सार: ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का जनाजा 4 जुलाई से तेहरान में शुरू हो रहा है। इसे 'सदी का अंतिम संस्कार' कहा जा रहा है, जिसमें करीब 2 करोड़ लोगों के जुटने की उम्मीद है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इजरायल की धमकियों और गंभीर सुरक्षा खतरों के चलते उनके बेटे और नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई के इस जनाजे में शामिल होने पर सस्पेंस है। इस आर्टिकल में जानिए इस ऐतिहासिक 6-दिवसीय जनाजे का पूरा रूट, भारत से ईरान जाने वाले प्रतिनिधिमंडल की लिस्ट और मुजतबा के सामने खड़ी नई चुनौतियां।
ईरान पर करीब 36 साल तक राज करने वाले अयातुल्ला अली खामेनेई का अंतिम संस्कार आखिरकार चार महीने के लंबे इंतज़ार के बाद 4 जुलाई से शुरू हो रहा है। इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों में उनकी मौत हो गई थी। युद्ध के हालात के कारण उनके जनाजे में देरी हुई, लेकिन अब तेहरान से लेकर करबला और मशहद तक, इसके लिए अभूतपूर्व तैयारियां की गई हैं।
मुजतबा खामेनेई पिता के जनाजे से क्यों दूर हैं?
इस पूरे आयोजन में सबसे बड़ा सवाल नए सुप्रीम लीडर और अली खामेनेई के बेटे मुजतबा खामेनेई की मौजूदगी को लेकर है। भारत में उनके प्रतिनिधि अयातुल्ला हकीम इलाही ने साफ किया है कि सुरक्षा से जुड़े बेहद गंभीर खतरों के कारण मुजतबा शायद अपने पिता के जनाजे में शामिल नहीं होंगे।
खुफिया इनपुट और इजरायल की तरफ से मिल रही लगातार धमकियों के बाद यह फैसला लिया गया है। हाल ही में इजरायली रक्षा मंत्री ने खुले तौर पर कहा था कि ईरान का अगला सुप्रीम लीडर उनके रडार पर है और उसे 'नष्ट' करना उनका लक्ष्य है। मुजतबा का इस वक्त सार्वजनिक रूप से सामने आना उनकी जान के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
'सदी का अंतिम संस्कार': क्या है पूरी तैयारी?
ईरानी अधिकारी इसे आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े इवेंट के रूप में देख रहे हैं। इसमें 1.2 करोड़ से 2 करोड़ लोगों के शामिल होने का अनुमान है।
- शुरुआत: 6 दिनों तक चलने वाला यह कार्यक्रम 4 जुलाई को तेहरान के इमाम ख़ुमैनी मुसल्ला से शुरू होगा।
- इराक का सफर: बुधवार को पार्थिव शरीर इराक के नजफ़ ले जाया जाएगा, जहां इमाम अली की दरगाह पर जुलूस निकलेगा। इसके बाद करबला में भी श्रद्धांजलि सभा होगी।
- अंतिम विदाई: 9 जुलाई को खामेनेई को उनके होमटाउन मशहद में इमाम रज़ा श्राइन में सुपुर्दे-खाक किया जाएगा।
भारत से कौन-कौन जा रहा है ईरान?
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने इस राजकीय अंतिम संस्कार के लिए पीएम नरेंद्र मोदी को न्योता भेजा था। लेकिन अपने विदेशी दौरों के चलते पीएम मोदी इसमें शामिल नहीं हो पाएंगे।
भारत सरकार की तरफ से एक खास प्रतिनिधिमंडल ईरान जा रहा है, जिसका नेतृत्व बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा करेंगे। उनके अलावा, कांग्रेस के दिग्गज नेता सलमान खुर्शीद, जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती और कई प्रमुख शिया धर्मगुरुओं को भी इस जनाजे में शामिल होने के लिए खास न्योता मिला है।
अमेरिका-ईरान शांति समझौता
खामेनेई की मौत के बाद मिडिल ईस्ट में जबरदस्त टेंशन देखने को मिली थी। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में एक्शन लिया तो अमेरिका ने ईरान के 10 सैन्य ठिकानों पर बमबारी कर दी। जवाब में ईरान ने भी खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी बेस को निशाना बनाया।
हालांकि, हाल ही में कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच दोहा में एक 14-सूत्रीय शांति समझौते पर बातचीत हुई है। कुछ हद तक गोलाबारी कम हुई है और जनाजे के बाद इस शांति वार्ता के अगले दौर की उम्मीद की जा रही है।
कौन हैं मुजतबा और उनके सामने क्या हैं चुनौतियां?
56 साल के मुजतबा खामेनेई अपने पिता के एकदम उलट एक गुमनाम ज़िंदगी जीते आए हैं। उन्होंने कभी कोई सरकारी पद नहीं लिया और ना ही मीडिया को इंटरव्यू दिए। लेकिन पर्दे के पीछे उनकी ताकत का लोहा सब मानते हैं। 2005 और 2009 के चुनावों में उन पर राजनीतिक हस्तक्षेप के गंभीर आरोप लग चुके हैं।
मुजतबा के लिए राह आसान नहीं है। 28 फरवरी के हवाई हमलों में उन्होंने अपने पिता, मां और पत्नी को खो दिया है। एक तरफ उन पर देश को आर्थिक और राजनीतिक संकट से निकालने का भारी दबाव है, तो दूसरी तरफ इजरायल और अमेरिका जैसी बाहरी ताकतों से निपटने की चुनौती। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मुजतबा अपने पिता की सख्त नीतियों पर चलेंगे या फिर बदलते वक्त के साथ कोई नया रास्ता अपनाएंगे।


