HindiFiles.com - The Best Hindi Blog For Stories, Quotes, Status & Motivational Content.
हाल ही मे किए गए पोस्ट
Loading...

Blog

[blog][recentbylabel]

Movie

[movie][recentbylabel]

10 July, 2020

पांचवीं पुतली लीलावती की कहानी- दानवीर विक्रमादित्य

पांचवीं पुतली लीलावती की कहानी- दानवीर विक्रमादित्य

पांचवीं पुतली लीलावती की कहानी

पांचवे दिन राजा भोज सिंहासन पर बैठने की तैयारी कर ही रहे थे कि पांचवीं पुतली लीलावती ने उन्हें रोक दिया। लीलावती बोली, राजन, क्या आप विक्रमादित्य की तरह दानवीर और शूरवीर हैं? अगर हां, तब ही इस सिंहासन पर बैठने के अधिकारी होंगे। मैं आपको कथा सुनाती हूं, परम दानव‍ीर विक्रमादित्य की।

एक दिन विक्रमादित्य दरबार में राजकाज निबटा रहे थे। तभी एक विद्वान ब्राह्मण दरबार में आकर उनसे मिला। उसने कहा कि अगर वे तुला लग्न में अपने लिए कोई महल बनवाएं तो राज्य की जनता खुशहाल हो जाएगी और उनकी भी कीर्ति चारों तरफ फैल जाएगी।

विक्रम को उसकी बात जंच गई और उन्होंने एक बड़े ही भव्य महल का निर्माण करवाया। कारीगरों ने उसे राजा के निर्देश पर सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात और मणि-मोतियों से पूरी तरह सजा दिया।

महल जब बनकर तैयार हुआ तो उसकी भव्यता देखते बनती थी। विक्रम अपने सगे-सम्बन्धियों तथा नौकर-चाकरों के साथ उसे देखने गए। उनके साथ वह विद्वान ब्राह्मण भी था। विक्रम मंत्रमुग्ध हुए साथ ही वह ब्राह्मण मुंह खोले देखता रह गया। बिना सोचे उसके मुंह से निकला-'काश, इस महल का मालिक मैं होता!' राजा विक्रमादित्य ने यह सुनते ही झट वह भव्य महल उसे दान में दे दिया।

ब्राह्मण के तो मानो पांव ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। वह भागता हुआ अपनी पत्नी को यह समाचार सुनाने पहुंचा। इधर ब्राह्मणी उसे खाली हाथ आते देख कुछ बोलती उससे पहले ही उसने उसे हीरे-जवाहरात और मणि-मुक्ताओं से जड़े हुए महल को दान में प्राप्त करने की बात बता दी।

ब्राह्मण की पत्नी की तो खुशी की सीमा न रही। उसे एकबारगी लगा मानो उसका पति पागल हो गया और यों ही अनाप-शनाप बक रहा हों, मगर उसके बार-बार कहने पर वह उसके साथ महल देखने के लिए चलने को तैयार हो गई। महल की शोभा देखकर उसकी आंखे खुली रह गईं।

महल का कोना-कोना देखते-देखते कब शाम हो गई उन्हें पता ही नहीं चला। थके-मांदे वे एक शयन-कक्ष में जाकर निढाल हो गए। अर्द्ध रात्रि में उनकी आंखें किसी आवाज से खुल गई।

सारे महल में महक फैली थी और सारा महल प्रकाशमान था। उन्होंने ध्यान से सुना तो लक्ष्मी बोल रही थी। वह कह रही थी कि उनके भाग्य से वह यहां आई है और उनकी कोई भी इच्छा पूरी करने को तैयार है।

ब्राह्मण दम्पति का डर के मारे बुरा हाल हो गया। ब्राह्मणी तो बेहोश ही हो गई। लक्ष्मी ने तीन बार अपनी बात दुहराई। लेकिन ब्राह्मण ने कुछ नहीं मांगा तो क्रुद्ध होकर चली गई। उसके जाते ही प्रकाश तथा महक- दोनों गायब।
काफी देर बाद ब्राह्मणी को होश आया तो उसने कहा- 'यह महल जरूर भुतहा है, इसलिए दान में मिला। इससे अच्छा तो हमारा टूटा-फूटा घर है जहां चैन की नींद सो सकते हैं।' ब्राह्मण को पत्नी की बात जंच गई।

सहमे-सहमे बाकी रात काटकर तड़के ही उन्होंने अपना सामान समेटा और पुरानी कुटिया को लौट आए। ब्राह्मण अपने घर से सीधा राजभवन आया और विक्रमादित्य से अनुरोध करने लगा कि वे अपना महल वापस ले लें। पर दान दी गई वस्तु को वे कैसे ग्रहण कर लेते।

काफी सोचने के बाद उन्होंने महल का उचित मूल्य लगाकर उसे खरीद लिया। ब्राह्मण खुशी-खुशी अपने घर लौट गया।

ब्राह्मण से महल खरीदने के बाद राजा विक्रमादित्य उसमें आकर रहने लगे। वहीं अब दरबार भी लगता था। एक दिन वे सोए हुए थे तो लक्ष्मी फिर आई।
जब लक्ष्मी ने उनसे कुछ भी मांगने को कहा तो वे बोले- 'आपकी कृपा से मेरे पास सब कुछ है। फिर भी आप अगर देना ही चाहती हैं तो मेरे पूरे राज्य में धन की वर्षा कर दें और मेरी प्रजा को किसी चीज की कमी न रहने दें।'

सुबह उठकर उन्हें पता चला कि सारे राज्य में धन वर्षा हुई है और लोग वर्षा वाला धन राजा को सौंप देना चाहते हैं। विक्रमादित्य ने आदेश किया कि कोई भी किसी अन्य के हिस्से का धन नहीं समेटेगा और अपने हिस्से का धन अपनी सम्पत्ति मानेगा। जनता जय-जयकार कर उठी।

इतना कहते ही पुतली लीलावती बोली, बोलो राजन, क्या इस कथा के बाद तुम इस सिंहासन के योग्य अपने आपको पाते हो? राजा भोज निराश हो गए और अपने कक्ष में लौट गए। अगले दिन राजा को रोका छठी पुतली रविभामा ने।

Story of the fifth dolly Lilavati

King Bhoj was preparing to sit on the throne on the fifth day that the fifth idol Lilavati stopped him. Lilavati quote, Rajan, are you like Monkeys and Knights like Vikramaditya? If yes, only then will the officer be seated on this throne. I tell you the story of Param Danvir Vikramaditya.

One day Vikramaditya was taking over the affairs of the court, when a scholar came to the court in Brahmin Darbar. He said that if they make a palace for themselves in the wedding ceremony, the people of the state will be happy and their reputation will spread all over.

Vikram got his point and he built a magnificent palace. On the instructions of the king, the craftsmen completely punished them with gold and silver, diamonds and gems and gems.

When the palace was ready, its grandeur was seen. Vikram went to see him with his relatives and servants. He was also a scholar Brahmin with him. As Vikram was enchanted, he continued to see Brahmin opened his mouth. Out of his mouth without thinking - 'I wish I could own the palace!' As soon as King Vikramaditya heard this, the grand palace donated it to him.

The Brahmin's feet were not falling on the ground. He ran away to tell his wife this news. Here, before the Brahminic speaks of seeing him empty-handed, he has already told him about getting the money in the diamond-jewels and gem-masked palaces.

Brahmin's wife had no boundaries of happiness. It seemed as if it was a time for her husband to go crazy and she would have been unconsciously bak, but repeatedly telling her, she got ready to walk with her to see the palace. Seeing the splendor of the palace, his eyes were kept open.

Seeing the corner of the palace and seeing when it was evening they did not know. Tired and tired, they fell into a bedroom and disappeared. In half an hour, his eyes were opened with a voice.

The smell spread across the palace and the whole palace was bright. He listened carefully and Lakshmi was speaking. He was saying that with his fate he has come here and is ready to fulfill any of his wishes.
Brahmin couple got worried about fear of couple Brahmini became unconscious. Lakshmi repeated her talk three times. But Brahmin did not ask for anything but went angry. As soon as he gets his light and smell - both disappear

After quite a while, the Brahmin realized the senses and said, "This palace is definitely scary, so donations are found in donation. Better than this, we have a broken house where the sleep of peace can sleep. ' Brahmin got married to wife

Suddenly, after spending the rest of the night in the morning, they wrapped their bags and returned to the old cottage. Brahmin came directly from his house to the Raj Bhawan and requested Vikramaditya to withdraw his palace. But how can they accept the donation given?

After thinking enough, they bought the fair value of the palace and bought it. Brahmin happily returned to his home.

After buying the palace from the Brahmin, King Vikramaditya came and settled in it. At the same time, the court also seemed to be there. One day he was asleep and Lakshmi came back.

When Lakshmi asked them to ask anything, they said, 'I have everything with my grace. Even if you want to give it, then pour the money in my entire state and let my people not lack any thing. '

When they got up in the morning, they came to know that money has rained in all the states and people want to give rain money to the king. Vikramaditya has ordered that no one will fund the share of anybody else and the wealth of his share will be his property. People jaise jai ho ho ho.

So say the effigy of lipstick, say, Rajan, do you find yourself worthy of this throne after this story? King Bhoj was disappointed and returned to his room. The next day Raja stopped the sixth pupil, Ravbhamma.

26 June, 2020

चौथी पुतली कामकंदला की कहानी- विक्रमादित्य की दानवीरता

चौथी पुतली कामकंदला की कहानी- विक्रमादित्य की दानवीरता

चौथी पुतली कामकंदला की कहानी

चौथे दिन जैसे ही राजा सिंहासन पर चढ़ने को उद्यत हुए पुतली कामकंदला बोल पड़ी, रूकिए राजन, आप इस सिंहासन पर कैसे बैठ सकते हैं? यह सिंहासन दानवीर राजा विक्रमादित्य का है। क्या आप में है उनकी तरह विशेष गुण और त्याग की भावना?

राजा ने कहा- हे सुंदरी, तुम भी विक्रमादित्य की ऐसी कथा सुनाओ जिससे उनकी विलक्षणता का पता चले।

पुतली बोली, सुनो राजन, एक दिन राजा विक्रमादित्य दरबार को संबोधित कर रहे थे, तभी किसी ने सूचना दी कि एक ब्राह्मण उनसे मिलना चाहता है। विक्रमादित्य ने कहा कि ब्राह्मण को अंदर लाया जाए। विक्रमादित्य ने उसके आने का प्रयोजन पूछा।

ब्राह्मण ने कहा कि वह किसी दान की इच्छा से नहीं आया है, बल्कि उन्हें कुछ बताने आया है। उसने बताया कि मानसरोवर में सूर्योदय होते ही एक खंभा प्रकट होता है जो सूर्य का प्रकाश ज्यों-ज्यों फैलता है ऊपर उठता चला जाता है और जब सूर्य की गर्मी अपनी पराकाष्ठा पर होती है तो वह साक्षात सूर्य को स्पर्श करता है। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी घटती है, छोटा होता जाता है तथा सूर्यास्त होते ही जल में विलीन हो जाता है।

विक्रमादित्य के मन में जिज्ञासा हुई कि आखिर वह कौन है। ब्राह्मण ने बताया कि वह भगवान इन्द्र का दूत बनकर आया है। देवराज इन्द्र का आपके प्रति जो विश्वास है आपको उसकी रक्षा करनी होगी।

आगे उसने कहा कि सूर्य देवता को घमंड है कि समुद्र देवता को छोड़कर पूरे ब्रह्मांड में कोई भी उनकी गर्मी को सहन नहीं कर सकता। देवराज इन्द्र उनकी इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि उनकी अनुकम्पा प्राप्त मृत्युलोक का एक राजा सूर्य की गर्मी की परवाह न करके उनके निकट जा सकता है। वह राजा आप हैं।

राजा विक्रमादित्य को अब सारी बात समझ में आ गई। उन्होंने सोच लिया कि प्राणोत्सर्ग करके भी सूर्य भगवान को समीप से जाकर नमस्कार करेंगे तथा देवराज के उनके प्रति विश्वास की रक्षा करेंगे।

उन्होंने ब्राह्मण को समुचित दान-दक्षिणा देकर विदा किया तथा अपनी योजना को कार्य-रूप देने का उपाय सोचने लगे। भोर होने पर दूसरे दिन वे अपना राज्य छोड़कर चल पड़े। एकांत में उन्होंने मां काली द्वारा प्रदत्त दोनों बेतालों का स्मरण किया। दोनों बेताल तत्क्षण उपस्थित हो गए।

विक्रम को दोनों बेताल ने बताया कि उन्हें उस खंभे के बारे में सब कुछ पता है। दोनों बेताल उन्हें मानसरोवर के तट पर लाए। रात उन्होंने हरियाली से भरी जगह पर काटी और भोर होते ही उस जगह पर नजर टिका दी, जहां से खंभा प्रकट होता। सूर्य की किरणों ने जैसे ही मानसरोवर के जल को छुआ, एक खंभा प्रकट हुआ।

विक्रमादित्य तुरंत तैरकर उस खंभे तक पहुंचे। खंभे पर जैसे विक्रमादित्य चढ़े जल में हलचल हुई और लहरें उठकर विक्रम के पैर छूने लगीं। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी बढी़, खंभा बढ़ता रहा। दोपहर आते-आते खंभा सूर्य के बिल्कुल करीब आ गया। तब तक विक्रम का शरीर जलकर बिलकुल राख हो गया था। सूर्य भगवान ने जब खंभे पर एक मानव को जला हुआ पाया, तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि विक्रम को छोड़कर कोई दूसरा नहीं होगा। उन्होंने भगवान इन्द्र के दावे को बिल्कुल सच पाया।

उन्होंने अमृत की बूंदों से विक्रम को जीवित किया तथा अपने स्वर्णकुंडल उतारकर भेंट कर दिए। उन कुंडलों की यह विशेषता थी कि कोई भी इच्छित वस्तु वे कभी भी प्रदान कर देते। सूर्य देव ने अपना रथ अस्ताचल की दिशा में बढ़ाया तो खंभा घटने लगा।

सूर्यास्त होते ही खंभा पूरी तरह घट गया और विक्रम जल पर तैरने लगे। तैरकर सरोवर के किनारे आए और दोनों बेतालों का स्मरण किया। बेताल उन्हें फिर उसी जगह लाए जहां से उन्हें सरोवर ले गए थे।

विक्रम पैदल अपने महल की दिशा में चल पड़े। कुछ ही दूर पर एक ब्राह्मण मिला जिसने बातों-बातों में कुण्डल मांग लिए। विक्रम ने बिना एक पलकी देरी किए बेहिचक उसे दोनों कुंडल दे दिए।

पुतली बोली- बोलो राजन, क्या तुम में है वह पराक्रम कि सूर्य के नजदीक जाने की हिम्मत कर सको? और अगर चले जाओ तो देवों के देव सूर्यदेव के स्वर्णकुंडल किसी साधारण ब्राह्मण को दे सको? अगर हां तो इस सिंहासन पर तुम्हारा स्वागत है।

राजा पेशोपेश में पड़ गया और इस तरह चौथा दिन भी चला गया। पांचवे दिन पांचवी पुतली लीलावती ने सुनाई विक्रमादित्य के शौर्य की गाथा।

Story of the fourth pupil Kamakandala

On the fourth day, as soon as the king began to climb the throne, the idol of Kamal said, how can you sit on this throne? This throne is of the King Dan Veer Vikramaditya. Do you have special qualities and feelings of sacrifice like them?

The king said, "O beautiful baby, tell me the story of Vikramaditya that you know about his greatness.

Putuli quote, listen to Rajan, one day Raja Vikramaditya was addressing the court, only when somebody informed that a Brahmin wanted to meet him. Vikramaditya said that Brahmin should be brought in. Vikramaditya asked the purpose of his coming.

Brahmin said that he has not come from the will of any donation, but has come to tell him something. He explained that a pillar appears in Sunrise in Mansarovar, which goes up till sunlight spreads, and when the sun's heat is on its peak, it touches the sun in its light. As the heat of the sun decreases, it becomes smaller and dissolves in water as soon as it is sunset.
Vikramaditya was curious about who he is. Brahman said that he has come as an angel of Lord Indra. You will have to defend Devraj Indra which is your faith.

He further said that Sun God is proud that no one can bear his heat except in the whole universe except the sea god. Devraj Indra does not agree with this. He believes that a king of the deceased, who is blessed with his sympathy, can not approach the heat of the sun and go near them. That's the king you are
King Vikramaditya understood everything now. He thought that even by giving life, he would go to the Sun God and greet him and protect the faith of the Devraj.
He gave a proper donation to the Brahmin and gave a dakshina and began to think of ways to give up his plan. On the second day after dawn, he left his state and left. In solitude, he remembered both of the two supplications provided by Kali. Both of them were present at the helm.

Both supplications told Vikram that they know everything about that pillar. Both of them brought them to the banks of Mansarovar. At night, he cut down on the greenery and filled the place, and looked at the place where the pillar appears. As soon as the sun rays touched Mansarovar's water, a pillar appeared.

Vikramaditya swam right to the pillar. On the pillar like Vikramaditya, there was a stir in the water and the waves got up and touched the feet of Vikram. As the sun's heat grew, the pillar continued to grow. In the afternoon, the pillar came closer to the sun. Till then, Vikram's body was completely burnt to ashes. When the Sun God found a human being burned on the pillar, it did not take long to understand that there would be no second except Vikram. They found the claim of Lord Indra to be absolutely true.

He raised Vikram from the elves of the nectar and lifted his golden cylinders and presented them. This feature of those horoscopes was that they would never give any desired object. When the Sun God extended his chariot in the direction of the odd, the pillar started decreasing.
At sunset, the pillar fell completely and Vikram started swimming on water. Swim came to the banks of the lake and recalled the two guests. The furrows brought them back to where they took the lake.

Vikram walked on foot towards his castle. A Brahmin found a few moments that demanded the horoscope in talk. Without delay, Vikram gave them both coils without hesitation.

Pupil quote: Bolo Rajan, are you in the power to dare to go near the sun? And if you go away, can you give Gods God's golden kundalaya to an ordinary Brahmin? If so, you are welcome to this throne.

Raja fell in love and thus went on the fourth day. On the fifth day, the fifth pupil Lailavati narrated the bravery of Vikramaditya.
तीसरी पुतली चंद्रकला की कहानी- भाग्य और पुरुषार्थ की कथा

तीसरी पुतली चंद्रकला की कहानी- भाग्य और पुरुषार्थ की कथा

तीसरी पुतली चंद्रकला की कहानी

तीसरे दिन जब वह सिंहासन पर बैठने को हुआ तो चंद्रकला नाम की तीसरी पुतली ने उसे रोककर कहा, 'हे राजन्! यह क्या करते हो? पहले विक्रमादित्य जैसे काम करों, तब सिंहासन पर बैठना!'
राजा ने पूछा, 'विक्रमादित्य ने कैसे काम किए थे?'
पुतली बोली, 'लो, सुनो।' तीसरी पुतली चन्द्रकला ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है -

एक बार पुरुषार्थ और भाग्य में इस बात पर ठन गई कि कौन बड़ा है? पुरुषार्थ कहता कि बगैर मेहनत के कुछ भी संभव नहीं है जबकि भाग्य का मानना था कि जिसको जो भी मिलता है भाग्य से मिलता है। परिश्रम की कोई भूमिका नहीं होती है। उनके विवाद ने ऐसा उग्र रूप ग्रहण कर लिया कि दोनों को देवराज इन्द्र के पास जाना पड़ा।

झगड़ा बहुत ही पेचीदा था इसलिए इन्द्र भी चकरा गए। पुरुषार्थ को वे नहीं मानते जिन्हें भाग्य से ही सब कुछ प्राप्त हो चुका था। दूसरी तरफ अगर भाग्य को बड़ा बताते तो पुरुषार्थ उनका उदाहरण प्रस्तुत करता जिन्होंने मेहनत से सब कुछ अर्जित किया था।

इन्द्र असमंजस में पड़ गए और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे। काफी सोचने के बाद उन्हें विक्रमादित्य की याद आई। उन्हें लगा सारे विश्व में इस झगड़े का समाधान सिर्फ वही कर सकते हैं।

उन्होंने पुरुषार्थ और भाग्य को विक्रमादित्य के पास जाने के लिए कहा। पुरुषार्थ और भाग्य मानव वेष में विक्रमादित्य के पास चल पड़े। विक्रमादित्य को भी झगड़े का तुरंत कोई समाधान नहीं सूझा। उन्होंने दोनों से छ: महीने बाद आने को कहा।

जब वे चले गए तो विक्रमादित्य ने काफी सोचा। समाधान के लिए वे सामान्य जनता के बीच वेष बदलकर घूमने लगे। काफी घूमने के बाद भी जब कोई संतोषजनक हल नहीं खोज पाए तो दूसरे राज्यों में भी घूमने का निर्णय किया।
काफी भटकने के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला तो उन्होंने एक व्यापारी के यहां नौकरी कर ली। व्यापारी ने उन्हें नौकरी उनके यह कहने पर दी कि जो काम दूसरे नहीं कर सकते हैं वे कर देंगे।

कुछ दिनों बाद वह व्यापारी जहाज पर अपना माल लादकर दूसरे देशों में व्यापार करने के लिए समुद्री रास्ते से चल पड़ा। अन्य नौकरों के अलावा उसके साथ विक्रमादित्य भी थे। जहाज कुछ ही दूर गया होगा कि भयानक तूफान आ गया। जहाज पर सवार लोगों में भय और हताशा की लहर दौड़ गई। किसी तरह जहाज एक टापू के पास आया और वहां लंगर डाल दिया गया। जब तूफान समाप्त हुआ तो लंगर उठाया जाने लगा। मगर लंगर किसी के उठाए न उठा।

अब व्यापारी को याद आया कि विक्रमादित्य ने यह कहकर नौकरी ली थी कि जो कोई न कर सकेगा वे कर देंगे। उसने विक्रम से लंगर उठाने को कहा। लंगर उनसे आसानी से उठ गया। लंगर उठते ही जहाज तेज गति से बढ़ गया लेकिन टापू पर विक्रमादित्य छूट गए।

उनकी समझ में नहीं आया क्या किया जाए। द्वीप पर घूमने-फिरने चल पड़े। नगर के द्वार पर एक पट्टिका टंगी थी, जिस पर लिखा था कि वहां की राजकुमारी का विवाह पराक्रमी विक्रमादित्य से ही होगा। वे चलते-चलते महल तक पहुंचे।

राजकुमारी उनका परिचय पाकर खुश हुई और दोनों का विवाह हो गया। कुछ समय बाद वे कुछ सेवकों को साथ ले अपने राज्य की ओर चल पड़े। रास्ते में विश्राम के लिए जहां डेरा डाला वहीं एक संन्यासी से उनकी भेंट हुई। संन्यासी ने उन्हें एक माला और एक छड़ी दी।

उस माला की दो विशेषताएं थीं- उसे पहनने वाला अदृश्य होकर सब कुछ देख सकता था तथा गले में माला रहने पर उसका हर कार्य सिद्ध हो जाता। छड़ी से उसका मालिक सोने के पूर्व कोई भी आभूषण मांग सकता था।

संन्यासी को धन्यवाद देकर विक्रमादित्य अपने राज्य लौटे। एक उद्यान में ठहरकर संग आए सेवकों को वापस भेज दिया तथा अपनी पत्नी को संदेश भिजवाया कि शीघ्र ही वे उसे अपने राज्य बुलवा लेंगे।

उद्यान में ही उनकी भेंट एक ब्राह्मण और एक भाट से हुई। वे दोनों काफी समय से उस उद्यान की देखभाल कर रहे थे। उन्हें आशा थी कि उनके राजा कभी उनकी सुध लेंगे तथा उनकी विपन्नता को दूर करेंगे। विक्रमादित्य पसीज गए। उन्होंने संन्यासी वाली माला भाट को तथा छड़ी ब्राह्मण को दे दी। ऐसी अमूल्य चीजें पाकर दोनों धन्य हुए और विक्रम का गुणगान करते हुए चले गए।
विक्रम राज दरबार में पहुंचकर अपने कार्य में संलग्न हो गए। छ: मास की अवधि पूरी हुई, तो पुरुषार्थ तथा भाग्य अपने फैसले के लिए उनके पास आए।
विक्रमादित्य ने फैसला दिया कि कि भाग्य और पुरुषार्थ एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्हें छड़ी और माला का उदाहरण याद आया। जो छड़ी और माला उन्हें भाग्य से संन्यासी से प्राप्त हुई थीं। उन्हें ब्राह्मण और भाट ने पुरुषार्थ से प्राप्त किया। पुरुषार्थ और भाग्य पूरी तरह संतुष्ट होकर वहां से चले गए।

कहानी सुनाकर पुतली बोली- बोलो राजा, क्या आप में है ऐसा न्यायप्रिय फैसला देने की दक्षता और अमूल्य वस्तुएं दान में देने का ह्रदय और सामर्थ्य?
राजा फिर सोच में पड़ गए और तीसरे दिन भी सिंहासन पर नहीं बैठ सके। चौथे दिन चौथी पुतली कामकंदला ने सुनाई विक्रमादित्य की दानवीरता की कथा।

Story of the third pupil Chandrakal

On the third day when he was about to sit on the throne, the third puppet named Chandrakala stopped him and said, 'O Rajan! What is this that you do? Work like Vikramaditya first, then sit on the throne! '
The King asked, 'How did Vikramaditya work?'
Pupil said, 'Take, listen.' The story that Chandrakala, the third cathedral, is as follows -

Once in the man's destiny and fortune it was settled that who is big? Purushartha would say that nothing is possible without effort, whereas fate believed that whatever he gets, he gets fate. There is no role of diligence. Their dispute took such a formidable form that both of them had to go to Devraj Indra.

The quarrel was very intriguing, so Indra was also confused. They do not believe Manashrushtharth, who had received everything from destiny. On the other hand, if the fate was big, then Purushartha presented his example, who had earned everything from hard work.

Indra fell into dilemma and did not reach any conclusion. After much thought he remembered Vikramaditya. They thought that only the solution to this dispute can be done in the whole world.
They asked Purushartha and Bhagya to go to Vikramaditya. Purushartha and destiny go to Vikramaditya in the human way. Vikramaditya also did not get any solutions immediately to dispute. They asked both of them to come six months later.
Vikramaditya thought a lot when they went away To solve this, he started changing the look among the general public. Even after a lot of strings, when no satisfactory solution was found, then in other states, it was decided to move.

After much wandering, even when no solution came out, he got a job here from a businessman. The trader gave him the job when he told them that they can not do the other things.

A few days later, after carrying out his cargo on the merchant ship, he went on a sea route to do business in other countries. Among other servants Vikramaditya was also with him. The ship would have gone a few times that terrible storm came. There was a wave of fear and frustration in the people aboard the ship. Somehow the ship came to an island and anchor was put there. After the storm calmed down, they started removing the free food But the anchor could not be lifted by anyone
Now the trader remembered that Vikramaditya had taken a job saying that anyone who can not do it will do it. He asked Vikram to lift the anchor. The anchor was easily lifted by them As the anchor rose, the ship increased rapidly, but Vikramaditya missed the island.
He didn't understand what to do. Walking around the island There was a plaque hanging on the entrance of the town, which was written that the princess of the princess would be married to mighty Vikramaditya. They reached the palace on foot.

The princess was happy to introduce her and both of them got married. After some time, they took some servants together and headed towards their kingdom. While on the way to the rest of the camp, he was offered a sannyasin. Saints gave them a rosary and a stick.

There were two characteristics of that garland - the person wearing it could be able to see everything and disappear in the neck, and all his work was proven. The owner of the stick could demand any jewelery before sleeping.

Vikramaditya returned to his kingdom, thanking the monk. Staying in a park, sent back the servants who were accompanying him and sent a message to his wife that soon they would call him his state.

In the garden itself, his gift came from a Brahmin and a Bhat. They were both taking care of that garden for a long time. He hoped that his king would take care of him and remove his misery. Vikramaditya got fatigued. He gave the Sanyasari Mala Bhat and the stick Brahmin. After getting such priceless things both were blessed and went on praising Vikram.

Vikram joined the Raj Darbar in his work. When the period of six months was completed, then Purushartha and fate came to him for his decision.

Vikramaditya made the decision that fortune and happiness are complementary to each other. He remembered the example of the stick and the garland. The rod and the garland that they received from Bhagya were from Sanyasi. He received Brahmin and Bhat from Purushartha. Purushartha and destiny completely satisfied and went away from there.
Put the puppet speech by saying the story, say, king, is the ability to give you such a fair decision and the heart and strength to donate priceless things?

The king again got into thinking and did not sit on the throne on the third day. The story of the charisma of Vikramaditya, narrated by Kamakandala, the fourth pupil on the fourth day.

25 June, 2020

दूसरी पुतली चित्रलेखा की कहानी- अमर फल और विक्रमादित्य का पराक्रम

दूसरी पुतली चित्रलेखा की कहानी- अमर फल और विक्रमादित्य का पराक्रम

दूसरी पुतली चित्रलेखा की कहानी

अगले दिन जैसे ही राजा भोज ने सिंहासन पर बैठना चाहा तो दूसरी पुतली बोली- जो राजा विक्रमादित्य जैसा गुणी हो, पराक्रमी हो, यशस्वी हो वही बैठ सकता है इस सिंहासन पर।

राजा ने पूछा, 'विक्रमादित्य में क्या गुण थे?'पुतली चित्रलेखा ने कहा, 'सुनो।'
एक बार राजा विक्रमादित्य की इच्छा योग साधने की हुई। अपना राजपाट अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर अंग में भभूत लगाकर जंगल में चले गए।
उसी जंगल में एक ब्राह्मण तपस्या कर रहा था। देवताओं ने प्रसन्न होकर उस ब्राह्मण को एक फल दिया और कहा, 'जो इसे खा लेगा, वह अमर हो जाएगा। 'ब्राह्मण ने वह फल को अपनी पत्नी को दे दिया। पत्नी ने उससे कहा, 'इसे राजा को दे आओ और बदले में कुछ धन ले आओ

ब्राह्मण ने जाकर वह फल राजा को दे दिया। राजा अपनी रानी को बहुत प्यार करता था। उसने वह फल अपनी रानी का दे दिया। रानी का प्रेम शहर के कोतवाल से था। रानी ने वह फल उसे दे दिया।

कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था। उसने वह फल वेश्या को दे दिया। वेश्या ने सोचा कि, 'मैं अमर हो जाऊंगी तो भी पाप कर्म करती रहूंगी। अच्छा होगा कि यह फल राजा को दे दूं। वह जिएगें तो लाखों का भला करेगें।' यह सोचकर उसने दरबार में जाकर वह फल राजा को दे दिया।

फल को देखकर राजा चकित रह गए। उन्हें सारा भेद मालूम हुआ तो बड़ा दुख हुआ। उसे दुनिया बेकार लगने लगी। एक दिन वह बिना किसी से कहे-सुने राजघाट छोड़कर घर से निकल गए।

राजा इंद्र को यह मालूम हुआ तो उन्होंने राज्य की रखवाली के लिए एक दूत भेज दिया।

इधर जब राजा विक्रमादित्य की योग-साधना पूरी हुई तो वह लौटे। दूत ने उन्हें रोका। विक्रमादित्य ने उससे पूछा तो उसने सब हाल बता दिया।

विक्रमादित्य ने अपना नाम बताया, फिर भी दूत ने उन्हें न जाने दिया। बोला, 'तुम विक्रमादित्य हो तो पहले मुझसे लड़ो।'
दोनों में लड़ाई हुई। विक्रमादित्य ने उसे पछाड़ दिया।
दूत बोला, 'मुझे छोड़ दो। मैं किसी दिन आपके काम आऊंगा।'
इतना कहकर पुतली बोली, 'राजन्!
क्या आप में इतना पराक्रम है कि इन्द्र के दूत को हरा कर अपना गुलाम बना सको?

Story of second pupil chitralekha

The next day, as soon as King Bhoj wanted to sit on the throne, the second pupil quote - which is virtuous like King Vikramaditya, is mighty, can be successful only if he is sitting on this throne.

The King asked, 'What qualities were there in Vikramaditya?' Pullei Chitralekha said, 'Listen.'
Once, King Vikramaditya's desire was done by Yoga. By submitting his palate to his younger brother Bharthiharri, he went into the jungle after being embroiled in the limbs.

In the same forest a Brahmin was performing austerity. The deities pleased and gave a fruit to that Brahman and said, 'Whoever eats it will become immortal. 'Brahmin gave that fruit to his wife. The wife said to him, 'Give it to the king and get some money in return
Brahmin went and gave the fruit to the king. The king loved his queen a lot. He gave that fruit to his queen. The queen's love was from Kotwal of the city. The Queen gave that fruit to him.

Inspector used to go to a prostitute. She gave that fruit to the prostitute. The prostitute thought, 'Even if I am immortal, I will continue to sin. It would be good to give this fruit to the king. He will do good to millions. ' Thinking that he went to the court and gave the fruit to the king.

The King was surprised to see the fruit. If they knew all the difference then there was great sorrow. The world seemed to be useless One day he left the house and left the house without any reason.

When Raja Indra realized this, he sent an angel to guard the state.

Here when the yoga-practice of King Vikramaditya was completed, he returned. The angel stopped them. When Vikramaditya asked him, he told all the details.
Vikramaditya said his name, yet the messenger did not let them go. You said, 'If you are Vikramaditya then fight with me first.'

There was a fight between them. Vikramaditya defeated him.
The envoy said, 'Leave me. I will come to your work some day. '
By saying so, the pupil said, 'Rajan!
Is there so much power in you that you can make your slave by defeating the messenger of Indra?

24 June, 2020

पहली पुतली रत्नमंजरी की कहानी - राजा विक्रमादित्य और सिंहासन प्राप्ति

पहली पुतली रत्नमंजरी की कहानी - राजा विक्रमादित्य और सिंहासन प्राप्ति

पहली पुतली रत्नमंजरी की कहानी

अंबावती में एक राजा राज्य करता था। वह बड़ा दानी था। उसी राज्य में धर्मसेन नाम का एक और बड़ा राजा हुआ। उसकी चार रानियां थी। एक थी ब्राह्मण, दूसरी क्षत्रिय, तीसरी वैश्य और चौथी शूद्र। ब्राह्मणी से एक पुत्र हुआ, जिसका नाम ब्राह्मणीत रखा गया। क्षत्राणी से तीन बेटे हुए। एक का नाम शंख, दूसरे का नाम विक्रमादित्य और तीसरे का भर्तृहरि रखा गया। वैश्य से एक लड़का हुआ, जिसका नाम चंद्र रखा गया। शूद्राणी से धन्वन्तारि हुए।

जब वे लड़के बड़े हुए तो ब्राह्मणी का बेटा घर से निकल पड़ा और धारापुर आया। हे राजन्! वहां के राजा तुम्हारे पिता थे। उस लड़के ने राजा को मार डाला और राज्य अपने हाथ में ले करके उज्जैन पहुंचा। संयोग की बात है कि उज्जैन में आते ही वह मर गया। उसके मरने पर क्षत्राणी का बेटा शंख गद्दी पर बैठा। कुछ समय बाद विक्रमादित्य गद्दी पर बैठें।

एक दिन राजा विक्रमादित्य को राजा बाहुबल के बारे में पता चला कि जिस गद्दी पर वह बैठे हैं वह राजा बाहुबल की कृपा से है। पंडितों ने सलाह दी कि हे राजन्! आपको जग जानता है, लेकिन जब तक राजा बाहुबल आपका राजतिलक नहीं करेगें, तब तक आपका राज्य अचल नहीं होगा। आप उनसे राजतिलक करवाओ।

विक्रमादित्य ने कहा, 'अच्छा।' और वह अपने ज्ञानी और विश्वसनीय साथी लूतवरण को साथ लेकर वहां गए। बाहुबल ने बड़े आदर से उसका स्वागत किया। पांच दिन बीत गए। लूतवरण ने विक्रमादित्य को सलाह दी कि, 'जब आप विदा लेगें तब राजा बाहुबल आपसे कुछ मांगने को कहेगें।

राजा के घर में एक सिंहासन हैं, जिसे साक्षात महादेव ने राजा इन्द्र को दिया था। और बाद में इन्द्र ने बाहुबल को दिया। उस सिंहासन में यह गुण है कि जो उस पर बैठेगा। वह सात द्वीप नवखंड पृथ्वी पर राज करेगा। उसमें बहुत-से जवाहरात जड़े हैं। उसमें सांचे में ढालकर बत्तीस पुतलियां लगाई गई है। हे राजन्! तुम उसी सिंहासन को मांग लेना।'

अगले दिन जब विक्रमादित्य विदा लेने गए तो उसने वही सिंहासन मांग लिया। राजा बाहुबल वचन से बंधे थे। बाहुबल ने विक्रमादित्य को उस पर बिठाकर राजतिलक किया और बड़े प्रेम से विदा किया।

राजा विक्रमादित्य ने लौटते ही सभा की और पंडितों को बुलाकर कहा, 'मैं एक अनुष्ठान करना चाहता हूं। आप देखकर बताएं कि मैं इसके योग्य हूं या नहीं।'
पंडितों ने कहा, 'आपका प्रताप तीनों लोकों में छाया हुआ है। आपका कोई बैरी नहीं। जो करना हो, कीजिए।'

अपने खानदान के सब लोगों को बुलाइए, सवा लाख कन्या दान और सवा लाख गायें दान कीजिए, ब्राह्मणों को धन दीजिए, जमींदारों का एक साल का लगान माफ कर दीजिए।'

इतना कहकर पुतली रत्नमंजरी बोली, 'हे राजन्! आपने अगर कभी ऐसा दान किया है तो सिंहासन पर अवश्य बैठें।'

पुतली की बात सुनकर राजा भोज ‍निराश हो गए- 'आज का दिन तो गया। अब तैयारी करो, कल सिंहासन पर बैठेंगे।'

इस तरह सिंहासन बत्तीसी की पहली पुतली ने राजा भोज को नहीं बैठने दिया और अगले दिन दूसरी पुतली चित्रलेखा ने सुनाई राजा विक्रमादित्य की कहानी।

Story of the first pupil Ratnamanjari

A King ruled in Ambawati. He was a great donor. In the same state Dharmasena became another big king. He had four queens. One was Brahmin, the second Kshatriya, the third Vaishya and the fourth Shudra.

There was a son from Brahmini, whose name was named Brahmini. There were three sons from the sari. One was named as Shankha, the second was named Vikramaditya and the third was Bhartruhari. Vaishya has a boy, named Chandra.

Shudhani When the boys grew, the Brahmin's son got out of the house and Dharapur came. Hey Rajan! The king of that city was your father. The boy killed the king and took the state into his own hands and reached Ujjain. It is a coincidence that after coming to Ujjain, he died. At the time of his death, son of the sertran sat on the throne. After some time sit on the Vikramaditya throne.

One day, King Vikramaditya came to know about King Bahubal, the throne on which he is seated is by the grace of King Bahabubal. Pundits advised that O Rajan! You know the world, but until the King Bahubal does not rule over you, your state will not be immovable.
You get them royal
Vikramaditya said, 'Good.' And he went there with his knowledgeable and trusted companion Lutavaran.
Bahubal welcomed him with great respect. Five days passed. Lootavarana advised Vikramaditya, "When you depart, Raja Bahubal will ask you to ask something.

There is a throne in Raja's house, which Saketh Mahadeva gave to King Indra. And later Indra gave it to Bahubal. In this throne is the quality that will sit on it. The Seven Islands will rule over the earth. There are many jewels in it. It has been mounted in a mold and has been installed in thirty-seven. Hey Rajan! You ask for the same throne. '

The next day when Vikramaditya went for a farewell, he demanded the same throne. King Bahubal was tied to the word. Bahubal devoted Vikramaditya to him and made a great dedication and departed with great love.
King Vikramaditya returned when he returned and called the pundits and said, 'I want to do a ritual. You tell me whether I am fit or not. '

The scholars said, 'Your glory lies in the three worlds. None of your haters Do what you want to do. '

Call all the people of your family, donate 1.2 million daughters and donate three lakh cows, give money to Brahmins, forgive one year's landlord.

By saying so, the effigy Ratnamanjari said, 'O Rajan! If you have ever donated such a donation, then you must sit on the throne. '

King Bhoj was disappointed by hearing the pupil- "Today is the day. Now prepare, tomorrow will sit on the throne. '

In this way, the first pupil of the throne, Batti did not allow Raja Bhoj to sit and the next day the second pupil Chitralekha narrated the story of King Vikramaditya.

16 June, 2020

राष्ट्रीय एकता पर निबंध | Essay on National Unity in Hindi

राष्ट्रीय एकता पर निबंध | Essay on National Unity in Hindi

Essay on National Unity in Hindi

इस निबंध के अन्य शीर्षक-

  • राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीयता 
  • आज की अनिवार्य आवश्यकता : राष्ट्रीय एकता 
  • राष्ट्रीय एकीकरण और उसके मार्ग की बाधाएं 
  • देश की एकता और अखंडता 
  • राष्ट्रीय एकता के पोषक तत्व

रूपरेखा-


प्रस्तावना

भारत एक विशाल देश हैं। उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक पूर्व में नागालैंड से लेकर पश्चिम में गुजरात तक भारत माता का विशाल भव्य रुप सर्वदर्शनीय एवं पूजनीय हैं। भारत में अनेक प्रदेश हैं। यहां के निवासियों में अत्यधिक विविधता तथा अनेकरुपता है तथापि इस भिन्नता एवं अनेकरूपता में भी ऐसी एकता विद्यमान है। जो हम सब को एक दूसरे से मिलाये हुए हैं एक ऐसा महत्वपूर्ण सूत्र है जो विविध मढ़ियों को जोड़कर एक सुंदर बहुरंगी माला का रूप दे देता है। यह सूत्र ही हमारी भावात्मक एकता है। यह भावात्मक एकता ही संपूर्ण राष्ट्र में एक राष्ट्रीयता को जन्म देती है।

राष्ट्रीयता

राष्ट्रीयता की भावना ही वह ज्वलंत भावना है जो किसी देश के नागरिकों में देश प्रेम और आत्म-गौरव की भावना पैदा करती है। इस पुनीत भावना के जागृत होने पर ही किसी राष्ट्र के नागरिक राष्ट्र के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान कर देते हैं। यह वह भावना है जो संपूर्ण देश के नागरिकों में एकता की इस भावना को जन्म देती है। कि राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक मेरा भाई है। उसकी सहायता वा सहयोग करना मेरा परम कर्तव्य है। राष्ट्रीयता की भावना ही नागरिकों के ह्रदय में मातृभूमि का श्रद्धामय मातृरूप अंकित करती है। राष्ट्र की धरती हमारी माता है उसका अन्न जल खाकर हम पुष्ट होते हैं, और उसकी वायु में श्वास लेकर ही हम प्राणवान होते हैं। उस मातृभूमि का कण-कण हमें प्राणों से प्यारा है। उसके कण-कण की रक्षा करना हमारा परम धर्म है। मातृभूमि के इस समग्र और अखंड रूप की रक्षा करने की भावना का मूल स्रोत राष्ट्रीयता की भावना ही है। राष्ट्रीयता की इस पवित्र भावना के अभाव में किसी देश का उत्थान और समृद्धि तो दूर की बात है, उस का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है।

भावात्मक एकता

हमारी राष्ट्रीयता का मूल आधार हमारी भावात्मक एकता है। हमारे इस विशाल देश में भाषा, वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान संबंधी आदि अनेक विषमताएं हैं। धर्म और जातियों में अनेकता है तथापि हम सब एक हैं। इस एकता और अखंडता का आधार भावात्मक और सांस्कृतिक एकता है। हमारी संस्कृति अविभाज्य है। विभिन्न धर्मों के होते हुए भी हमारी भावना एक है। बाहरी जीवन वेशभूषा आदि में भेद होते हुए भी हमारा जीवन दर्शन एक है। हम मानव मात्र में एकता के दर्शन करते हैं, यही हमारा जीवन दर्शन है। भारतीय संस्कृति में पलने वाला हर नागरिक दिन में पूजा के समय कामना करता है।
"सर्वे भवंतु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मां कश्चित् दुख:भाग भवेत्।।"
प्राणी मात्र को सुखी बनाना ही भारतीयों का मुख्य उद्देश्य है। हमारा यह उद्देश्य ही राष्ट्रीयता से ऊपर उठाकर हमें अंतर्राष्ट्रीयता की ओर ले जाता है।

राष्ट्रीयता की आवश्यकता

राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा सार्वभौम सत्ता बनाए रखने के लिए राष्ट्रीयता की भावना का उदय होना परम आवश्यक है। यही वह भावना है जिसके कारण राष्ट्र के नागरिक अपने राष्ट्र के सम्मान, गौरव और हितों का चिंतन करते हैं। हमारे देश में विगत वर्ष से राष्ट्रीयता की भावना कुछ मंद पड़ने लगी है। अनेक दल उठ खड़े हुए हैं, और लोगों का नैतिक पतन हुआ है। सब स्वार्थ के वशीभूत होकर राष्ट्र के हित को भूलकर अपनी-अपनी सोचने लगे हैं। "अपना भर और किसी की फिक्र मत कर" की भावना पनपने लगी है। प्रादेशिकता, जातीयता तथा भाई-भतीजावाद इतना बढ़ गया है। कि देश का भविष्य अंधकार में दिखाई पढ़ने लगा है। संकट के इस समय में हमें विवेक से काम लेना चाहिए। हमारे नेताओं और सरकार को चाहिए कि वह स्वार्थ का त्याग कर , कुर्सी का मोह छोड़ें। अपने राजनीतिक लाभ के लिए देश को संकट में ना डालें। सरकार और मंत्रियों को चाहिए कि वह स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्र के कल्याण की बात सोचें। यदि ऐसा ना हुआ तो देश कहां जाएगा, कहना कठिन है।

राष्ट्रीयता के अभाव के कारण

किसी राष्ट्र में राष्ट्रीयता का अभाव तभी होता है, जब वहां के निवासियों के ह्रदय से भावात्मक एकता नष्ट हो जाती है। संकीर्ण भावनाएं पारस्परिक भेद की दीवारें खड़ी कर देती हैं, और विभिन्न वर्गों के लोग अपने स्वार्थों में फस जाते हैं। सभी लोग अपना भला चाहने लगते हैं और दूसरों का अहित करने लगते हैं। हमारे देश में यह वर्गवाद कई रूपों में पनप रहा है।

(क) प्रांतीयता- कभी-कभी प्रांतीयता की संकीर्ण भावना इतनी प्रबल हो जाती है। कि वह राष्ट्रीयता को दबा देती है। लोग यह भूल जाते हैं कि राष्ट्र रूपी देवता के शरीर का यदि एक अंग हष्ट-पुष्ट हो जाए और अन्य अंग दुर्बल हो जाएं तो दुर्बल अंगो की दुर्बलता का प्रभाव हष्ट-पुष्ट अंग पर भी पड़ेगा।

(ख) भाषा विवाद- भाषा संबंधी विवादों ने राष्ट्रीयता को बहुत आघात पहुंचाया है। इससे भाषावर प्रांतों की मांग उठती है। कुछ ही वर्ष पहले दक्षिण भारत में हिंदी के विरोध में ऐसे भयानक उपद्रव हुए, जिससे उत्तर भारत के लोगों की भावनाओं को बहुत ठेस पहुंची।

(ग) संकीर्ण मनोवृत्ति- जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर जब लोगों की विचारधारा संकीर्ण हो जाती है। तब राष्ट्रीयता की भावना मंद पड़ जाती है। लोगों के सामने एक महान राष्ट्र का हित ना रहकर एक सीमित वर्ग का संकुचित हित चिंतन मात्र ही रह जाता है।

वर्तमान स्थिति

उपर्युक्त कारणों से हमारे देश में राष्ट्रीयता की भावात्मक एकता का बहुत ह्रास हुआ है। स्वतंत्रता की प्राप्ति के पश्चात तो कुछ ऐसी हवा चली है की राष्ट्र की एकता को काफी धक्का लगा। उसी का परिणाम है कि आज 'हिंदुस्तान हमारा है' के स्थान पर 'पंजाब हमारा है', 'मद्रास हमारा है' के नारे लगने लगे हैं। धर्म, भाषा, जाति तथा वर्ग विशेष के नाम पर देश टुकड़ों में बँटने लगा है। यह टुकड़े आपस में ऐसे टकराने लगे हैं, कि एक दूसरे को चूर चूर करने को तैयार हो रहे हैं। राष्ट्र पतन के कगार तक पहुंच गया लगता है। लोग गांधी, नेहरु और पटेल जैसे नेताओं द्वारा दिखाए गए आदर्शों को भूल कर स्वार्थ में अंधे हो रहे हैं।

उपसंहार

आवश्यकता इस बात की है कि हम राष्ट्रीयता को समझें। हमें केवल अपना नहीं राष्ट्र का हित सोचना होगा। राष्ट्र के हित में ही हमारा हित है, राष्ट्र की सुरक्षा में ही हमारी सुरक्षा है और राष्ट्र के उत्थान एवं विकास में ही हमारा उत्थान और विकास है। राष्ट्र का विकास चाहने वाले सभी नागरिकों का कर्तव्य है कि वे संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर केवल अपने परिवार या जाति की संकीर्ण भावना को छोड़कर, आपसी फूट, कलह और झगड़ों में अपनी शक्ति का अपव्यय न कर। राष्ट्र कल्याण के चिंतन में लगे और अपने पास पड़ोस के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को जगाने का प्रयास करें।

साहित्य और समाज पर निबंध | Essay on Literature and Society in Hindi

साहित्य और समाज पर निबंध |  Essay on Literature and Society in Hindi

Essay on Literature and Society in Hindi

इस निबंध के अन्य शीर्षक-

  • साहित्य और समाज
  • साहित्य समाज का दर्पण है
  • साहित्य और मानव-जीवन
  • साहित्य और जीवन

रूपरेखा-

साहित्य क्या है? 

'साहित्य' शब्द 'सहित' से बना है। 'सहित' का भाव ही साहित्य कहलाता है। (सहितस्य भावः साहित्यः)। 'सहित' के दो अर्थ हैं- साथ एवं हितकारी (स+हित= हितसहित) या कल्याणकारी। यहां 'साथ' से आशय है- शब्द और अर्थ का साथ अर्थात सार्थक शब्दों का प्रयोग। सार्थक शब्द का प्रयोग तो ज्ञान विज्ञान की सभी शाखाएं करती हैं। तब फिर साहित्य कि अपनी क्या विशेषता है? वस्तुतः साहित्य का ज्ञान विज्ञान की समस्त शाखाओं से स्पष्ट अंतर है,

(1) ज्ञान विज्ञान की शाखाएं बुद्धिप्रधान या तर्क प्रधान होती हैं। जबकि साहित्य हृदयप्रधान

(2) ये शाखाएं तथ्यात्मक हैं जबकि साहित्य कल्पनात्मक।

(3) ज्ञान विज्ञान की शाखाओं का मुख्य लक्ष्य मानव की भौतिक सुख समृद्धि एवं सुविधाओं का विधान करना है, पर साहित्य का लक्ष्य तो मानव की अंतःकरण का परिष्कार करते हुए, उसमें सदवृत्तियों का संचार करना है। आनंद प्रदान कराना यदि साहित्य की सफलता है। तो मानव मन का उन्नयन उसकी सार्थकता।

(4) ज्ञान विज्ञान की शाखाओं में कथ्य (विचार तत्व) ही प्रधान होता है, कथन शैली गौण। वस्तुतः भाषा शैली वहां विचाराभिव्यक्ति की साधनमात्र है। दूसरी ओर साहित्य में कथ्य से अधिक शैली का महत्त्व है।
उदाहरणार्थ-
जल उठा स्नेह दीपक-सा
नवनीत हृदय था मेरा,
अब शेष धूमरेखा से
चित्रित कर रहा अँधेरा।

कवि का कहना केवल यह है कि प्रिय के संयोग काल में जो हृदय हर्षोल्लास से भरा रहता था, वही अब उसके वियोग में गहरे विषाद में डूब गया है। यह एक साधारण व्यापार है, जिस का अनुभव प्रत्येक प्रेमी हृदय करता है। किंतु कवि ने दीपक के रुपक द्वारा इसी साधारण सी बात को अत्यधिक चमत्कारपूर्ण ढंग से कहा है, जो पाठक के हृदय को कहीं गहरा छू लेता है।

स्पष्ट है कि साहित्य में भाव और भाषा, कथ्य और कथन शैली (अभिव्यक्ति) दोनों का समान महत्त्व है। यह अकेली विशेषता ही साहित्य को ज्ञान विज्ञान की शेष शाखाओं से अलग करने के लिए पर्याप्त है।

साहित्य की कतिपय परिभाषाएं

प्रेमचन्द जी साहित्य की परिभाषा इन शब्दों में देते हैं, "सत्य से आत्मा का संबंध तीन प्रकार का है- एक जिज्ञासा का, दूसरा प्रयोजन का और तीसरा आनंद का। जिज्ञासा का संबंध दर्शन का विषय है, प्रयोजन का संबंध विज्ञान का विषय है और आनंद का संबंध केवल सहित्य का विषय है। सत्य जहां आनंद का विषय बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है।" इस बात को विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर इन शब्दों में कहते हैं, "जिस अभिव्यक्ति का मुख्य लक्ष्य प्रयोजन के रुप को व्यक्त करना नहीं, अपितु विशुद्ध आनंद रुप को व्यक्त करना है, उसी को मैं साहित्य कहता हूं।"

प्रसिद्ध अंग्रेज समालोचक द क्विंसी (De Quincey) के अनुसार साहित्य का दृष्टिकोण उपयोगितावादी ना होकर मानवतावादी है। "ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं का लक्ष्य मानव का ज्ञानवर्धन करना है। उसे शिक्षा देना है। इसके विपरीत साहित्य मानव का अंतः विकास करता है, उसे जीवन जीने की कला सिखाता है, चित्तप्रसादन द्वारा उसने नूतन प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संचार करता है।"

समाज क्या है?

ऐसा मानव समुदाय, जो किसी निश्चित भूभाग पर रहता हो, समान परंपराओं, इतिहास, धर्म एवं संस्कृति से आपस में जुड़ा हो। तथा एक भाषा बोलता हो, समाज कहलाता है।

साहित्य और समाज का पारस्परिक संबंध : साहित्य समाज का दर्पण

समाज और साहित्य परस्पर घनिष्ठ रुप से आबद्ध हैं। साहित्य का जन्म वस्तुतः समाज से ही होता है। साहित्यकार किसी समाज विशेष का ही घटक होता है। वह अपने समाज की परंपराओं, इतिहास, धर्म, संस्कृति आदि से ही अनुप्राणित होकर साहित्य रचना करता है। और अपनी कृति में इनका चित्रण करता है। इस प्रकार साहित्यकार अपनी रचना की सामग्री किसी समाज विशेष से ही चुनता है। तथा अपने समाज की आशाओं-आकांक्षाओं, सुख-दुख, संघर्षों, अभावों और उपलब्धियों को वाणी देता है, तथा उस का प्रामाणिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। उसकी समर्थ वाणी का सहारा पाकर समाज अपने स्वरुप को पहचानता है, और अपने रोग का सही निदान पाकर उसके उपचार को तत्पर होता है। इसी प्रकार किसी साहित्य विशेष को पढ़कर उस काल के समाज का समग्र चित्र मानसपटल पर अंकित हो सकता है। इसी अर्थ में साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है।

साहित्य की रचना प्रक्रिया

समर्थ साहित्यकार अपनी अतलस्पर्शिनी प्रतिभा द्वारा सबसे पहले अपने समकालीन सामाजिक जीवन का बारीकी से पर्यवेक्षण करता है। उसकी सफलताओं-असफलताओं, उपलब्धियों-अभावों, क्षमताओं-दुर्बलताओं तथा संगतिओं विसंगतियों की गहराई तक थाह लेता है। इसके पश्चात विकृतिओं और समस्याओं के कारणों का निदान कर अपनी रचना के लिए उपयुक्त सामग्री का चयन करता है। और फिर इस समस्त बिखरी हुई, परस्पर असम्बद्ध एवं अति साधारण सी दीख पड़ने वाली सामग्री को सुसंयोजित कर उसे अपनी 'नवनवोन्मेषशालिनी' कल्पना के सांचे में डालकर ऐसा कलात्मक रूप एवं सौष्ठव प्रदान करता है कि सहृदय अध्येता रस विभोर हो नूतन प्रेरणा से अनुप्राणित हो उठता है।

कलाकार का वैशिष्ट्य इसी में है कि उस की रचना की अनुभूति एकाकी होते ही भी सार्वदेशिक सर्वकालिक बन जाए तथा अपने युग की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए चिंरनतन मानव मूल्यों से मंडित भी हो। उसकी रचना ना केवल अपने युग, अपितु आने वाले युगों के लिए भी नवस्फूर्ति का अजस्त्र स्रोत बन जाए और अपने देश काल की उपेक्षा न करते हुए देश कालातीत होकर मानाव मात्र की अक्षय निधि बन जाए। यही कारण है कि महान साहित्यकार किसी विशेष देश, जाति, धर्म एवं भाषा शैली के समुदाय में जन्म लेकर भी सारे विश्व का अपना बन जाता है। उदाहरणार्थ- बाल्मीक, व्यास, कालिदास तुलसीदास, होमर, शेक्सपियर आदि किसी देश विशेष के नहीं मानवमात्र के अपने हैं, जो युगों से मानव को नवचेतना प्रदान करते आ रहे हैं और करते रहेंगे।

साहित्य का समाज पर प्रभाव

साहित्यकार ने समकालीन समाज से ही अपनी रचना के लिए आवश्यक सामग्री का चयन करता है। अतः समाज पर साहित्य का प्रभाव भी स्वाभाविक है।

जैसा कि ऊपर संकेतत किया गया है, कि महान साहित्यकार में एक ऐसी नैसर्गिक या ईश्वरदत्त प्रतिभा होती है, एक ऐसी अतलष्पार्शिनी अंतरदृष्टि होती है कि वह विभिन्न दृश्यों, घटनाओं, व्यापारों, समस्याओं के मूल तक तत्क्षण पहुंच जाता है। जबकि राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री उसका कारण बाहर टटोलते रह जाते हैं। इतना ही नहीं साहित्यकार रोग का जो निदान और उपचार सुझाता है, वही वास्तविक समाधान होता है। इसी कारण प्रेमचंद जी ने कहा है कि "साहित्य राजनीति के आगे मसाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है, राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं।" अंग्रेज कवि शैली ने कवियों को "विश्व के अघोषित विधायक" (Unacknowledged legislators of the world.) कहा है।

प्राचीन ऋषियों ने कवि को विधाता और दृष्ट कहा है- कविर्मनिषी धाता स्वयम्भू:। साहित्यकार कितना बड़ा दृष्टा होता है, इसका एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा आज से लगभग 70 75 वर्ष पूर्व श्री देवकीनंदन खत्री ने अपने तिलिस्मी उपन्यास 'रोहतासमठ' में यंत्रमानव( Robots) के कार्यों का विस्मयकारी चित्रण किया था। उस समय यह सर्वथा कपोलकल्पित लगा क्योंकि उस काल में यंत्र मानव की बात किसी ने सोंची तक ना थी, किंतु आज विज्ञान ने उस दिशा में बहुत प्रगत कर ली है या देख श्री खत्री की नावनवोन्मेष-शालिनी प्रतिभा के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ता है। इसी प्रकार आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व पुष्पक विमान के विषय में पढ़ना कल्पनामात्र लगता होगा, परंतु आज उससे कहीं अधिक प्रगति वैमानिकी ने की है।

साहित्य द्वारा सामाजिक ओर राजनीतिक क्रांतियों के उल्लेख से तो विश्व का इतिहास भरा पड़ा है। संपूर्ण यूरोप को गंभीर रुप से आलोड़ित कर डालने वाली फ्रांस की राज्य क्रांति (1789 ई०), रूसो की 'ला कोत्रा सोसियल' (La Contract Social - सामाजिक अनुबंध) नामक पुस्तक के प्रकाशन का ही परिणाम थी। आधुनिक काल में चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों ने इग्लैंड से कितनी ही घातक सामाजिक एवं शैक्षिक रूढ़ियों के उन्मूलन कराकर नूतन स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था का सूत्रपात कराया।

आधुनिक युग में प्रेमचंद के उपन्यासों में कृषकों पर जमीदारों के बराबर अत्याचारों एवं महाजनों द्वारा उनके क्रूर शोषण के चित्रों ने समाज को जमींदारी उन्मूलन एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की स्थापना को प्रेरित किया। उधर बंगाल में शरतचंद्र ने अपने उपन्यासों में कन्याओं के बाल विवाह की अमानवीयता एवं विधवा विवाह निषेध की नृशंसता को ऐसी सशक्तता से उजागर किया कि अंततः बाल विवाह को कानून द्वारा निषिद्ध घोषित किया गया एवं विधवा विवाह का प्रचलन हुआ।

उपसंहार

निष्कर्ष यह है कि समाज और साहित्य का परस्पर अन्योनाश्रित संबंध है। साहित्य समाज से ही उदभूत होता है। क्योंकि साहित्यकार किसी समाज विशेष का ही अंग होता है। वह इसी से प्रेरणा ग्रहणकर साहित्य रचना करता है, एवं अपने युग की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता हुआ समकालीन समाज का मार्गदर्शन करता है, किंतु साहित्यकार की महत्ता इसमें हैं, कि वह अपने युग की उपज होने पर भी उसी से बंधकर नहीं रह जाए अपितु अपनी रचनाओं से चिरन्तन मानवीय आदर्शों एवं मूल्यों की स्थापना द्वारा देशकालातीत बनकर संपूर्ण मानवता को नई ऊर्जा एवं प्रेरणा से स्पंदित करें।

इसी कारण साहित्य को विश्व मानव की सर्वोत्तम उपलब्धि माना गया है। जिसकी समकक्षता संसार की मूल्यवान से मूल्यवान वस्तु भी नहीं कर सकती। क्योंकि संसार का सारा ज्ञान-विज्ञान मानवता के शरीर का ही पोषण करता है। जबकि एक मात्र साहित्य ही उसकी आत्मा का पोषक है। कहा गया है कि "यदि कभी संपूर्ण अंग्रेज जाति नष्ट भी हो जाए किंतु केवल शेक्सपियर बचा रहे तो अंग्रेज नष्ट नहीं हुई मानी जाएगी।" ऐसे युगष्टा और युगद्रष्टा कलाकारों के सम्मुख संपूर्ण मानवता कृतज्ञतापूर्वक नतमस्तक होकर उन्हें अपने ह्रदय सिंहासन पर प्रतिष्ठित करती है, एवं उनके यश को दिग्दिगन्तव्यापी बना देती है। अपने पार्थिव शरीर से तिरोहित हो जाने पर भी वे अपने यश रूपी शरीर से इस धराधाम पर सदा अजर अमर बने रहे हैं।
जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्ध कविश्वरः।
नास्ति येषां यशः काये जरामरणजं भयं।।

Featured

[Featured][recentbylabel2]
Notification
Hindi Files is Under Maintenance, Please Check later for full version.
Done