो जाती थी। वही एक झरने के पास उत्तम जगह देखकर गंगाराम पटेल ने ठहरने का विचार किया और बुलाखी से कहने लगे कि देखो पानी का यह झरना बह रहा है। पड़ोस में जंगल भी है यहां ठहरने से शौच आदि में किसी बात का भय नहीं है। मेरे विचार से तो यही रुक जाए तो अच्छा है। बुलाखी को भी पटेल जी का विचार अच्छा ही मालूम पड़ा, और उसने अच्छी सी जगह देखकर वहां सब सामान रख दिया। वहां जंगल में मंगल हो रहा था। कुछ लोग भगवान का भजन कीर्तन कर रहे थे, तो कुछ देवी जी की भेंट गा रहे थे। वहां सभी संप्रदाय के महात्मा जा रहे थे। स्थान स्थान पर धर्म चर्चाएं होने से यह स्थान साक्षात स्वर्गधाम सा प्रतीत होता था।

गंगाराम पटेल ने बुलाखी को कुछ रुपए सामान लाने को दिए। वह बस्ती में सामान लेने के लिए गया वह इधर उधर देखता जाता था। कि उसे कोई ऐसी अनोखी बात दिखे जिसे जाकर पटेल जी से पूछे वह देखते-देखते बहुत दूर निकल गया। उसे कोई भी अनोखी बात दिखाई नहीं दी घूमते घूमते उसे अंधेरा हो गया था। इसलिए उसने जल्दी से खाने का सब सामान खरीद लिया और जब अपने ठहरने के स्थान की ओर चला आ रहा था तो आज उसका चित्त कुछ उदास जैसा था। क्योंकि उसने कोई अनोखी बात नहीं देखी थी। वह सोच रहा था कि रोज की भांति मैं आज पटेल जी से क्या पूछूंगा? यही विचार करता हुआ वह बस्ती के बाहर आया। यहां से उसके ठहरने का स्थान थोड़ी ही दूर था। अंधेरे में जब अपने दाहिनी ओर नजर डाली तो उसे एक बहुत बड़ा तालाब दिखाई दिया वह तालाब की ओर देख ही रहा था। कि उसे आकाश मार्ग में कुछ प्रकाश होता हुआ दिखाई दिया। जो धीरे-धीरे उसी की ओर आ रहा था। यह देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ। थोड़ी देर में उसने देखा, कि वहां एक उड़न खटोला रुका और उसमें से स्वर्ण कुंडल और राजसी वस्त्र धारण किए हुए एक पुरुष उतरा। तब उसकी समझ में आया कि उसे जो प्रकाश दूर से दिखाई दे रहा था। इसी खटोले से उतरने वाले महापुरुष के मुख्य मंडल की ज्योति थी।

वह पुरुष उड़न खटोले से उतरकर तीन चार कदम चला होगा कि वही पास खड़े एक मुर्दे के पास पहुंच गया। पुरुष अपने हाथ में एक फरसा लिए हुए था उसी से वह उस लाश में से मांस काट काट कर खाने लगा। और जब उसका पेट भर गया तो तालाब से जल पिया और अपने उड़न खटोले में बैठ गया। उड़न खटोला ऊपर को उड़ गया। इस तरह वह तेजस्वी पुरुष जिधर से आया था। उधर को ही चला गया। इसके बाद जो कटी कटी लाश वहां पड़ी थी वह भी गायब हो गई। यह सब कुछ देख कर बुलाखी दास के आश्चर्य की सीमा न रही। वह विचार करने लगा कि उड़न खटोले से उतरने वाला आदमी देखने से तो कोई देवता विद्याधर या गंधर्व ही मालूम पड़ता था। और इतना तेजवान था कि उसके मुख्य मंडल का उजाला सब दिशाओं को प्रकाशित कर रहा था। वह शव से मांस काट कर खा रहा था। यही बुलाखी नाई के आश्चर्य का कारण था कि ऐसा तेजवान पुरुष शव का मांस क्यों खा रहा था? फिर उस आदमी के जाने के बाद वह मृत व्यक्ति भी गायब हो गया। अपने मन में नए-नए विचार बनाता हुआ बुलाखी गंगाराम के पास गया और उनके सामने सामान रख दिया और कहने लगा कि आज मैं एक ऐसी अद्भुत बात देख कर आया हूं। जिसका जवाब आप कभी नहीं दे सकते हैं। इस कारण मेरी राम-राम लो मैं अपने घर जा रहा हूं। इतनी सुनकर पटेल कहने लगे तुम्हें मालूम है कि तुमने अब तक जितनी भी अजीब बातें देखी हैं। उनका जवाब मैंने दिया है। आज भी तुम्हारी बात का जवाब दूंगा लेकिन पहले खाना बना खा लो बाद में पूछना।

गंगाराम की बात सुनकर बुलाखी पास के झरने से पानी भरकर लाया और बर्तन साफ किए, चूल्हा चेताया, साग बना कर चढ़ाया और आटा गूंथा। जब साग बन गया तो पटेल जी पराठे बनाने लगे। जब वह भोजन बनकर तैयार हो गया तो दोनों ने आनंदपूर्वक भोग लगाया। फिर बुलाखी ने पटेल जी का बिस्तर लगाया और हुक्का भर कर उनके सामने रखा। जितनी देर में पटेल जी ने हुक्का पिया बुलाखी ने सब बर्तन साफ किए और अब अपना सामान संभाल कर रखा। फिर बुलाखी धीरे-धीरे पटेल जी के पैर दबाने लगा। पाँव दबाते दबाते जब पटेल जी को नींद आने लगी तो वह बोला पहले मेरी बात का जवाब दो, बाद में सोना। इतनी बात सुनकर गंगाराम पटेल बोले- हां बताओ तुम्हारी ऐसी कौन सी अनोखी बात है। जिसका जवाब सुनने के लिए तुम इतने बेचैन हो रहे हो।

तब बुलाखी ने उड़न खटोले से उस महापुरुष के उतरने के बाद सारा देखा हुआ हाल बयान कर दिया। बुलाखी की इस प्रकार की बात सुनकर गंगाराम पटेल कहने लगे कि आज वास्तव में तुमने एक विचित्र घटना देखी है इसे जो सुनेगा आश्चर्य ही करेगा। मैं तुम्हें अब उस तेजस्वी पुरुष के विषय में सब कुछ बताता हूं। तुम ध्यान लगाकर सुनो। जिस तरह फौज में नक्कारा विशेष महत्व रखता है, उसी प्रकार किस्सा कहानी में हूंकारा का महत्व है। जब तक तुम हुंकारा देते जाओगे मैं बात कहता चलूंगा और हूंकारा बंद होते ही मैं बात करना बंद कर दूंगा। बुलाकी ने हूँकारा भरना स्वीकार कर लिया। गंगाराम पटेल वह कहानी आरंभ करते हुए बोले- हे बुलाखी! तुम्हें अब मैं जो कुछ बताता हूं वह सुनो,
एक राजपूत था। बचपन से ही उसकी तंदुरुस्ती बड़ी अच्छी थी। मलाई करने कराने का उसे बड़ा चाव था। व्यायाम करता था और कुश्ती भी लड़ता था। उसने बड़े-बड़े पहलवानों की कुश्ती में पछाड़ा था। वह ब्याह लायक हुआ तो राजा ने उसका विवाह करने का विचार किया। जब राजकुमार को यह बात मालूम हुई तो उसने कहा-
दोहा
ब्याह रचाने का पिता, छोड़े आप विचार।
ब्रह्मचर्य पालन करूं, ली मैंने चितधार।।
इस पर राजा ने राजकुमार से कहा-
दोहा
बिन ब्याह के सुत मेरे चले न वंश अगार।
ब्याह रचा ओहे कुमार बना रहे परिवार
राजा बोला- हे पुत्र! तुम मेरे इकलौते पुत्र हो। अगर ब्याह नहीं करोगे तो हमारा वंश डूब जाएगा। इस प्रकार राजा ने समझा-बुझाकर उसका विवाह कर दिया। थोड़े दिन बाद राजा का स्वर्गवास हो गया और राजकुमार को राजगद्दी मिली। पुत्र होने के बाद उसका मन राजकाज में नहीं लगता था। वह सांसारिक जीवन से मुक्त होकर भगवान का भजन कर मुक्त पद प्राप्त करना चाहता था। उसके बाद उसने अपनी पत्नी और मंत्रियों को राजकाज सौंप दिया। अपने नगर निवासियों तथा पारिवारिक जनों को समझा बुझा और धीरज बंधा कर राज्य छोड़कर चला गया।

उसने इधर-उधर तीर्थों के दर्शन किए और पवित्र सरिता सरोवरों में स्नान किया। एक अच्छे महात्मा को गुरु बनाकर उनसे दीक्षा ली। वह संत समाज में विचरण करने लगा। वह एक बड़ा सदाचारी व्यक्ति था। उसकी आत्मा पवित्र थी। उसने कभी किसी पर स्त्री को बुरी नजर से भी नहीं देखा था। जब वह इस प्रकार देश के सभी तीर्थ कर चुका और उसकी विचरण करने की इच्छा समाप्त हो गई। तो वह एक पर्वत पर आया और सुंदर तालाब एकांत में देखा तो वहां रहकर उसने तपस्या करने का विचार किया। जब उसे भूख लगती थी तो फल फूल लाकर खा लेता था। और सरोवर से पानी पी लेता था। भगवान के भजन में तल्लीन रहने से उसके मुख पर तेज चमकने लगा था। उसने कभी किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुंचाया किंतु इतना सब कुछ करने पर भी उसने कभी साधु महात्मा दीन अथवा अतिथि को खाने के लिए नहीं पूछा। खुद अपनी भूख का ध्यान रखा और परलोक सुधारने के उपाय में लगा रहता। कोई साधु संत अगर उसके आश्रम पर आज ही जाता था तो वह उससे खाने को नहीं पूछता था। और एकांत में बैठकर अकेला अपना पेट भर लेता था।

दीर्घकाल तक जीवित रहने के पश्चात उसकी आयु जब पूरी हुई तो धर्मराज के दूत उसे अपने दिव्य रथ में बैठकर दिव्य लोक में ले गए। अपने कर्मों के फल से उसे उत्तम लोग की प्राप्ति हुई। सुंदर स्त्री तथा वाहन वैभव सब उसको वहां प्राप्त था। परंतु वहां उसे खाने को कुछ भी नहीं मिला करता। कुछ समय तो उसने भूखे रहकर बिताया। एक दिन ब्रह्मा जी से जाकर उसने निवेदन किया कि मुझे उत्तम लोग धन वाहन वैभव तथा इस्त्री आज सर्व सुख तो प्राप्त हैं। परंतु मेरे खाने के लिए कुछ भी नहीं है इसका क्या कारण है? उसकी यह बात सुनकर ब्रह्मा जी समझा कर कहने लगे कि तुमने अपने अच्छे कर्मों के पुण्य से यह उत्तम लोग तो प्राप्त कर लिया, परंतु कभी भी किसी ब्राह्मण साधु-संत तथा भूखे को भोजन नहीं कराया। सदा अपना पेट पालने में लगे रहे हो इसी कारण तुम्हें यहां भोजन नहीं मिल पा रहा है। भोजन उन्हीं को प्राप्त होता है। जो भोजन का भी दान करते हैं। ब्रह्मा जी की ऐसी बात सुनकर वह कहने लगा कि आप मुझे ऐसा उपाय बताएं। जिससे मैं भूख से ना मरूँ। तब ब्रह्माजी कहने लगे कि तुम जिस सरोवर पर रहते थे। जहां तुम ने तप किया था। तुम वही रात में जाया करो और वहां तुम्हारी अपनी लाश ही तुम्हें रखी मिला करेगी तुम उसी में से मांस काटकर खाओ और तालाब का पानी पीकर अपनी भूख प्यास मिटाओ।

हे बुलाखी नाई! यह वही पुरुष तुमने आज मुर्दे का मांस खाते हुए देखा है। जिसका हाल मैंने सुनाया है देखो रात अधिक हो गई है। अब सो जाओ सवेरे जल्दी उठकर आगे चलेंगे।

14 July, 2020

स्थान मेहसाना (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास नाई की कहानियां)

स्थान मेहसाना (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास नाई की कहानियां)

स्थान मेहसाना (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास नाई की कहानियां)

प्रातः काल के 4:00 बजे के करीब मुर्गे ने कुकड़ू कूँ की आवाज लगाई। जिसे सुनकर गंगाराम पटेल और बुलाखीदास दोनों उठ बैठे उन्होंने अपना शौच आदि नित्य कर्म किया। कुछ नाश्ता करके अपना सब सामान संभाल कर भावनगर से प्रस्थान किया। मार्ग के किनारे के दृश्यों को देखते हुए वह घोड़े पर जल्दी-जल्दी जा रहे थे, क्योंकि अब तो उन्हें अपने घर पहुंचने की फिकर थी। जहां प्यास लगती थी वहां कुएँ से जल खींच कर पानी पी लिया करते थे। आज तो उन्होंने मार्ग में कहीं विश्राम भी नहीं किया। वह बीकानेर होते हुए सुरेंद्र नगर आए वहां से मार्ग तो अहमदाबाद की तरफ जाता था और दूसरा मेहसाना की ओर अहमदाबाद का मार्ग छोड़कर वह मेहसाना के मार्ग पर चले।

चलते-चलते सांयकाल वह मेहसाना आ गए। नगर के किनारे पर ही संत का एक आश्रम था। गंगाराम पटेल ने वहां के महात्मा से अपने ठहरने का विचार प्रकट किया तो उन्हें ठहरने की आज्ञा मिल गई। पटेल जी और बुलाखी ने देखा कि आश्रम पर अनेक संत महात्मा ठहरे हुए हैं। कोई वैष्णव है, तो कोई सन्यासी, कहीं पर उदासीन अपना धूनी जमाए चिमटा गाड़े हुए आसन पर बिराज रहे हैं। अनेक भक्त संतों की सेवा में लगे हुए हैं। पटेल जी अपना सामान महात्माओं से अलग एक ओर कुएं के पास रखवाया। उसके बाद बुलाखी को ₹50 देकर कहा कि तुम सामान लेकर जल्दी आना कहीं ऐसा ना हो कि तुम बाजार में जाकर इधर उधर घूमते रहो अगर बाजार बंद हो गया और सामान ना मिला तो भूखा ही मरना पड़ेगा।

बुलाखी रुपए लेकर बाजार गया वहां उसने अपना आवश्यक सामान खरीदा और जब वह आ रहा था तो उसने देखा कि एक अच्छा जुलूस जा रहा है। लोगों से पूछने पर पता चला है कि वह राजा के राजगुरु हैं कभी-कभी यहां राजा के महल में इसी भाँति जुलूस के साथ धूमधाम से आते रहते हैं। बुलाखी ने देखा राजगुरु बहुमूल्य वस्त्र पहने हुए हैं। साथ में बाजे बज रहे हैं। उसी समय वहां एक आदमी आया जिसके साथ 4 सिपाही थे। उस आदमी के आदेश से सिपाहियों ने राजगुरु को पकड़कर उसके हाथों में हथकड़ी डाल दी। बुलाखी यह सब देखता रहा जुलूस में हलचल मच गई लोगों ने राजा को खबर की। राजा भी वहां आया और उसने राजगुरु को प्रणाम तो किया, परंतु उन्हें सिपाहियों से मुक्त नहीं करा सका। यह देख बुलाखी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मामूली आदमी के कहने से सिपाहियों ने राजगुरु के हथकड़ी डाल दी और राजा अपने गुरु को मुक्त नहीं करा सका। बुलाखी सोच रहा था कि राजगुरु को गिरफ्तार करने वाला यह कौन आदमी हो सकता है? यों विचार करता हुआ बुलाखी अपना सामान लेकर संत के आश्रम पर आया और पटेल जी के सामने सब सामान रख कर कहने लगा कि अब मैं अपने घर जाता हूं। मेरी राम-राम लो।

पटेल जी बोले- हे बुलाखी! मैं समझता हूं तुम अवश्य कोई अजूबा चरित्र देखकर आए हो। अभी पहले भोजन का प्रबंध तो करो फिर सोते समय तुम्हारी बात को सुन लूंगा और उसका जवाब दूंगा। तब बुलाखी ने कुएं से पानी खींचा। बर्तन व नित्य की भांति मिलजुल कर भोजन बनाकर खाया फिर बुलाखी ने पटेल जी का बिस्तर लगा दिया। हुक्का भर कर रख दिया। पटेल जी हुक्का पीने लगे। तब बुलाकी ने बर्तन साफ करके रखें और सब सामान चौकशी के साथ रख दिया और फिर पटेल जी के पैर दबाने लगा। जब पटेल जी को नींद आने लगी तो बुलाखी बोला कि आज तो मेरी बात का जवाब दिए बिना ही सोने लगे।

इतनी सुनकर पटेल जी कहने लगे मैं थक गया था। इसलिए नींद आने लगी मुझे तुम्हारी बात का ध्यान नहीं रहा था। खैर अब जल्दी बताओ कि तुमने आज क्या देखा तब बुलाखी ने बाजार में जुलूस देखने और उसके बाद राजगुरु की गिरफ्तारी की बात बताई। और अंत में बोला-हे पटेल जी! मुझे यह आश्चर्य हुआ कि राजा की तो शक्ति सबसे बड़ी होती है। राजगुरु राजा के भी पूज्य हैं, तो ऐसा क्या कारण है कि राजगुरु को एक मामूली आदमी ने गिरफ्तार करा दिया और राजा यह सब कुछ देखता ही रहा।

बुलाखी दास नाई की बात सुनकर गंगाराम पटेल बोले- हे बुलाखी! तुम नित्य की भाँति हुंकारा देते जाना तभी मैं अपनी बात को सुनाऊंगा। बुलाखी को समझा कर गंगाराम पटेल ने बात करनी शुरू की और वह हूँकारा देने लगा। पटेल जी बोले- हे बुलाखी! अब मैं तुम्हारी शंका का निवारण कर रहा हूं। सुनो एक नगर में एक पुरुष अपनी पत्नी सहित रहता था। वह अपने परिवार में पति-पत्नी दो ही प्राणी थे।

एक दिन प्रातः काल पत्नी सोते से जाग कर पति से कहने लगी-
दोहा
सोवत में सपनों लखों, सुनो नाथ चितलाय।
भिक्षा मांगने को गयो, एक भिखारी आय।।
भिक्षुक को जब मैं गई, उठकर भिक्षा देन।
उंगली बासे छू गई, हृदय भई बेचैन।।
मेरे पतिव्रत धर्म पर, आय गई है आंच।
उंगली मेरी काट दो, तुम्हें बताऊं सांच।।
अपनी पत्नी की इस प्रकार की बात सुनकर उसका पति बोला कि
दोहा
भीख भिखारी को दई, सपने में सुकुमारि।
उंगली बासे छू गई, तोका भयो बिगारि।।
अरे यह तो सपने की बात है। अगर सपने में किसी भिखारी को भीख देने पर उंगली छू गई तो इसमें कोई पाप नहीं है। ना तेरे पतिव्रत धर्म पर ही कुछ आँच आती है। इसलिए यह उंगली काटने की बात तेरी व्यर्थ है। उसने अपनी पत्नी को समझा कर उसके पतिव्रत धर्म की प्रशंसा की। और अपने अपने नित्य कर्म दोनों ने किए। बाद में पत्नी ने भोजन बनाकर पति को खिलाया और कहने लगी कि यह हमारे कपड़े हैं। इन्हें बाजार से अभी सिला लाओ। वह आदमी अपनी पत्नी के कपड़े लेकर बाजार सिलाने गया। एक दुकान के आगे एक दर्जी बैठा कपड़े सी रहा था। वही उसकी मशीन तथा सब सामान रखा था। उसी के पास जाकर उसने कहा कि हमारी पत्नी के यह कपड़े तुम्हें आज ही सीने हैं। दर्जी ने वह कपड़ा उससे ले लिया और दिए हुए नाप के अनुसार कपड़ा उसी समय काट दिया और बचा कपड़ा व कपड़े की कतरन देकर बोला।
दोहा
कपड़ा यह लो प्रथम तुम, घर रख आओ जाय।
कपड़े तब मैं सीऊंगा, सुन लो कान लगाय।।
यहां ईमानदारी का काम है। मैं किसी की कतरन भी अपने यहां नहीं रहने देता। इतनी बात दर्जी की सुनकर वह पुरुष कहने लगा
दोहा
कपड़े तुम सी दो मेरे, सुनो लगाकर कान।
कतरन रखने से कोई, कहे ना तुम्हें बेईमान।।
लेकिन दर्जी बोला भाई मैंने अपना नियम ऐसा ही बना लिया है। कि मैं अपने यहां किसी की कतरन नहीं रखता पहले उसे घर रख कर आओ तभी कपड़े सिलूँगा। बहुत समझाने से भी दर्जी नहीं माना तो वह आदमी कतरन लेकर अपने घर को चल दिया, और मन में विचार करने लगा कि यह दर्जी तो मेरी पत्नी से भी अधिक धर्मात्मा है। देखो यह तो कतरन भी नहीं रखता। ऐसा विचार था हुआ वह जब घर लौट कर अपने घर आया तो देखा कि उसकी पत्नी घर पर नहीं है। वह घर की नकदी, अपने कपड़े और जेवर लेकर कहीं चली गई है। बक्सों के ताले खुले पड़े हैं। यह देखकर वह आश्चर्य में पड़ गया और सोचने लगा कि मेरी पत्नी का पति धर्म की अधिक बातें बनाना ढोंग निकला। सवेरे तो कह रही थी कि सपने में भिखारी को भीख देने में उंगली छू गई और वह उंगली अपवित्र हो गई है। इसे काट दो, मैं समझा कि बहुत पतिव्रता है परंतु देखो तो वह सब कपड़े जेवर और नकद रुपया लेकर भाग गई। दर्जी उससे भी अधिक ईमानदार बन रहा है। उसने कतरन भी अपने पास नहीं रखी। जब मेरी पत्नी इतनी धर्म की बात करने वाली हो कर भाग गई तो मुझे ऐसा लगता है कि इतना ईमानदार वह दर्जी भी वहां नहीं होगा।
यह विचार कर वह बाजार को वापस गया। वहां आकर क्या देखता है कि ना वहां दर्जी है, ना उसकी मशीन है, और ना कोई कपड़े। अब तो वह अपने मन में विचार करने लगा कि यह दुनिया भी कितनी अजीब है। मैंने जहां जहां अत्यधिक सच्चाई देखी। वहां पर अधिक बेईमानी और बुराई ही पाई।

मेरी पत्नी पतिव्रत होने का इतना पाखंड दिखाती थी। और वह भाग गई। दर्जी इतना ईमानदार बन रहा था कि किसी की कतरन भी रखना मंजूर ना था। वह सब कपड़ा ही लेकर भाग गया। खैर हुआ सो हुआ अब इतना ज्ञान अवश्य हो गया है। कि अब मैं किसी भी आडंबर वाले पर विश्वास नहीं करूंगा। जो अधिक दिखावे की बात करते हैं। वही अधिक बेईमान हैं। यह विचार करता वह अपने घर चला आया। पत्नी के बिना उसने घर में बड़ी मुश्किल से रात काटी। सवेरे उठकर उसने सोचा कि अब यहां रहना ठीक नहीं। अब मोहल्ले के लोगों को पता चलेगा कि मेरी पत्नी भाग गई है, तो वह लोग मेरी हंसी करेंगे। उसने अपने मकान में ताला लगाया और सोचा कि कहीं परदेस में चलकर नौकरी करनी चाहिए। घूमता हुआ वह एक राजा के यहां पहुंचा और अपनी नौकरी की इच्छा प्रकट की।

राजा उन दिनों अपने मन में एक कारण से परेशान रहता था। बात यह थी कि राजा के नगर से बालक चोरी हो जाते थे और बहुत प्रयत्न करने पर भी बालकों को चुराने वाला पकड़ा नहीं गया था। राजा ने उस आदमी को बालकों के चोर को पकड़ने के लिए नौकर रख लिया। वह आदमी राजा से बोला कि चार सिपाही मेरी आज्ञा पालन करने को मुझे दिए जाएं। और मैं जिसे बताऊं उसे गिरफ्तार कर लें। राजा ने ऐसा ही किया उसे नौकरी करते हुए कई महीने हो गए। आज जब राजगुरु की सवारी आई तो वह आदमी भी सिपाहियों सहित वहां था। उसने देखा कि राजगुरु बहुमूल्य वस्त्र पहने हैं। इत्रों की सुगंध आ रही है, गाजे-बाजे बज रहे हैं। यह देखकर वह आदमी विचार करने लगा कि राजा के गुरु का तो राजा सहित सभी लोग सम्मान करते हैं। फिर इन्हें इतना आडंबर दिखाने की क्या आवश्यकता। अधिक आडम्बर देखकर मुझे मालूम होता है, कि मेरी पत्नी और दर्जी के समान यह भी पूरे बेईमान होंगे। मेरा विश्वास है कि यही बालकों को चुराने वाले भी हैं। ऐसा विचार कर उसने सिपाहियों को आदेश दिया कि यही बालकों के चोर हैं इसलिए सिपाहियों इन्हें गिरफ्तार कर लो। जब राजा को समाचार ज्ञात हुआ तो वहां आकर उसने गुरु को प्रणाम किया। बालक पकड़ने की जांच कराई तो वहां नगर से बहुत से चोरी हुए बच्चे पाए गए। बात यह पता लगी थी कि जब राजगुरु धूमधाम से आते थे, तो लौटती बार कुछ बालकों की चोरी कराकर अपने आश्रम ले जाते थे। राजगुरु होने के कारण राजा या कोई अन्य पुरुष उन पर संदेह भी नहीं कर पाता था। कि गुरु बालकों के चोर होंगे। जिन लोगों के बालक राजगुरु के आश्रम पर मिले, वे लोग उन्हें वहां से अपने साथ में ले आए।

राजा ने उस आदमी को बुलाकर कहा- मैं तुमसे प्रसन्न हूं, कि तुमने बालकों के चोर का पता लगा लिया, परंतु यह बताओ कि राजगुरु पर तो कोई बालकों को चुराने का संदेह भी नहीं कर सकता था। परंतु तुमने उन्हें किस प्रकार चोर माना।

तब वह आदमी कहने लगा कि आज की दुनिया में मेरा अनुभव है कि जिस का अधिक आडंबर देखो उसी को अधिक बेईमान समझो। इसके बाद उसने राजा को आपबीती घटनाओं को सुनाया। जिसे सुनकर राजा ने उसे बहुत सम्मान दिया। गंगाराम पटेल बोले कि हे बुलाखी! तुम यही घटना आज देख कर आए हो। अब मैंने तुम्हारा सब आश्चर्य दूर कर दिया है। रात भी अधिक हो गई है सवेरे जल्दी उठना है इस कारण तुम सो जाओ।

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