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ISRO Brain Drain: इसरो से क्यों इस्तीफा दे रहे हैं वैज्ञानिक? जानें नए नियम और असली वजह

ISRO Brain Drain: पिछले एक साल में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के लगभग 100 से सवा सौ वैज्ञानिकों ने इस्तीफा देकर स्पेस स्टार्टअप्स का रुख किया है। इस ‘ब्रेन ड्रेन’ और टैलेंट के पलायन को देखते हुए अंतरिक्ष विभाग ने इस्तीफे और वीआरएस (VRS) को स्वीकार करने के नियमों में बड़े बदलाव किए हैं। कम सैलरी, प्राइवेट कंपनियों के आकर्षक पैकेज और बदलती सरकारी नीतियों के बीच, यह समझना जरूरी है कि देश के सबसे बड़े स्पेस संस्थान से वैज्ञानिक क्यों जा रहे हैं और गगनयान जैसे अहम मिशनों पर इसका क्या असर होगा।

इसरो में क्यों हो रहा है Brain Drain?

साल 2020 में स्पेस सेक्टर को प्राइवेट कंपनियों के लिए खोला गया था, जिसके बाद से जॉब मार्केट पूरी तरह बदल गया है। स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस, पिक्सेल, बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस, ध्रुव स्पेस, दिगंतरा और गैलेक्सआई जैसे कई स्पेस स्टार्टअप्स सामने आए हैं। ये प्राइवेट कंपनियां वैज्ञानिकों को बहुत अच्छी सैलरी, स्टॉक ऑप्शन, काम में फ्लेक्सिबिलिटी और हार्डवेयर पर तेज़ी से काम करने वाला माहौल दे रही हैं।

डीआरडीओ (DRDO) के पूर्व महानिदेशक सेल्वामूर्ति विलियम के मुताबिक, इसके पीछे इसरो का खराब वर्क कल्चर कारण नहीं है, बल्कि प्राइवेट सेक्टर के नए अवसर और ज्यादा वेतन मुख्य वजह हैं। ग्लोबल लेवल की बात करें, तो भारतीय वैज्ञानिकों को दुनिया के बाकी देशों के समकक्ष साइंटिस्ट्स के मुकाबले काफी कम पेमेंट मिलता है। डीआरडीओ के पूर्व वैज्ञानिक रवि गुप्ता ने भी चिंता जताते हुए कहा कि टैलेंट का यह पलायन देश को प्रभावित कर रहा है, क्योंकि डीआरडीओ ने भी ऐसी ही समस्या झेली है।

इस्तीफे और VRS के नियम बदले गए

लगातार हो रहे इस्तीफों की वजह से केंद्र सरकार के अंतरिक्ष विभाग ने एक नया मेमोरेंडम जारी किया है। अब गगनयान या दूसरी अहम परियोजनाओं से जुड़े ग्रुप 'ए' के वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों के इस्तीफे या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) सामान्य प्रक्रिया से स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

अब इसरो के अलग-अलग सेंटर्स के डायरेक्टरों या प्रमुखों के पास सीधे इस्तीफा मंजूर करने का अधिकार नहीं रहा। साइंटिस्ट/इंजीनियर-एसजी रैंक से नीचे के अधिकारियों के मामले में डायरेक्टर अपनी स्पष्ट सिफारिशें विभाग को भेजेंगे और अंतिम फैसला वहीं से लिया जाएगा। हाल ही में विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) के एलवीएम-3 (LVM-3) प्रोजेक्ट डायरेक्टर विक्टर जोसेफ ने भी वीआरएस लिया है। इन इस्तीफों में सबसे ज्यादा नुकसान UR Rao Satellite Centre को हुआ है, जहां 14,600 वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों में से सबसे अधिक लोगों ने नौकरी छोड़ी है।

विज्ञान और अंतरिक्ष मंत्री जितेंद्र सिंह ने जनवरी में राज्यसभा में बताया था कि यह नया मेमो प्रशासनिक कारणों से लाया गया है, ताकि महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर कोई बुरा असर न पड़े और फैसले अधिक परिपक्व स्तर पर लिए जाएं।

क्या इसरो के भविष्य के मिशनों को है कोई खतरा?

इसरो के पूर्व डेप्युटी डायरेक्टर अरूप दासगुप्ता का कहना है कि एक-दो लोगों के जाने से कोई प्रोजेक्ट पटरी से नहीं उतरता, क्योंकि इसरो में 18 हजार लोगों की टीम काम करती है और उनका मजबूत सिस्टम इन बदलावों को आसानी से संभाल लेता है।

वहीं, इसरो के पूर्व अध्यक्ष जी. माधवन नायर का कहना है कि यह आईटी क्रांति के दौर जैसा ही है। उनका मानना है कि स्टार्टअप्स को अपनी टीम खुद तैयार करनी चाहिए और ट्रेनिंग देनी चाहिए, न कि इसरो जैसे स्थापित संस्थानों से अनुभवी लोग ले जाने चाहिए। नायर ने यह भी बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में स्पेस और न्यूक्लियर सेक्टर के टैलेंट के लिए परफॉर्मेंस आधारित प्रोत्साहन, नकद इनाम और स्पेशल सैलरी वृद्धि जैसी योजनाएं थीं, जिन्हें समय के साथ धीरे-धीरे वापस ले लिया गया। साथ ही, उनका मानना है कि प्राइवेट सेक्टर में ज्यादा सैलरी भले ही हो, लेकिन वहां इसरो जितने चुनौतीपूर्ण वैज्ञानिक काम नहीं मिलेंगे।

स्पेस स्टार्टअप्स का बढ़ता दबदबा

इसरो के पूर्व वैज्ञानिक सचिव पी.जी. दिवाकर के मुताबिक, सरकार की नीति में अब बदलाव आया है। पहले सरकार इसरो को रिसोर्ससैट, कार्टोसैट और ओशनसैट जैसी सामाजिक परियोजनाओं के लिए पैसा देती थी। लेकिन अब सरकार ने मंत्रालयों से कहा है कि वे अपनी जरूरत के सैटेलाइट खुद लॉन्च करवाएं। इस बदलाव से स्पेस स्टार्टअप्स को आगे बढ़ने का बड़ा मौका मिला है। एक समय इसरो चंद्रयान और मंगलयान जैसे मिशन के साथ अर्थ ऑब्जर्वेशन और कम्युनिकेशन सैटेलाइट भी बड़ी संख्या में बनाता था, लेकिन अब उस काम में कमी आई है।

आज देश की स्पेस इकॉनमी बढ़कर 8.4 अरब डॉलर तक पहुंच गई है और भारत में 399 स्पेस स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं जो विदेशी निवेश भी आकर्षित कर रहे हैं। सरकार ने साल 2019 में प्राइवेट कंपनियों और इसरो जैसी सरकारी एजेंसियों के बीच एक सिंगल-विंडो इंटरफेस के रूप में इन-स्पेस (IN-SPACe) की भी स्थापना की थी।

इस पूरे मामले पर फिलहाल इसरो की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, मीडिया से बात करने के लिए केवल इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन को अधिकृत किया गया है, जो अभी दिल्ली में हैं।

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