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Bada Mangal History: लखनऊ में बड़े मंगल पर भंडारे की शुरुआत कैसे हुई? नवाबों से जुड़ा है दिलचस्प कनेक्शन

Bada Mangal History: मई-जून की चिलचिलाती गर्मी में अगर आप लखनऊ की सड़कों से गुजरते हैं, तो आपको एक बेहद खास नज़ारा देखने को मिलेगा। लगभग शहर के हर चौराहे, गली और मोहल्ले में टेंट लगे होते हैं और लोगों को बड़े प्यार से पूड़ी-सब्जी, छोले-चावल, ठंडा पानी और शरबत बांटा जा रहा होता है। यह कोई आम दिन नहीं, बल्कि लखनऊ का प्रसिद्ध 'बड़ा मंगल' होता है।

हर साल ज्येष्ठ (मई-जून) महीने के हर मंगलवार को पूरे लखनऊ में हज़ारों भंडारे आयोजित किए जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सिर्फ लखनऊ में ही बड़े मंगल पर इतना बड़ा आयोजन क्यों होता है? और सबसे दिलचस्प बात, इस विशुद्ध हिंदू परंपरा की शुरुआत एक मुस्लिम नवाब ने की थी। आइए जानते हैं इसका पूरा इतिहास।

बड़े मंगल पर आयोजित होने वाले भंडारे को लेकर कई दंत कथाएँ प्रचलित हैं, इनमे से नवाब वाजिद अली शाह से संबन्धित कथा पर ज्यादा लोगों की मान्यता है।

नवाब वाजिद अली शाह से संबन्धित कथा

बड़े मंगल और भंडारे की इस 200 साल पुरानी परंपरा का सीधा कनेक्शन अवध के नवाब वाजिद अली शाह से माना जाता है। कहा जाता है कि, एक बार नवाब वाजिद अली शाह के बेटे की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई। तमाम हकीमों और वैद्यों के इलाज के बाद भी जब कोई सुधार नहीं हुआ, तो नवाब और उनकी बेगम बेहद परेशान हो गईं।

तब किसी ने बेगम को सलाह दी कि वे अलीगंज स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर में मंगलवार के दिन जाकर मन्नत मांगें। अपने बेटे की सलामती के लिए नवाब और बेगम मंदिर पहुंचे और बजरंगबली से प्रार्थना की। चमत्कारिक रूप से कुछ ही दिनों में उनके बेटे की तबीयत बिल्कुल ठीक हो गई।

गुड़ का प्रसाद और भंडारे की शुरुआत

बेटे के ठीक होने की खुशी में नवाब वाजिद अली शाह ने अलीगंज के उस हनुमान मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण करवाया। यह काम ज्येष्ठ महीने में पूरा हुआ था। मंदिर बनने की खुशी में नवाब ने पूरे शहर में गुड़ का प्रसाद बंटवाया। यह उस दौर का एक बहुत बड़ा जश्न था। समय के साथ नवाब द्वारा प्रसाद बांटने की यही परंपरा एक बड़े भंडारे में तब्दील हो गई, जो आज तक चलती आ रही है।

दक्षिण भारतीय महिला और चमत्कारी मूर्ति

इस परंपरा से एक और मशहूर कहानी जुड़ी है। कहा जाता है कि सैकड़ों साल पहले एक दक्षिण भारतीय महिला लखनऊ आई थी। उसके पास हनुमान जी की एक छोटी सी चमत्कारी मूर्ति थी। उस महिला ने नवाब वाजिद अली शाह से लखनऊ में ही इस मूर्ति को स्थापित करने और मंदिर बनाने की इजाज़त मांगी।

नवाब ने बिना किसी हिचकिचाहट के न सिर्फ इसकी परमिशन दी, बल्कि मंदिर निर्माण में मदद भी की। जब मूर्ति स्थापित हुई, तो आसपास के लोगों की परेशानियां दूर होने लगीं और उनकी मन्नतें पूरी होने लगीं। अपनी मुराद पूरी होने पर लोगों ने भगवान को धन्यवाद देने के लिए मंगलवार के दिन खाना (भंडारा) बांटना शुरू कर दिया।

हिंदू-मुस्लिम एकता की बेमिसाल तस्वीर

बड़े मंगल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह किसी एक धर्म का त्योहार नहीं रह गया है, बल्कि यह लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब की सबसे बड़ी मिसाल है। नवाबों के दौर में शुरू हुई इस परंपरा में आज भी शहर के हर वर्ग के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

आज के समय में बड़े कारोबारी, राजनेता, आम जनता और हमारे मुस्लिम भाई भी जगह-जगह भंडारे लगाते हैं और लोगों की सेवा करते हैं। बड़ा मंगल सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, यह असल मायने में इंसानियत और भाईचारे का सबसे बड़ा त्योहार बन चुका है, जो पूरे देश को एकजुटता का मैसेज देता है।

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