PM Modi Video Removed: हाल ही में Meta ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो डिलीट कर दिया और बाद में इसे वापस लाते हुए 'तकनीकी गड़बड़ी' का बहाना बना दिया। यह कोई नया ट्रेंड नहीं है; सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अक्सर बिना वजह पोस्ट हटा देते हैं और एल्गोरिद्म के पीछे छुप जाते हैं। यह आर्टिकल इस बात पर गहराई से चर्चा करता है कि कैसे दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां अपनी जिम्मेदारियों से भाग रही हैं। भारत के लिए यह एक अहम मौका है कि वह सिर्फ 'सॉरी' से संतुष्ट न हो और Meta जैसी कंपनियों से पूरी ट्रांसपेरेंसी और एल्गोरिद्म की जवाबदेही की मांग करे।
दस साल का फर्क, लेकिन बहाना वही
Meta प्लेटफॉर्म्स पर अक्सर ऐसे वीडियो और पोस्ट हटा दिए जाते हैं जिनमें दूर-दूर तक कुछ भी आपत्तिजनक नहीं होता। बाद में वे पोस्ट वापस भी आ जाते हैं, लेकिन कंपनी कभी यह साफ नहीं करती कि ऐसा क्यों हुआ था। पीएम मोदी के मामले में भी कंपनी सिर्फ माफी मांग कर और एल्गोरिद्म का बहाना बनाकर बचना चाह रही है।
इस बहानेबाजी का इतिहास पुराना है। 8 सितंबर 2016 को नॉर्वे के एक बड़े अखबार 'Aftenposten' ने अपने पहले पन्ने पर Meta के CEO मार्क जुकरबर्ग के नाम एक खुला खत छापा था। अखबार के एडिटर ने चिंता जताई थी कि दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अभिव्यक्ति की आजादी को खत्म कर रहा है। वजह थी वियतनाम युद्ध की एक मशहूर पुलित्जर पुरस्कार विजेता तस्वीर, जिसे फेसबुक के ऑटोमैटिक फिल्टर ने 'न्यूडिटी पॉलिसी' का उल्लंघन मानकर डिलीट कर दिया था। भारी विरोध के बाद फेसबुक ने गलती मानी और उसे एक 'तकनीकी गड़बड़ी' बता दिया।
अब 28 जुलाई 2026 को भी बिल्कुल यही हुआ। Meta ने पीएम मोदी का एक बिल्कुल सामान्य वीडियो हटा दिया। जब सवाल उठे, तो 10 साल पुराना वही रटा-रटाया जवाब सामने आया- तकनीकी गलती।
क्या सिर्फ 'सॉरी' बोल देना काफी है?
जब भी इन टेक कंपनियों से कोई बड़ी चूक होती है, तो वे एल्गोरिद्म या सिस्टम ग्लिच के पीछे छुप जाती हैं। सवाल यह है कि क्या दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां सिर्फ एक 'सॉरी' से अपनी जिम्मेदारी खत्म कर सकती हैं?
शुरुआती दिनों में मार्क जुकरबर्ग ने एक मशहूर बात कही थी- 'Move fast and break things'। सिलिकॉन वैली की पूरी वर्किंग स्टाइल इसी पर टिकी थी कि पहले प्रोडक्ट लॉन्च कर दो, गलतियां बाद में सुधार लेंगे। लेकिन आज जब इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल अरबों लोग, सरकारें और दुनिया के टॉप लीडर्स कर रहे हैं, तो यह सोच बहुत खतरनाक हो चुकी है।
असली समस्या एल्गोरिद्म नहीं, बल्कि जवाबदेही की कमी है। कंपनियां अपने सिस्टम को एक 'ब्लैक बॉक्स' की तरह रखती हैं, जिसके अंदर क्या चल रहा है, कोई नहीं जानता।
रोजमर्रा की जिंदगी पर एल्गोरिद्म का कंट्रोल
टेक कंपनियों ने ऐसा माहौल बना दिया है मानो एल्गोरिद्म कोई जादू हो। जबकि सच्चाई यह है कि इन्हें इंसान ही बनाते हैं, ट्रेन करते हैं और कंट्रोल करते हैं। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में इसके कई उदाहरण देखने को मिलते हैं:
- ई-कॉमर्स साइट्स पर एक ही प्रोडक्ट अलग-अलग यूजर को अलग-अलग कीमत पर दिखता है।
- Uber, Ola और Rapido जैसे ऐप्स अचानक किराया बढ़ा या घटा देते हैं।
- इंस्टाग्राम पर बिना किसी वजह लोगों के अकाउंट सस्पेंड हो जाते हैं।
- एक तरफ आपत्तिजनक पोस्ट पर लाखों व्यूज आते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक आम यूजर मामूली सवाल पूछने पर बैन हो जाता है।
इन सभी मामलों में कंपनी का एक ही जवाब होता है- यह एल्गोरिद्म ने किया है। यानी एल्गोरिद्म अब सिर्फ कंटेंट नहीं दिखा रहे हैं, बल्कि यह भी तय कर रहे हैं कि किसकी आवाज सुनी जाएगी और किसे दबा दिया जाएगा।
भारत को मांगनी होगी पक्की जवाबदेही
मशहूर लेखक युवाल नोआ हरारी ने अपनी किताब 'Homo Deus' में लिखा है कि आज की दुनिया में एल्गोरिद्म सबसे अहम चीज बन चुके हैं। अगर हमें अपना भविष्य समझना है, तो यह समझना होगा कि ये हमारे फैसलों को कैसे कंट्रोल कर रहे हैं। टेक कंपनियां जानबूझकर इन्हें राज बनाकर रखती हैं ताकि सूचनाओं पर उनका कंट्रोल रहे और वे जवाबदेही से बच सकें।
Meta ने वीडियो वापस कर दिया है और माफी भी मांग ली है। हो सकता है आने वाले दिनों में मार्क जुकरबर्ग खुद इसके लिए माफी मांगें। लेकिन भारत को सिर्फ इस माफी पर चुप नहीं बैठना चाहिए। पीएम मोदी के वीडियो का हटना यह साबित करता है कि एल्गोरिद्म के इस जाल से कोई भी अछूता नहीं है।
अब वक्त आ गया है कि भारत इन कंपनियों से सीधे सवाल करे- एल्गोरिद्म फैसले कैसे लेते हैं? यह 'तकनीकी गड़बड़ी' कितनी बार होगी? अगर सिस्टम गलती करता है, तो उसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर कंपनी की होनी चाहिए। टेक कंपनियों को अब ट्रांसपेरेंसी दिखानी ही होगी; एल्गोरिद्म अब बचने का बहाना नहीं बन सकते।

