सार: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक यूरेनियम डील फाइनल हुई है। एक वक्त था जब एनपीटी (NPT) पर साइन न करने की वजह से ऑस्ट्रेलिया ने हमें यूरेनियम देने से साफ मना कर दिया था। लेकिन अब वही ऑस्ट्रेलिया भारत के बढ़ते न्यूक्लियर प्रोग्राम के लिए जरूरी ईंधन की सप्लाई करेगा। यह समझौता भारत के 2047 तक 100 गीगावॉट Clean Energy पैदा करने के बड़े लक्ष्य को हासिल करने में मील का पत्थर साबित होगा। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम इतना खास क्यों है और इस डील से भारत को क्या-क्या फायदे होने वाले हैं।
लंबा इंतजार खत्म, अब भारत आएगा ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम
पीएम नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान यूरेनियम सप्लाई को लेकर एक बेहद अहम समझौता हुआ है। इसके तहत अब ऑस्ट्रेलिया शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए भारत को लंबे समय तक यूरेनियम का निर्यात करेगा। ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बनीज ने साफ कहा कि इससे भारत को नॉन-फॉसिल फ्यूल (बिना कोयले वाली) बिजली उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी। यह सप्लाई पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की कड़ी निगरानी में होगी, जिससे इसके सैन्य इस्तेमाल की कोई गुंजाइश नहीं है।
आखिर ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम इतना खास क्यों है?
ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया के कुल यूरेनियम भंडार का करीब 28 से 32 प्रतिशत हिस्सा है, जो किसी भी देश से सबसे ज्यादा है। लेकिन सिर्फ मात्रा ही नहीं, इसकी क्वालिटी भी बहुत मायने रखती है:
- हाई-ग्रेड क्वालिटी: ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम 'हाई-ग्रेड' होता है। इसमें अशुद्धियां कम होती हैं, जिससे इसे निकालना और न्यूक्लियर फ्यूल बनाना आर्थिक रूप से काफी फायदेमंद होता है।
- भरोसेमंद सप्लाई: कई यूरेनियम उत्पादक देशों में राजनीतिक उथल-पुथल या सुरक्षा का खतरा रहता है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया एक मजबूत लोकतंत्र और राजनीतिक रूप से स्थिर देश है। वहां से सप्लाई में रुकावट आने का रिस्क न के बराबर है।
भारत के लिए यह डील गेम चेंजर क्यों है?
भारत के पास यूरेनियम का जो भी भंडार है, वह काफी कम और लो-ग्रेड का है। वर्तमान में भारत लगभग 8 गीगावॉट न्यूक्लियर एनर्जी बनाता है, लेकिन 2047 तक इसे 100 गीगावॉट तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
इसके लिए देश को हर साल हजारों टन यूरेनियम चाहिए, जबकि देश के अंदर उत्पादन सिर्फ 400-500 टन ही होता है। अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस या कजाकिस्तान जैसे गिने-चुने देशों पर निर्भर रहना रिस्की हो सकता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया एक बड़ा और सुरक्षित विकल्प बनकर उभरा है। इससे भारत को सस्ती और पर्यावरण के अनुकूल बिजली मिलेगी, जो देश के नेट-जीरो लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार होगी।
1974 के इनकार से इकरार तक की कहानी
1974 (पोखरण-1) और 1998 (पोखरण-2) के परमाणु परीक्षणों के बाद, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने भारत से दूरी बना ली थी। ऑस्ट्रेलिया की पॉलिसी सख्त थी कि जो देश NPT (न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी) पर साइन नहीं करेगा, उसे यूरेनियम नहीं मिलेगा। चूंकि भारत इस संधि को भेदभावपूर्ण मानता था, इसलिए उसने कभी साइन नहीं किए।
इस रुख में बड़ा बदलाव 2008 की भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर डील (जिसका श्रेय कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मनमोहन सिंह सरकार को दिया है) और NSG से मिली छूट के बाद आया। इसके बाद, 2014 में ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन पीएम टोनी एबॉट के भारत दौरे पर परमाणु सहयोग समझौते पर साइन हुए थे और ऑस्ट्रेलिया ने भारत पर लगे बैन हटा लिए थे। अब जाकर यह डील पूरी तरह से लागू हुई है।
प्राइवेट कंपनियों की एंट्री (SHANTI बिल 2025)
इस डील की टाइमिंग भी बहुत खास है। भारतीय संसद ने दिसंबर 2025 में SHANTI (सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) बिल पास किया था। इस नए कानून के बाद अब प्राइवेट कंपनियां भी न्यूक्लियर पावर प्लांट लगा सकेंगी और परमाणु ईंधन बना सकेंगी। ऐसे में भविष्य में यूरेनियम की मांग बहुत तेजी से बढ़ने वाली है, जिसे ऑस्ट्रेलिया पूरा करेगा।
रक्षा और अंतरिक्ष में भी बढ़ेगी साझेदारी
यह समझौता सिर्फ बिजली तक सीमित नहीं है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते हाल के सालों में काफी गहरे हुए हैं, जिसकी एक बड़ी वजह इंडो-पैसिफिक रीजन में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर नजर रखना है। दोनों देशों ने यह भी तय किया है कि वे हिंद महासागर में ऑस्ट्रेलिया के कोकोस (कीलिंग) द्वीप पर एक "अस्थायी स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल" बनाएंगे, जो भारत के स्पेस मिशन्स को सपोर्ट करेगा।
क्या होता है यूरेनियम?
यूरेनियम एक भारी धातु है जिसका मेल्टिंग पॉइंट 1132 डिग्री सेल्सियस होता है। यह 60 सालों से ऊर्जा के एक बेहतरीन और सघन स्रोत के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। यह पृथ्वी की ऊपरी परत में चट्टानों और यहां तक कि समुद्र के पानी में भी पाया जाता है। अपने भारीपन के कारण इसका इस्तेमाल सिर्फ न्यूक्लियर रिएक्टरों में ही नहीं, बल्कि विमानों के कंट्रोल सिस्टम और रेडिएशन शील्डिंग में भी किया जाता है। भारत के पास बम बनाने के लिए पर्याप्त यूरेनियम मौजूद है, लेकिन ऊर्जा और बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे इस आयात की सख्त जरूरत थी।



