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सऊदी अरब पर हूतियों का हमला: रिफाइनरी और एयरबेस तबाह, क्या पाकिस्तान और तुर्की मक्का पैक्ट निभाएंगे?

सार: यमन के हूती विद्रोहियों ने मंगलवार को सऊदी अरब के भीतर घुसकर एयरपोर्ट, एयरबेस और तेल रिफाइनरी पर भीषण मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। इस हमले से मिडिल ईस्ट में हड़कंप मच गया है। लेकिन यह हमला सिर्फ सऊदी अरब पर नहीं है, बल्कि एक महीने पहले हुए 'मक्का डिफेंस पैक्ट' के लिए एक बहुत बड़ा इम्तिहान है। अब पूरी दुनिया की नज़रें इस बात पर हैं कि क्या इस रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान और तुर्की सामूहिक रक्षा के वादे को निभाते हुए सऊदी अरब के समर्थन में हूतियों के खिलाफ उतरेंगे?

सऊदी अरब के घर में घुसकर हूतियों का हमला

यमन में बैठे हूती विद्रोहियों ने अब सीधे सऊदी अरब के अंदरूनी इलाकों पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। मंगलवार को हूतियों ने सऊदी अरब के दक्षिणी हिस्से- खासकर यमन की सीमा से सटे इलाकों में ताबड़तोड़ हमले किए।

सऊदी गठबंधन और ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक, हूतियों ने अबहा, खमीस मुशैत, जाज़ान और नजरान के नागरिक और आर्थिक ठिकानों पर हमला किया है। हूती मीडिया का दावा है कि उन्होंने अबहा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, किंग खालिद एयरबेस और जाज़ान स्थित सऊदी अरामको की तेल रिफाइनरी पर मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं।

इन हमलों की वजह से कई जगह आग लग गई और कुछ एनर्जी यूनिट्स को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। इस भीषण हमले में कम से कम 73 नागरिक घायल हुए हैं, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं।

मक्का पैक्ट की असली परीक्षा

इन हमलों ने सबसे बड़ा सवाल पाकिस्तान और तुर्की के सामने खड़ा कर दिया है। ठीक एक महीने पहले, 7 अगस्त को मक्का में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक बड़ा रक्षा समझौता किया था। इस मक्का पैक्ट में साफ कहा गया था कि 'एक सदस्य पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा'।

इस गठबंधन को पश्चिम एशिया के एक नए सुरक्षा ढांचे के तौर पर देखा जा रहा था, जिसमें सऊदी अरब के पास पैसा, तुर्की के पास आधुनिक सेना और पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं। लेकिन एक विद्रोही गुट ने इस वादे की धज्जियां उड़ा दी हैं। अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान और तुर्की हूतियों के खिलाफ सऊदी का साथ देंगे या सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहेंगे?

हूतियों की धमकी और कच्चे तेल पर असर

हूती मीडिया ऑफिस के डिप्टी हेड नसीरुद्दीन आमेर ने सोशल मीडिया पर इन हमलों की तारीफ की है। उन्होंने कहा, "सऊदी दुश्मन को यह समझना होगा कि यमनी लोगों के खिलाफ बिना कीमत चुकाए अपराध करने का दौर अब खत्म हो चुका है।" हूतियों ने इन हमलों के लिए अंग्रेजी के 'Deep Inside' शब्द का इस्तेमाल किया है, जो बताता है कि वे सऊदी सीमा के बहुत भीतर तक मार कर रहे हैं। यमन के ईरान-समर्थित हूती आउटलेट 'अंसारुल्लाह' ने भी टेलीग्राम पर इन हमलों की पुष्टि की है।

दूसरी ओर, सऊदी गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-माल्की ने कहा है कि नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए इन हमलों का कड़ा जवाब दिया जाएगा।

जाज़ान की जिस रिफाइनरी पर हमला हुआ है, उसकी क्षमता रोज़ाना 4 लाख बैरल तेल रिफाइन करने की है। यही वजह है कि इस हमले से ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतें उछल गई हैं। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स (Brent Crude Futures) 1 डॉलर बढ़कर $98/BBL हो गया, जबकि यूएस क्रूड फ्यूचर्स (U.S. Crude Futures) $2 से ज़्यादा उछलकर $93.65/BBL पर पहुंच गया।

सऊदी पर हुए हालिया हमलों के 5 मुख्य कारण

आखिर हूतियों ने अचानक इतना बड़ा हमला क्यों किया? इसके पीछे पांच बड़े रणनीतिक कारण हैं:

  1. जेल पर हुए हवाई हमले का बदला: 7 सितंबर को यमन के अल-जौफ़ प्रांत स्थित अल-हज़म की एक जेल पर एयरस्ट्राइक हुई थी। इसमें एक बच्चे सहित सात लोग मारे गए। हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने इसका इल्जाम सऊदी गठबंधन पर लगाया और अगले ही दिन मिसाइल हमलों से इसका बदला लिया।
  2. बाब अल-मंदेब का रणनीतिक युद्ध: यमन के दक्षिण-पश्चिमी तट पर स्थित इस अहम समुद्री रास्ते पर कब्ज़े को लेकर जंग तेज़ हो गई है। हूतियों को रोकने के लिए सऊदी समर्थित यमनी सरकारी सेनाओं (IRG) ने सऊदी एयरफोर्स की मदद ली थी, जिससे हूती भड़क गए।
  3. 'घेराबंदी के बदले घेराबंदी' की नीति: सऊदी अरब ने यमन के हवाई क्षेत्र और बंदरगाहों की नाकेबंदी कर रखी है। जुलाई से ही हूती इसके जवाब में लाल सागर में सऊदी जहाज़ों को निशाना बना रहे हैं और अब वे सीधे सऊदी के आर्थिक ठिकानों पर हमला कर रहे हैं।
  4. सऊदी अर्थव्यवस्था पर भारी चोट: अरामको रिफाइनरी और एयरपोर्ट्स को निशाना बनाने का सीधा मकसद सऊदी अरब को भारी वित्तीय नुकसान पहुंचाना है, ताकि रियाध को इस युद्ध की भारी कीमत चुकानी पड़े।
  5. शांति वार्ता में दबाव बनाना: 2022 का यूएन (UN) युद्धविराम अब काम नहीं कर रहा है। हूती अपनी सैन्य ताकत दिखाकर शांति वार्ता में अपनी शर्तें मनवाना चाहते हैं, ताकि सना हवाई अड्डे और यमनी बंदरगाहों से पाबंदियां हटाई जा सकें।

सऊदी अरब और हूतियों में क्यों है इतनी कट्टर दुश्मनी?

यह कोई नया सीमा विवाद नहीं है। इसके पीछे कई दशकों की राजनीति और धार्मिक मतभेद छिपे हैं:

  • धार्मिक और वैचारिक मतभेद: हूती ज़ैदी शिया संप्रदाय से आते हैं, जबकि सऊदी अरब सुन्नी (वहाबी/सलाफी) बहुल देश है। 1980 और 90 के दशक में सऊदी ने यमन में सुन्नी मदरसों को फंडिंग दी थी, जिसे हूतियों ने अपनी पहचान मिटाने की कोशिश माना। यहीं से हूती आंदोलन की शुरुआत हुई।
  • यमन की राजनीति में सऊदी दखल: दोनों देश लगभग 1,800 किमी लंबी सीमा साझा करते हैं। हूतियों का आरोप है कि सऊदी अरब हमेशा से यमन की राजनीति में दखल देता आया है और वहां भ्रष्ट नेताओं का समर्थन करता है।
  • 2014-15 का यमनी गृहयुद्ध: 2011 में राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के हटने के बाद मंसूर हादी सत्ता में आए। 2014 में हूतियों ने राजधानी सना पर कब्ज़ा कर लिया और हादी को सऊदी भागना पड़ा। इसके बाद मार्च 2015 में सऊदी अरब ने हूतियों के खिलाफ सैन्य गठबंधन बनाकर हमला कर दिया।
  • ईरान-सऊदी प्रॉक्सी वॉर: हूतियों को ईरान का सीधा समर्थन हासिल है। ईरान उन्हें पैसे, ट्रेनिंग और आधुनिक बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक देता है। सऊदी अरब हूतियों को अपनी सीमा पर बैठा ईरान का एक खतरनाक 'सैन्य अड्डा' मानता है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा: हूतियों के पास मौजूद लंबी दूरी की मिसाइलें सऊदी अरब की राष्ट्रीय सुरक्षा और दुनिया के तेल बाज़ार के लिए लगातार सिरदर्द बनी हुई हैं। सऊदी किसी भी हाल में अपनी सरहद पर ऐसे सशस्त्र गुट को बर्दाश्त नहीं करना चाहता।

सऊदी अरब के सामने अब दोहरी चुनौती है- हूतियों को करारा जवाब देना और इस तनाव को एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदलने से रोकना। अब पूरी दुनिया यह देख रही है कि क्या 'मक्का पैक्ट' के साझीदार इस मुश्किल घड़ी में कोई ठोस कदम उठाते हैं या नहीं।

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