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25 June, 2020

दूसरी पुतली चित्रलेखा की कहानी- अमर फल और विक्रमादित्य का पराक्रम

दूसरी पुतली चित्रलेखा की कहानी

अगले दिन जैसे ही राजा भोज ने सिंहासन पर बैठना चाहा तो दूसरी पुतली बोली- जो राजा विक्रमादित्य जैसा गुणी हो, पराक्रमी हो, यशस्वी हो वही बैठ सकता है इस सिंहासन पर।

राजा ने पूछा, 'विक्रमादित्य में क्या गुण थे?'पुतली चित्रलेखा ने कहा, 'सुनो।'
एक बार राजा विक्रमादित्य की इच्छा योग साधने की हुई। अपना राजपाट अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर अंग में भभूत लगाकर जंगल में चले गए।
उसी जंगल में एक ब्राह्मण तपस्या कर रहा था। देवताओं ने प्रसन्न होकर उस ब्राह्मण को एक फल दिया और कहा, 'जो इसे खा लेगा, वह अमर हो जाएगा। 'ब्राह्मण ने वह फल को अपनी पत्नी को दे दिया। पत्नी ने उससे कहा, 'इसे राजा को दे आओ और बदले में कुछ धन ले आओ

ब्राह्मण ने जाकर वह फल राजा को दे दिया। राजा अपनी रानी को बहुत प्यार करता था। उसने वह फल अपनी रानी का दे दिया। रानी का प्रेम शहर के कोतवाल से था। रानी ने वह फल उसे दे दिया।

कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था। उसने वह फल वेश्या को दे दिया। वेश्या ने सोचा कि, 'मैं अमर हो जाऊंगी तो भी पाप कर्म करती रहूंगी। अच्छा होगा कि यह फल राजा को दे दूं। वह जिएगें तो लाखों का भला करेगें।' यह सोचकर उसने दरबार में जाकर वह फल राजा को दे दिया।

फल को देखकर राजा चकित रह गए। उन्हें सारा भेद मालूम हुआ तो बड़ा दुख हुआ। उसे दुनिया बेकार लगने लगी। एक दिन वह बिना किसी से कहे-सुने राजघाट छोड़कर घर से निकल गए।

राजा इंद्र को यह मालूम हुआ तो उन्होंने राज्य की रखवाली के लिए एक दूत भेज दिया।

इधर जब राजा विक्रमादित्य की योग-साधना पूरी हुई तो वह लौटे। दूत ने उन्हें रोका। विक्रमादित्य ने उससे पूछा तो उसने सब हाल बता दिया।

विक्रमादित्य ने अपना नाम बताया, फिर भी दूत ने उन्हें न जाने दिया। बोला, 'तुम विक्रमादित्य हो तो पहले मुझसे लड़ो।'
दोनों में लड़ाई हुई। विक्रमादित्य ने उसे पछाड़ दिया।
दूत बोला, 'मुझे छोड़ दो। मैं किसी दिन आपके काम आऊंगा।'
इतना कहकर पुतली बोली, 'राजन्!
क्या आप में इतना पराक्रम है कि इन्द्र के दूत को हरा कर अपना गुलाम बना सको?

Story of second pupil chitralekha

The next day, as soon as King Bhoj wanted to sit on the throne, the second pupil quote - which is virtuous like King Vikramaditya, is mighty, can be successful only if he is sitting on this throne.

The King asked, 'What qualities were there in Vikramaditya?' Pullei Chitralekha said, 'Listen.'
Once, King Vikramaditya's desire was done by Yoga. By submitting his palate to his younger brother Bharthiharri, he went into the jungle after being embroiled in the limbs.

In the same forest a Brahmin was performing austerity. The deities pleased and gave a fruit to that Brahman and said, 'Whoever eats it will become immortal. 'Brahmin gave that fruit to his wife. The wife said to him, 'Give it to the king and get some money in return
Brahmin went and gave the fruit to the king. The king loved his queen a lot. He gave that fruit to his queen. The queen's love was from Kotwal of the city. The Queen gave that fruit to him.

Inspector used to go to a prostitute. She gave that fruit to the prostitute. The prostitute thought, 'Even if I am immortal, I will continue to sin. It would be good to give this fruit to the king. He will do good to millions. ' Thinking that he went to the court and gave the fruit to the king.

The King was surprised to see the fruit. If they knew all the difference then there was great sorrow. The world seemed to be useless One day he left the house and left the house without any reason.

When Raja Indra realized this, he sent an angel to guard the state.

Here when the yoga-practice of King Vikramaditya was completed, he returned. The angel stopped them. When Vikramaditya asked him, he told all the details.
Vikramaditya said his name, yet the messenger did not let them go. You said, 'If you are Vikramaditya then fight with me first.'

There was a fight between them. Vikramaditya defeated him.
The envoy said, 'Leave me. I will come to your work some day. '
By saying so, the pupil said, 'Rajan!
Is there so much power in you that you can make your slave by defeating the messenger of Indra?

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