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26 June, 2020

चौथी पुतली कामकंदला की कहानी- विक्रमादित्य की दानवीरता

चौथी पुतली कामकंदला की कहानी

चौथे दिन जैसे ही राजा सिंहासन पर चढ़ने को उद्यत हुए पुतली कामकंदला बोल पड़ी, रूकिए राजन, आप इस सिंहासन पर कैसे बैठ सकते हैं? यह सिंहासन दानवीर राजा विक्रमादित्य का है। क्या आप में है उनकी तरह विशेष गुण और त्याग की भावना?

राजा ने कहा- हे सुंदरी, तुम भी विक्रमादित्य की ऐसी कथा सुनाओ जिससे उनकी विलक्षणता का पता चले।

पुतली बोली, सुनो राजन, एक दिन राजा विक्रमादित्य दरबार को संबोधित कर रहे थे, तभी किसी ने सूचना दी कि एक ब्राह्मण उनसे मिलना चाहता है। विक्रमादित्य ने कहा कि ब्राह्मण को अंदर लाया जाए। विक्रमादित्य ने उसके आने का प्रयोजन पूछा।

ब्राह्मण ने कहा कि वह किसी दान की इच्छा से नहीं आया है, बल्कि उन्हें कुछ बताने आया है। उसने बताया कि मानसरोवर में सूर्योदय होते ही एक खंभा प्रकट होता है जो सूर्य का प्रकाश ज्यों-ज्यों फैलता है ऊपर उठता चला जाता है और जब सूर्य की गर्मी अपनी पराकाष्ठा पर होती है तो वह साक्षात सूर्य को स्पर्श करता है। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी घटती है, छोटा होता जाता है तथा सूर्यास्त होते ही जल में विलीन हो जाता है।

विक्रमादित्य के मन में जिज्ञासा हुई कि आखिर वह कौन है। ब्राह्मण ने बताया कि वह भगवान इन्द्र का दूत बनकर आया है। देवराज इन्द्र का आपके प्रति जो विश्वास है आपको उसकी रक्षा करनी होगी।

आगे उसने कहा कि सूर्य देवता को घमंड है कि समुद्र देवता को छोड़कर पूरे ब्रह्मांड में कोई भी उनकी गर्मी को सहन नहीं कर सकता। देवराज इन्द्र उनकी इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि उनकी अनुकम्पा प्राप्त मृत्युलोक का एक राजा सूर्य की गर्मी की परवाह न करके उनके निकट जा सकता है। वह राजा आप हैं।

राजा विक्रमादित्य को अब सारी बात समझ में आ गई। उन्होंने सोच लिया कि प्राणोत्सर्ग करके भी सूर्य भगवान को समीप से जाकर नमस्कार करेंगे तथा देवराज के उनके प्रति विश्वास की रक्षा करेंगे।

उन्होंने ब्राह्मण को समुचित दान-दक्षिणा देकर विदा किया तथा अपनी योजना को कार्य-रूप देने का उपाय सोचने लगे। भोर होने पर दूसरे दिन वे अपना राज्य छोड़कर चल पड़े। एकांत में उन्होंने मां काली द्वारा प्रदत्त दोनों बेतालों का स्मरण किया। दोनों बेताल तत्क्षण उपस्थित हो गए।

विक्रम को दोनों बेताल ने बताया कि उन्हें उस खंभे के बारे में सब कुछ पता है। दोनों बेताल उन्हें मानसरोवर के तट पर लाए। रात उन्होंने हरियाली से भरी जगह पर काटी और भोर होते ही उस जगह पर नजर टिका दी, जहां से खंभा प्रकट होता। सूर्य की किरणों ने जैसे ही मानसरोवर के जल को छुआ, एक खंभा प्रकट हुआ।

विक्रमादित्य तुरंत तैरकर उस खंभे तक पहुंचे। खंभे पर जैसे विक्रमादित्य चढ़े जल में हलचल हुई और लहरें उठकर विक्रम के पैर छूने लगीं। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी बढी़, खंभा बढ़ता रहा। दोपहर आते-आते खंभा सूर्य के बिल्कुल करीब आ गया। तब तक विक्रम का शरीर जलकर बिलकुल राख हो गया था। सूर्य भगवान ने जब खंभे पर एक मानव को जला हुआ पाया, तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि विक्रम को छोड़कर कोई दूसरा नहीं होगा। उन्होंने भगवान इन्द्र के दावे को बिल्कुल सच पाया।

उन्होंने अमृत की बूंदों से विक्रम को जीवित किया तथा अपने स्वर्णकुंडल उतारकर भेंट कर दिए। उन कुंडलों की यह विशेषता थी कि कोई भी इच्छित वस्तु वे कभी भी प्रदान कर देते। सूर्य देव ने अपना रथ अस्ताचल की दिशा में बढ़ाया तो खंभा घटने लगा।

सूर्यास्त होते ही खंभा पूरी तरह घट गया और विक्रम जल पर तैरने लगे। तैरकर सरोवर के किनारे आए और दोनों बेतालों का स्मरण किया। बेताल उन्हें फिर उसी जगह लाए जहां से उन्हें सरोवर ले गए थे।

विक्रम पैदल अपने महल की दिशा में चल पड़े। कुछ ही दूर पर एक ब्राह्मण मिला जिसने बातों-बातों में कुण्डल मांग लिए। विक्रम ने बिना एक पलकी देरी किए बेहिचक उसे दोनों कुंडल दे दिए।

पुतली बोली- बोलो राजन, क्या तुम में है वह पराक्रम कि सूर्य के नजदीक जाने की हिम्मत कर सको? और अगर चले जाओ तो देवों के देव सूर्यदेव के स्वर्णकुंडल किसी साधारण ब्राह्मण को दे सको? अगर हां तो इस सिंहासन पर तुम्हारा स्वागत है।

राजा पेशोपेश में पड़ गया और इस तरह चौथा दिन भी चला गया। पांचवे दिन पांचवी पुतली लीलावती ने सुनाई विक्रमादित्य के शौर्य की गाथा।

Story of the fourth pupil Kamakandala

On the fourth day, as soon as the king began to climb the throne, the idol of Kamal said, how can you sit on this throne? This throne is of the King Dan Veer Vikramaditya. Do you have special qualities and feelings of sacrifice like them?

The king said, "O beautiful baby, tell me the story of Vikramaditya that you know about his greatness.

Putuli quote, listen to Rajan, one day Raja Vikramaditya was addressing the court, only when somebody informed that a Brahmin wanted to meet him. Vikramaditya said that Brahmin should be brought in. Vikramaditya asked the purpose of his coming.

Brahmin said that he has not come from the will of any donation, but has come to tell him something. He explained that a pillar appears in Sunrise in Mansarovar, which goes up till sunlight spreads, and when the sun's heat is on its peak, it touches the sun in its light. As the heat of the sun decreases, it becomes smaller and dissolves in water as soon as it is sunset.
Vikramaditya was curious about who he is. Brahman said that he has come as an angel of Lord Indra. You will have to defend Devraj Indra which is your faith.

He further said that Sun God is proud that no one can bear his heat except in the whole universe except the sea god. Devraj Indra does not agree with this. He believes that a king of the deceased, who is blessed with his sympathy, can not approach the heat of the sun and go near them. That's the king you are
King Vikramaditya understood everything now. He thought that even by giving life, he would go to the Sun God and greet him and protect the faith of the Devraj.
He gave a proper donation to the Brahmin and gave a dakshina and began to think of ways to give up his plan. On the second day after dawn, he left his state and left. In solitude, he remembered both of the two supplications provided by Kali. Both of them were present at the helm.

Both supplications told Vikram that they know everything about that pillar. Both of them brought them to the banks of Mansarovar. At night, he cut down on the greenery and filled the place, and looked at the place where the pillar appears. As soon as the sun rays touched Mansarovar's water, a pillar appeared.

Vikramaditya swam right to the pillar. On the pillar like Vikramaditya, there was a stir in the water and the waves got up and touched the feet of Vikram. As the sun's heat grew, the pillar continued to grow. In the afternoon, the pillar came closer to the sun. Till then, Vikram's body was completely burnt to ashes. When the Sun God found a human being burned on the pillar, it did not take long to understand that there would be no second except Vikram. They found the claim of Lord Indra to be absolutely true.

He raised Vikram from the elves of the nectar and lifted his golden cylinders and presented them. This feature of those horoscopes was that they would never give any desired object. When the Sun God extended his chariot in the direction of the odd, the pillar started decreasing.
At sunset, the pillar fell completely and Vikram started swimming on water. Swim came to the banks of the lake and recalled the two guests. The furrows brought them back to where they took the lake.

Vikram walked on foot towards his castle. A Brahmin found a few moments that demanded the horoscope in talk. Without delay, Vikram gave them both coils without hesitation.

Pupil quote: Bolo Rajan, are you in the power to dare to go near the sun? And if you go away, can you give Gods God's golden kundalaya to an ordinary Brahmin? If so, you are welcome to this throne.

Raja fell in love and thus went on the fourth day. On the fifth day, the fifth pupil Lailavati narrated the bravery of Vikramaditya.

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