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24 June, 2020

पहली पुतली रत्नमंजरी की कहानी - राजा विक्रमादित्य और सिंहासन प्राप्ति

पहली पुतली रत्नमंजरी की कहानी

अंबावती में एक राजा राज्य करता था। वह बड़ा दानी था। उसी राज्य में धर्मसेन नाम का एक और बड़ा राजा हुआ। उसकी चार रानियां थी। एक थी ब्राह्मण, दूसरी क्षत्रिय, तीसरी वैश्य और चौथी शूद्र। ब्राह्मणी से एक पुत्र हुआ, जिसका नाम ब्राह्मणीत रखा गया। क्षत्राणी से तीन बेटे हुए। एक का नाम शंख, दूसरे का नाम विक्रमादित्य और तीसरे का भर्तृहरि रखा गया। वैश्य से एक लड़का हुआ, जिसका नाम चंद्र रखा गया। शूद्राणी से धन्वन्तारि हुए।

जब वे लड़के बड़े हुए तो ब्राह्मणी का बेटा घर से निकल पड़ा और धारापुर आया। हे राजन्! वहां के राजा तुम्हारे पिता थे। उस लड़के ने राजा को मार डाला और राज्य अपने हाथ में ले करके उज्जैन पहुंचा। संयोग की बात है कि उज्जैन में आते ही वह मर गया। उसके मरने पर क्षत्राणी का बेटा शंख गद्दी पर बैठा। कुछ समय बाद विक्रमादित्य गद्दी पर बैठें।

एक दिन राजा विक्रमादित्य को राजा बाहुबल के बारे में पता चला कि जिस गद्दी पर वह बैठे हैं वह राजा बाहुबल की कृपा से है। पंडितों ने सलाह दी कि हे राजन्! आपको जग जानता है, लेकिन जब तक राजा बाहुबल आपका राजतिलक नहीं करेगें, तब तक आपका राज्य अचल नहीं होगा। आप उनसे राजतिलक करवाओ।

विक्रमादित्य ने कहा, 'अच्छा।' और वह अपने ज्ञानी और विश्वसनीय साथी लूतवरण को साथ लेकर वहां गए। बाहुबल ने बड़े आदर से उसका स्वागत किया। पांच दिन बीत गए। लूतवरण ने विक्रमादित्य को सलाह दी कि, 'जब आप विदा लेगें तब राजा बाहुबल आपसे कुछ मांगने को कहेगें।

राजा के घर में एक सिंहासन हैं, जिसे साक्षात महादेव ने राजा इन्द्र को दिया था। और बाद में इन्द्र ने बाहुबल को दिया। उस सिंहासन में यह गुण है कि जो उस पर बैठेगा। वह सात द्वीप नवखंड पृथ्वी पर राज करेगा। उसमें बहुत-से जवाहरात जड़े हैं। उसमें सांचे में ढालकर बत्तीस पुतलियां लगाई गई है। हे राजन्! तुम उसी सिंहासन को मांग लेना।'

अगले दिन जब विक्रमादित्य विदा लेने गए तो उसने वही सिंहासन मांग लिया। राजा बाहुबल वचन से बंधे थे। बाहुबल ने विक्रमादित्य को उस पर बिठाकर राजतिलक किया और बड़े प्रेम से विदा किया।

राजा विक्रमादित्य ने लौटते ही सभा की और पंडितों को बुलाकर कहा, 'मैं एक अनुष्ठान करना चाहता हूं। आप देखकर बताएं कि मैं इसके योग्य हूं या नहीं।'
पंडितों ने कहा, 'आपका प्रताप तीनों लोकों में छाया हुआ है। आपका कोई बैरी नहीं। जो करना हो, कीजिए।'

अपने खानदान के सब लोगों को बुलाइए, सवा लाख कन्या दान और सवा लाख गायें दान कीजिए, ब्राह्मणों को धन दीजिए, जमींदारों का एक साल का लगान माफ कर दीजिए।'

इतना कहकर पुतली रत्नमंजरी बोली, 'हे राजन्! आपने अगर कभी ऐसा दान किया है तो सिंहासन पर अवश्य बैठें।'

पुतली की बात सुनकर राजा भोज ‍निराश हो गए- 'आज का दिन तो गया। अब तैयारी करो, कल सिंहासन पर बैठेंगे।'

इस तरह सिंहासन बत्तीसी की पहली पुतली ने राजा भोज को नहीं बैठने दिया और अगले दिन दूसरी पुतली चित्रलेखा ने सुनाई राजा विक्रमादित्य की कहानी।

Story of the first pupil Ratnamanjari

A King ruled in Ambawati. He was a great donor. In the same state Dharmasena became another big king. He had four queens. One was Brahmin, the second Kshatriya, the third Vaishya and the fourth Shudra.

There was a son from Brahmini, whose name was named Brahmini. There were three sons from the sari. One was named as Shankha, the second was named Vikramaditya and the third was Bhartruhari. Vaishya has a boy, named Chandra.

Shudhani When the boys grew, the Brahmin's son got out of the house and Dharapur came. Hey Rajan! The king of that city was your father. The boy killed the king and took the state into his own hands and reached Ujjain. It is a coincidence that after coming to Ujjain, he died. At the time of his death, son of the sertran sat on the throne. After some time sit on the Vikramaditya throne.

One day, King Vikramaditya came to know about King Bahubal, the throne on which he is seated is by the grace of King Bahabubal. Pundits advised that O Rajan! You know the world, but until the King Bahubal does not rule over you, your state will not be immovable.
You get them royal
Vikramaditya said, 'Good.' And he went there with his knowledgeable and trusted companion Lutavaran.
Bahubal welcomed him with great respect. Five days passed. Lootavarana advised Vikramaditya, "When you depart, Raja Bahubal will ask you to ask something.

There is a throne in Raja's house, which Saketh Mahadeva gave to King Indra. And later Indra gave it to Bahubal. In this throne is the quality that will sit on it. The Seven Islands will rule over the earth. There are many jewels in it. It has been mounted in a mold and has been installed in thirty-seven. Hey Rajan! You ask for the same throne. '

The next day when Vikramaditya went for a farewell, he demanded the same throne. King Bahubal was tied to the word. Bahubal devoted Vikramaditya to him and made a great dedication and departed with great love.
King Vikramaditya returned when he returned and called the pundits and said, 'I want to do a ritual. You tell me whether I am fit or not. '

The scholars said, 'Your glory lies in the three worlds. None of your haters Do what you want to do. '

Call all the people of your family, donate 1.2 million daughters and donate three lakh cows, give money to Brahmins, forgive one year's landlord.

By saying so, the effigy Ratnamanjari said, 'O Rajan! If you have ever donated such a donation, then you must sit on the throne. '

King Bhoj was disappointed by hearing the pupil- "Today is the day. Now prepare, tomorrow will sit on the throne. '

In this way, the first pupil of the throne, Batti did not allow Raja Bhoj to sit and the next day the second pupil Chitralekha narrated the story of King Vikramaditya.

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