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26 June, 2020

तीसरी पुतली चंद्रकला की कहानी- भाग्य और पुरुषार्थ की कथा

तीसरी पुतली चंद्रकला की कहानी

तीसरे दिन जब वह सिंहासन पर बैठने को हुआ तो चंद्रकला नाम की तीसरी पुतली ने उसे रोककर कहा, 'हे राजन्! यह क्या करते हो? पहले विक्रमादित्य जैसे काम करों, तब सिंहासन पर बैठना!'
राजा ने पूछा, 'विक्रमादित्य ने कैसे काम किए थे?'
पुतली बोली, 'लो, सुनो।' तीसरी पुतली चन्द्रकला ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है -

एक बार पुरुषार्थ और भाग्य में इस बात पर ठन गई कि कौन बड़ा है? पुरुषार्थ कहता कि बगैर मेहनत के कुछ भी संभव नहीं है जबकि भाग्य का मानना था कि जिसको जो भी मिलता है भाग्य से मिलता है। परिश्रम की कोई भूमिका नहीं होती है। उनके विवाद ने ऐसा उग्र रूप ग्रहण कर लिया कि दोनों को देवराज इन्द्र के पास जाना पड़ा।

झगड़ा बहुत ही पेचीदा था इसलिए इन्द्र भी चकरा गए। पुरुषार्थ को वे नहीं मानते जिन्हें भाग्य से ही सब कुछ प्राप्त हो चुका था। दूसरी तरफ अगर भाग्य को बड़ा बताते तो पुरुषार्थ उनका उदाहरण प्रस्तुत करता जिन्होंने मेहनत से सब कुछ अर्जित किया था।

इन्द्र असमंजस में पड़ गए और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे। काफी सोचने के बाद उन्हें विक्रमादित्य की याद आई। उन्हें लगा सारे विश्व में इस झगड़े का समाधान सिर्फ वही कर सकते हैं।

उन्होंने पुरुषार्थ और भाग्य को विक्रमादित्य के पास जाने के लिए कहा। पुरुषार्थ और भाग्य मानव वेष में विक्रमादित्य के पास चल पड़े। विक्रमादित्य को भी झगड़े का तुरंत कोई समाधान नहीं सूझा। उन्होंने दोनों से छ: महीने बाद आने को कहा।

जब वे चले गए तो विक्रमादित्य ने काफी सोचा। समाधान के लिए वे सामान्य जनता के बीच वेष बदलकर घूमने लगे। काफी घूमने के बाद भी जब कोई संतोषजनक हल नहीं खोज पाए तो दूसरे राज्यों में भी घूमने का निर्णय किया।
काफी भटकने के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला तो उन्होंने एक व्यापारी के यहां नौकरी कर ली। व्यापारी ने उन्हें नौकरी उनके यह कहने पर दी कि जो काम दूसरे नहीं कर सकते हैं वे कर देंगे।

कुछ दिनों बाद वह व्यापारी जहाज पर अपना माल लादकर दूसरे देशों में व्यापार करने के लिए समुद्री रास्ते से चल पड़ा। अन्य नौकरों के अलावा उसके साथ विक्रमादित्य भी थे। जहाज कुछ ही दूर गया होगा कि भयानक तूफान आ गया। जहाज पर सवार लोगों में भय और हताशा की लहर दौड़ गई। किसी तरह जहाज एक टापू के पास आया और वहां लंगर डाल दिया गया। जब तूफान समाप्त हुआ तो लंगर उठाया जाने लगा। मगर लंगर किसी के उठाए न उठा।

अब व्यापारी को याद आया कि विक्रमादित्य ने यह कहकर नौकरी ली थी कि जो कोई न कर सकेगा वे कर देंगे। उसने विक्रम से लंगर उठाने को कहा। लंगर उनसे आसानी से उठ गया। लंगर उठते ही जहाज तेज गति से बढ़ गया लेकिन टापू पर विक्रमादित्य छूट गए।

उनकी समझ में नहीं आया क्या किया जाए। द्वीप पर घूमने-फिरने चल पड़े। नगर के द्वार पर एक पट्टिका टंगी थी, जिस पर लिखा था कि वहां की राजकुमारी का विवाह पराक्रमी विक्रमादित्य से ही होगा। वे चलते-चलते महल तक पहुंचे।

राजकुमारी उनका परिचय पाकर खुश हुई और दोनों का विवाह हो गया। कुछ समय बाद वे कुछ सेवकों को साथ ले अपने राज्य की ओर चल पड़े। रास्ते में विश्राम के लिए जहां डेरा डाला वहीं एक संन्यासी से उनकी भेंट हुई। संन्यासी ने उन्हें एक माला और एक छड़ी दी।

उस माला की दो विशेषताएं थीं- उसे पहनने वाला अदृश्य होकर सब कुछ देख सकता था तथा गले में माला रहने पर उसका हर कार्य सिद्ध हो जाता। छड़ी से उसका मालिक सोने के पूर्व कोई भी आभूषण मांग सकता था।

संन्यासी को धन्यवाद देकर विक्रमादित्य अपने राज्य लौटे। एक उद्यान में ठहरकर संग आए सेवकों को वापस भेज दिया तथा अपनी पत्नी को संदेश भिजवाया कि शीघ्र ही वे उसे अपने राज्य बुलवा लेंगे।

उद्यान में ही उनकी भेंट एक ब्राह्मण और एक भाट से हुई। वे दोनों काफी समय से उस उद्यान की देखभाल कर रहे थे। उन्हें आशा थी कि उनके राजा कभी उनकी सुध लेंगे तथा उनकी विपन्नता को दूर करेंगे। विक्रमादित्य पसीज गए। उन्होंने संन्यासी वाली माला भाट को तथा छड़ी ब्राह्मण को दे दी। ऐसी अमूल्य चीजें पाकर दोनों धन्य हुए और विक्रम का गुणगान करते हुए चले गए।
विक्रम राज दरबार में पहुंचकर अपने कार्य में संलग्न हो गए। छ: मास की अवधि पूरी हुई, तो पुरुषार्थ तथा भाग्य अपने फैसले के लिए उनके पास आए।
विक्रमादित्य ने फैसला दिया कि कि भाग्य और पुरुषार्थ एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्हें छड़ी और माला का उदाहरण याद आया। जो छड़ी और माला उन्हें भाग्य से संन्यासी से प्राप्त हुई थीं। उन्हें ब्राह्मण और भाट ने पुरुषार्थ से प्राप्त किया। पुरुषार्थ और भाग्य पूरी तरह संतुष्ट होकर वहां से चले गए।

कहानी सुनाकर पुतली बोली- बोलो राजा, क्या आप में है ऐसा न्यायप्रिय फैसला देने की दक्षता और अमूल्य वस्तुएं दान में देने का ह्रदय और सामर्थ्य?
राजा फिर सोच में पड़ गए और तीसरे दिन भी सिंहासन पर नहीं बैठ सके। चौथे दिन चौथी पुतली कामकंदला ने सुनाई विक्रमादित्य की दानवीरता की कथा।

Story of the third pupil Chandrakal

On the third day when he was about to sit on the throne, the third puppet named Chandrakala stopped him and said, 'O Rajan! What is this that you do? Work like Vikramaditya first, then sit on the throne! '
The King asked, 'How did Vikramaditya work?'
Pupil said, 'Take, listen.' The story that Chandrakala, the third cathedral, is as follows -

Once in the man's destiny and fortune it was settled that who is big? Purushartha would say that nothing is possible without effort, whereas fate believed that whatever he gets, he gets fate. There is no role of diligence. Their dispute took such a formidable form that both of them had to go to Devraj Indra.

The quarrel was very intriguing, so Indra was also confused. They do not believe Manashrushtharth, who had received everything from destiny. On the other hand, if the fate was big, then Purushartha presented his example, who had earned everything from hard work.

Indra fell into dilemma and did not reach any conclusion. After much thought he remembered Vikramaditya. They thought that only the solution to this dispute can be done in the whole world.
They asked Purushartha and Bhagya to go to Vikramaditya. Purushartha and destiny go to Vikramaditya in the human way. Vikramaditya also did not get any solutions immediately to dispute. They asked both of them to come six months later.
Vikramaditya thought a lot when they went away To solve this, he started changing the look among the general public. Even after a lot of strings, when no satisfactory solution was found, then in other states, it was decided to move.

After much wandering, even when no solution came out, he got a job here from a businessman. The trader gave him the job when he told them that they can not do the other things.

A few days later, after carrying out his cargo on the merchant ship, he went on a sea route to do business in other countries. Among other servants Vikramaditya was also with him. The ship would have gone a few times that terrible storm came. There was a wave of fear and frustration in the people aboard the ship. Somehow the ship came to an island and anchor was put there. After the storm calmed down, they started removing the free food But the anchor could not be lifted by anyone
Now the trader remembered that Vikramaditya had taken a job saying that anyone who can not do it will do it. He asked Vikram to lift the anchor. The anchor was easily lifted by them As the anchor rose, the ship increased rapidly, but Vikramaditya missed the island.
He didn't understand what to do. Walking around the island There was a plaque hanging on the entrance of the town, which was written that the princess of the princess would be married to mighty Vikramaditya. They reached the palace on foot.

The princess was happy to introduce her and both of them got married. After some time, they took some servants together and headed towards their kingdom. While on the way to the rest of the camp, he was offered a sannyasin. Saints gave them a rosary and a stick.

There were two characteristics of that garland - the person wearing it could be able to see everything and disappear in the neck, and all his work was proven. The owner of the stick could demand any jewelery before sleeping.

Vikramaditya returned to his kingdom, thanking the monk. Staying in a park, sent back the servants who were accompanying him and sent a message to his wife that soon they would call him his state.

In the garden itself, his gift came from a Brahmin and a Bhat. They were both taking care of that garden for a long time. He hoped that his king would take care of him and remove his misery. Vikramaditya got fatigued. He gave the Sanyasari Mala Bhat and the stick Brahmin. After getting such priceless things both were blessed and went on praising Vikram.

Vikram joined the Raj Darbar in his work. When the period of six months was completed, then Purushartha and fate came to him for his decision.

Vikramaditya made the decision that fortune and happiness are complementary to each other. He remembered the example of the stick and the garland. The rod and the garland that they received from Bhagya were from Sanyasi. He received Brahmin and Bhat from Purushartha. Purushartha and destiny completely satisfied and went away from there.
Put the puppet speech by saying the story, say, king, is the ability to give you such a fair decision and the heart and strength to donate priceless things?

The king again got into thinking and did not sit on the throne on the third day. The story of the charisma of Vikramaditya, narrated by Kamakandala, the fourth pupil on the fourth day.

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