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08 February, 2020

मूर्खों की फेहरिस्त - अकबर बीरबल की कहानी

मूर्खों की फेहरिस्त - अकबर बीरबल की कहानी 

बादशाह अकबर घुड़सवारी के इतने शौकीन थे कि पसंद आने पर घोड़े का मुंहमांगा दाम देने को तैयार रहते थे। दूर-दराज के मुल्कों, जैसे अरब, पर्शिया आदि से घोड़ों के विक्रेता मजबूत व आकर्षक घोड़े लेकर दरबार में आया करते थे। बादशाह अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए चुने गए घोड़े की अच्छी कीमत दिया करते थे। जो घोड़े बादशाह की रुचि के नहीं होते थे उन्हें सेना के लिए खरीद लिया जाता था।

अकबर के दरबार में घोड़े के विक्रेताओं का अच्छा व्यापार होता था।

एक दिन घोड़ों का एक नया विक्रेता दरबार में आया। अन्य व्यापारी भी उसे नहीं जानते थे। उसने दो बेहद आकर्षक घोड़े बादशाह को बेचे और कहा कि वह ठीक ऐसे ही सौ घोड़े और लाकर दे सकता है, बशर्ते उसे आधी कीमत पेशगी दे दी जाए।

बादशाह को चूंकि घोड़े बहुत पसंद आए थे, सो वैसे ही सौ और घोड़े लेने का तुरंत मन बना लिया।
बादशाह ने अपने खजांची को बुलाकर व्यापारी को आधी रकम अदा करने को कहा। खजांची उस व्यापारी को लेकर खजाने की ओर चल दिया। लेकिन किसी को भी यह उचित नहीं लगा कि बादशाह ने एक अनजान व्यापारी को इतनी बड़ी रकम बतौर पेशगी दे दी। लेकिन विरोध जताने की हिम्मत किसी के पास न थी।
सभी चाहते थे कि बीरबल यह मामला उठाए।

बीरबल भी इस सौदे से खुश न था। वह बोला, “हुजूर ! कल मुझे आपने शहर भर के मूर्खों की सूची बनाने को कहा था। मुझे खेद है कि उस सूची में आपका नाम सबसे ऊपर है।”

बादशाह अकबर का चेहरा मारे गुस्से के सुर्ख हो गया। उन्हें लगा कि बीरबल ने भरे दरबार में विदेशी मेहमानों के सामने उनका अपमान किया है।

गुस्से से भरे बादशाह चिल्लाए, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमें मूर्ख बताने की ?”

“क्षमा करें बादशाह सलामत।” बीरबल अपना सिर झुकाते हुए सम्मानित लहजे में बोला आप चाहें तो मेरा सर कलम करवा दें, यदि आप के कहने पर तैयार की गई मूर्खों की फेहरिस्त में आपका नाम सबसे ऊपर रखना आपको गलत लगे।”

दरबार में ऐसा सन्नाटा छा गया कि सुई गिरे तो आवाज सुनाई दे जाए।

अब बादशाह अकबर अपना सीधा हाथ उठाए, तर्जनी को बीरबल की ओर ताने आगे बढ़े। दरबार में मौजूद सभी लोगों की सांस जैसे थम सी गई थी। उत्सुक्ता व उत्तेजना सभी के चेहरों पर नृत्य कर रही थी। उन्हें लगा कि बादशाह सलामत बीरबल का सिर धड़ से अलग कर देंगे। इससे पहले किसी की इतनी हिम्मत न हुई थी कि बादशाह को मूर्ख कहे।

लेकिन बादशाह ने अपना हाथ बीरबल के कंधे पर रख दिया। वह कारण जानना चाहते थे। बीरबल समझ गया कि बादशाह क्या चाहते हैं। वह बोला, “आपने घोड़ों के ऐसे व्यापारी को बिना सोचे-समझे एक मोटी रकम पेशगी दे दी, जिसका अता-पता भी कोई नहीं जानता। वह आपको धोखा भी दे सकता है। इसलिए मूर्खों की सूची में आपका नाम सबसे ऊपर है। हो सकता है कि अब वह व्यापारी वापस ही न लौटे। वह किसी अन्य देश में जाकर बस जाएगा और आपको ढूढ़े नहीं मिलेगा। किसी से कोई भी सौदा करने के पूर्व उसके बारे में जानकारी तो होनी ही चाहिए। उस व्यापारी ने आपको मात्र दो घोड़े बेचे और आप इतने मोहित हो गए कि मोटी रकम बिना उसको जाने-पहचाने ही दे दी। यही कारण है बस।”

“तुरंत खजाने में जाओ और रकम की अदायगी रुकवा दो।” अकबर ने तुरंत अपने एक सेवक को दौड़ाया।
बीरबल बोला, “अब आपका नाम उस सूची में नहीं रहेगा।”

बादशाह अकबर कुछ क्षण तो बीरबल को घूरते रहे, फिर अपनी दृष्टि दरबारियों पर केन्द्रित कर ठहाका लगाकर हंस पड़े। सभी लोगों ने राहत की सांस ली कि बादशाह को अपनी गलती का अहसास हो गया था। हंसी में दरबारियों ने भी साथ दिया और बीरबल की चतुराई की एक स्वर से प्रशंसा की।

Fanatics - Akbar Birbal Story

Emperor Akbar was so fond of horse riding that if he liked the horses were ready to pay the price. From the far-flung countries, such as Arabs, Persia etc., the merchants of horses used to come in the court with a strong and attractive horse. The king used to give a good price for the horse chosen for his personal use. Those who were not interested in the horse king were bought for the army.

There was good trade of horse vendors in Akbar's court.

One day a new seller of horses came in the court. Other merchants did not even know him. He sold two very attractive horse to the king and said that he could bring such a hundred horses and bring it, provided it be given half the price.

Since the king loved horses very much, so did the mind immediately to take the hundred and the horse.

The king called his cashier and asked the trader to pay half the amount. The cashier led the dealer to the treasure. But it was not fair to anyone that the emperor gave such a huge amount to a known businessman as a promotion. But nobody dared to oppose it.

Everyone wanted Birbal to take up this matter.

Birbal was also not happy with the deal. He said, "Huff! Yesterday I asked you to make a list of fools throughout the city. I am sorry that your name is on top of that list. "
Emperor Akbar's face struck the rage of anger. He felt that Birbal had insulted him in front of foreign guests in a courtroom.

Embarrassed king shouted, "How did you dare to tell us fool?"

"Sorry Emperor's Salute." Birbal shrugged his head and said in a respectful accent, if you want, you should get my head cut, if you put your name in the list of fools prepared on the say of you, you would be wrong. "

There was such silence in the court that if the needle fell, then the voice would be heard.
Now, King Emperor Akbar raised his hand, move the forefinger towards Birbal. The breath of all the people present in the court was stopped. Excite and excitement was dancing on all the faces. They thought that the king would separate Lakat Birbal's head from the fuselage. Before that nobody had the courage to say that the king was foolish.

But the king placed his hand on the shoulder of Birbal. They wanted to know the reason. Birbal understood what the king wanted. He said, "You gave a huge amount of money to the trader of the horse without thinking, no one knows who he is. He can also cheat you. So your name is top of the list of fools. It may be that the merchant has not returned. He will go to another country and will not find you. There must be information about him before anybody can deal with anybody. The trader sold you two horses and you became so fascinated that he gave the fat amount without knowing it. That's the reason. "

"Immediately go to the treasure and stop payment of money." Akbar immediately ran one of his servants.

Birbal said, "Your name will no longer be in that list."

Emperor Akbar stared at Birbal for some time, then laughing at his eyes on the courtiers laughing. Everyone breathed a sigh of relief that the King had realized his mistake. Courts also laugh together and lauded Birbal's tactics with a tone of voice. 

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