पांचवीं पुतली लीलावती की कहानी- दानवीर विक्रमादित्य - HindiFiles.com - The Best Hindi Blog For Stories, Quotes, Status & Motivational Content.
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10 July, 2020

पांचवीं पुतली लीलावती की कहानी- दानवीर विक्रमादित्य

पांचवीं पुतली लीलावती की कहानी

पांचवे दिन राजा भोज सिंहासन पर बैठने की तैयारी कर ही रहे थे कि पांचवीं पुतली लीलावती ने उन्हें रोक दिया। लीलावती बोली, राजन, क्या आप विक्रमादित्य की तरह दानवीर और शूरवीर हैं? अगर हां, तब ही इस सिंहासन पर बैठने के अधिकारी होंगे। मैं आपको कथा सुनाती हूं, परम दानव‍ीर विक्रमादित्य की।

एक दिन विक्रमादित्य दरबार में राजकाज निबटा रहे थे। तभी एक विद्वान ब्राह्मण दरबार में आकर उनसे मिला। उसने कहा कि अगर वे तुला लग्न में अपने लिए कोई महल बनवाएं तो राज्य की जनता खुशहाल हो जाएगी और उनकी भी कीर्ति चारों तरफ फैल जाएगी।

विक्रम को उसकी बात जंच गई और उन्होंने एक बड़े ही भव्य महल का निर्माण करवाया। कारीगरों ने उसे राजा के निर्देश पर सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात और मणि-मोतियों से पूरी तरह सजा दिया।

महल जब बनकर तैयार हुआ तो उसकी भव्यता देखते बनती थी। विक्रम अपने सगे-सम्बन्धियों तथा नौकर-चाकरों के साथ उसे देखने गए। उनके साथ वह विद्वान ब्राह्मण भी था। विक्रम मंत्रमुग्ध हुए साथ ही वह ब्राह्मण मुंह खोले देखता रह गया। बिना सोचे उसके मुंह से निकला-'काश, इस महल का मालिक मैं होता!' राजा विक्रमादित्य ने यह सुनते ही झट वह भव्य महल उसे दान में दे दिया।

ब्राह्मण के तो मानो पांव ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। वह भागता हुआ अपनी पत्नी को यह समाचार सुनाने पहुंचा। इधर ब्राह्मणी उसे खाली हाथ आते देख कुछ बोलती उससे पहले ही उसने उसे हीरे-जवाहरात और मणि-मुक्ताओं से जड़े हुए महल को दान में प्राप्त करने की बात बता दी।

ब्राह्मण की पत्नी की तो खुशी की सीमा न रही। उसे एकबारगी लगा मानो उसका पति पागल हो गया और यों ही अनाप-शनाप बक रहा हों, मगर उसके बार-बार कहने पर वह उसके साथ महल देखने के लिए चलने को तैयार हो गई। महल की शोभा देखकर उसकी आंखे खुली रह गईं।

महल का कोना-कोना देखते-देखते कब शाम हो गई उन्हें पता ही नहीं चला। थके-मांदे वे एक शयन-कक्ष में जाकर निढाल हो गए। अर्द्ध रात्रि में उनकी आंखें किसी आवाज से खुल गई।

सारे महल में महक फैली थी और सारा महल प्रकाशमान था। उन्होंने ध्यान से सुना तो लक्ष्मी बोल रही थी। वह कह रही थी कि उनके भाग्य से वह यहां आई है और उनकी कोई भी इच्छा पूरी करने को तैयार है।

ब्राह्मण दम्पति का डर के मारे बुरा हाल हो गया। ब्राह्मणी तो बेहोश ही हो गई। लक्ष्मी ने तीन बार अपनी बात दुहराई। लेकिन ब्राह्मण ने कुछ नहीं मांगा तो क्रुद्ध होकर चली गई। उसके जाते ही प्रकाश तथा महक- दोनों गायब।
काफी देर बाद ब्राह्मणी को होश आया तो उसने कहा- 'यह महल जरूर भुतहा है, इसलिए दान में मिला। इससे अच्छा तो हमारा टूटा-फूटा घर है जहां चैन की नींद सो सकते हैं।' ब्राह्मण को पत्नी की बात जंच गई।

सहमे-सहमे बाकी रात काटकर तड़के ही उन्होंने अपना सामान समेटा और पुरानी कुटिया को लौट आए। ब्राह्मण अपने घर से सीधा राजभवन आया और विक्रमादित्य से अनुरोध करने लगा कि वे अपना महल वापस ले लें। पर दान दी गई वस्तु को वे कैसे ग्रहण कर लेते।

काफी सोचने के बाद उन्होंने महल का उचित मूल्य लगाकर उसे खरीद लिया। ब्राह्मण खुशी-खुशी अपने घर लौट गया।

ब्राह्मण से महल खरीदने के बाद राजा विक्रमादित्य उसमें आकर रहने लगे। वहीं अब दरबार भी लगता था। एक दिन वे सोए हुए थे तो लक्ष्मी फिर आई।
जब लक्ष्मी ने उनसे कुछ भी मांगने को कहा तो वे बोले- 'आपकी कृपा से मेरे पास सब कुछ है। फिर भी आप अगर देना ही चाहती हैं तो मेरे पूरे राज्य में धन की वर्षा कर दें और मेरी प्रजा को किसी चीज की कमी न रहने दें।'

सुबह उठकर उन्हें पता चला कि सारे राज्य में धन वर्षा हुई है और लोग वर्षा वाला धन राजा को सौंप देना चाहते हैं। विक्रमादित्य ने आदेश किया कि कोई भी किसी अन्य के हिस्से का धन नहीं समेटेगा और अपने हिस्से का धन अपनी सम्पत्ति मानेगा। जनता जय-जयकार कर उठी।

इतना कहते ही पुतली लीलावती बोली, बोलो राजन, क्या इस कथा के बाद तुम इस सिंहासन के योग्य अपने आपको पाते हो? राजा भोज निराश हो गए और अपने कक्ष में लौट गए। अगले दिन राजा को रोका छठी पुतली रविभामा ने।

Story of the fifth dolly Lilavati

King Bhoj was preparing to sit on the throne on the fifth day that the fifth idol Lilavati stopped him. Lilavati quote, Rajan, are you like Monkeys and Knights like Vikramaditya? If yes, only then will the officer be seated on this throne. I tell you the story of Param Danvir Vikramaditya.

One day Vikramaditya was taking over the affairs of the court, when a scholar came to the court in Brahmin Darbar. He said that if they make a palace for themselves in the wedding ceremony, the people of the state will be happy and their reputation will spread all over.

Vikram got his point and he built a magnificent palace. On the instructions of the king, the craftsmen completely punished them with gold and silver, diamonds and gems and gems.

When the palace was ready, its grandeur was seen. Vikram went to see him with his relatives and servants. He was also a scholar Brahmin with him. As Vikram was enchanted, he continued to see Brahmin opened his mouth. Out of his mouth without thinking - 'I wish I could own the palace!' As soon as King Vikramaditya heard this, the grand palace donated it to him.

The Brahmin's feet were not falling on the ground. He ran away to tell his wife this news. Here, before the Brahminic speaks of seeing him empty-handed, he has already told him about getting the money in the diamond-jewels and gem-masked palaces.

Brahmin's wife had no boundaries of happiness. It seemed as if it was a time for her husband to go crazy and she would have been unconsciously bak, but repeatedly telling her, she got ready to walk with her to see the palace. Seeing the splendor of the palace, his eyes were kept open.

Seeing the corner of the palace and seeing when it was evening they did not know. Tired and tired, they fell into a bedroom and disappeared. In half an hour, his eyes were opened with a voice.

The smell spread across the palace and the whole palace was bright. He listened carefully and Lakshmi was speaking. He was saying that with his fate he has come here and is ready to fulfill any of his wishes.
Brahmin couple got worried about fear of couple Brahmini became unconscious. Lakshmi repeated her talk three times. But Brahmin did not ask for anything but went angry. As soon as he gets his light and smell - both disappear

After quite a while, the Brahmin realized the senses and said, "This palace is definitely scary, so donations are found in donation. Better than this, we have a broken house where the sleep of peace can sleep. ' Brahmin got married to wife

Suddenly, after spending the rest of the night in the morning, they wrapped their bags and returned to the old cottage. Brahmin came directly from his house to the Raj Bhawan and requested Vikramaditya to withdraw his palace. But how can they accept the donation given?

After thinking enough, they bought the fair value of the palace and bought it. Brahmin happily returned to his home.

After buying the palace from the Brahmin, King Vikramaditya came and settled in it. At the same time, the court also seemed to be there. One day he was asleep and Lakshmi came back.

When Lakshmi asked them to ask anything, they said, 'I have everything with my grace. Even if you want to give it, then pour the money in my entire state and let my people not lack any thing. '

When they got up in the morning, they came to know that money has rained in all the states and people want to give rain money to the king. Vikramaditya has ordered that no one will fund the share of anybody else and the wealth of his share will be his property. People jaise jai ho ho ho.

So say the effigy of lipstick, say, Rajan, do you find yourself worthy of this throne after this story? King Bhoj was disappointed and returned to his room. The next day Raja stopped the sixth pupil, Ravbhamma.

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