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17 July, 2020

स्थान मारवाड़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

 स्थान मारवाड़ (गंगाराम पटेल और बुलाखीदास की कहानियां)

प्रातः काल बुलाखी दास नाई गंगाराम पटेल को सोते हुए देखा तो उन्हें आवाज देकर बोला कि पटेल जी अब दिन निकलने वाला है मुर्गा बहुत देर का बांग दे चुका है। अब कौवा और चिरैया भी बोलने लगे हैं। बुलाकी की आवाज सुनकर गंगाराम पटेल आंखें मलते हुए उठ गए थे। इसके बाद गंगाराम तथा बुलाकी ने अपना समाचार नित्य कर्म किया नाश्ता आदि करके अपना सामान संभाला और आबू रोड स्टेशन से मारवाड़ को प्रस्थान किया। यह इलाका रेगिस्तान था, कहीं पर कांटों की झाड़ियां तथा छोटे-छोटे पौधे अवश्य दिखाई दे जाते थे। कहीं कहीं कुछ लोग भेड़ बकरियों को चलाते हुए नजर आ रहे थे। अधिकांश लोग ऊंटों पर सवार होकर चलते थे। स्त्री पुरुष तंदुरुस्त दिखाई देते थे। 

मारवाड़ नगर राजस्थान का प्राचीन प्रसिद्ध नगर है। यह कभी मारवाड़ प्रदेश की राजधानी थी। उन्हें वहां राजा का मारवाड़ी महल देखने को मिला।
एक बाग में गंगाराम पटेल और बुलाखी आकर ठहरे वहां और भी बाहर से आए हुए बहुत से यात्री ठहरे हुए थे। इससे वहां अच्छी चहल-पहल थी। 

गंगाराम पटेल ने बुलाखी को सामान लाने के लिए कुछ रुपए दिए और कहने लगे कि तुम सामान लेकर जल्दी लौटना। क्योंकि यहां रेगिस्तान है, हवा चलने से रेत के ढेर इधर से उधर उड़ जाते हैं और आदमी भी रास्ता भूल जाता है। गंगाराम पटेल से बुलाखी ने कहा मैं ऐसा ही करूंगा। अब सामान लेकर आता हूं। बुलाखी नाई बाग से बाजार को गया और कई दुकानों से अपना काम का सामान खरीद कर वापस आ रहा था। वह इधर उधर देखता भी जाता था कि कोई अजूबा चीज नजर आ जाए। चलते चलते नगर के बाहर आया तो पेड़ के पास बहुत भीड़ लगी देखी। बुलाखी भी वहां चला गया उसने देखा वहां कुछ आदमी खड़े हुए थे। जो राज्य के सिपाही मालूम पढ़ते थे। वहां राजा भी उनके साथ था। वह नीम का पेड़ था और खोखला था। राजा ने उस पेड़ में आग लगवा दी तो पेड़ जलने लगा उसमें से हाय हाय बचाओ बचाओ मैं मरा की आवाजें आ रही थी। सब भीड़ यह देख कर हंस रही थी।

बुलाखी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पेड़ में कोई भूत प्रेत था या किसी आदमी को आग में जिंदा जलाने को राजा ने उस में आग लगवाई थी। वहां से किसी के रोने की आवाज भी आ रही थी। बुलाखी ने विचार किया कि आज की घटना बड़ी अनोखी है। शायद पटेल जी इस घटना को पूरी तरह ना बता सके अपने मन में ऐसे विचार बनाते हुए सामान को लेकर वह उसी बाग में आया जहां पटेल भी उसका काफी देर से इंतजार कर रहे थे। बुलाखी को आता हुआ देखकर गंगाराम पटेल कहने लगे कि आज तो तुम बहुत देर से सामान लेकर लौटे मैं तो समझ रहा था कहीं रास्ता भूल गए। इस शंका में परेशान होकर तुम्हारी राह निहार रहा था। पटेल जी की बात सुनकर वह हंसा और लाया हुआ सामान उनके सामने रख कर कहने लगा। पटेल जी आपने खूब सोंची मै भला कहीं खो भी सकता हूं। मैंने घाट घाट का पानी पिया है मुझे देर इसलिए लगी कि आज मैं एक बड़ी अनोखी बात देखता रह गया।
बुलाखी दास की बात सुनकर पटेल भी मुस्कुराने लगे और बोले।
दोहा
अन्न बिना सब अन्मने, नर नाहर और भूख।
तीनपहर के बीच में, बिगड़ जात सब रूप।।
सो हे बुलाखी भाई इस समय बहुत भूख लगी है। लोगों ने यहां तक कहा है। "भूखे भजनहोय गोपाला, यह लो कंठी माला" भूखे तो भजन भी नहीं हो सकता फिर और बात की क्या?

चलो पहले नित्य की भांति भोजन बनाए खाए। तब चित्त में शांति आएगी। तुम्हारी अजूबी बात का जवाब भी उसके बाद दिया जाएगा। गंगाराम पटेल की बात सुनकर बुलाखी पहले पानी भरकर लाया, बर्तन साफ किए, चूल्हा तैयार करके लाया साग सब्जी बनाकर ठोक दी फिर आटा गूंदा। जब साग सब्जी तैयार हो गई तो पटेल जी को आवाज दी पटेल जी चौका में आकर बैठे बुलाखी रोटी बेलता जाता था और पटेल जी सेंकते जाते थे। इस प्रकार दोनों ने भोजन बनाया खाया फिर बुलाकी ने पटेल जी का बिस्तर लगाया और हुक्का भर कर सामने रखा। वह आराम से हुक्का पीने लगे। जब तक बुलाकी ने बर्तन साफ किए अपना सब सामान संभाला और फिर पटेल जी के पैर दबाने लगा। उसी समय गंगाराम पटेल बुलाखी से कहने लगे कि आज तुमने जो अनोखी बात देखी हो वह बतलाओ तो उसने देखा हुआ सारा हाल बयान कर दिया और बोला अब बताएं यह क्या बात थी?

बुलाकी की बात सुनकर गंगाराम पटेल बोले- एक नगर में मोहन और सोहन दो मित्र थे। दोनों अपना-अपना अलग व्यापार करते थे। मोहन ईमानदार व्यक्ति था। उसके नौकर भी सच्चे थे। जो व्यापार उसने 1000 से शुरू किया 1 साल में ₹50000 का हो गया। सोहन की आदत अच्छी ना थी, वह बेईमान था। इसलिए उसके नौकर भी बेईमानी करने लगे थे। उसने 1 साल में 40000 का नुकसान उठाया। जिससे उसकी हालत खराब हो गई। सोहन एक दिन मोहन से कहने लगा।
दोहा
धन सब घाटे में गया, बंद हुआ व्यापार।
मित्र बताओ किस तरह, मेरा हो उद्धार।।
सोहन की बात सुनकर मोहन कहने लगा तुम मेरे पुराने मित्र हो। अगर व्यापार में धन नष्ट कर दिया तो कोई बात नहीं।
दोहा धन मेरे पास है सुन लो कान लगाय।
साझे में हम तुम दो लेंगे काम चलाय।।
मोहन की बात सुनकर सोहन बहुत प्रसन्न हुआ और बोला तुम धन्य हो। मित्र हो तो ऐसा हो। अब मेरी समझ में आता है कि-
दोहा
चल परदेस में करें, हम दोनों व्यापार।
लाभ में बहुत कमाए धन, मेरा यही विचार।।
सोहन की बात मोहन ने मान ली और उसके साथ परदेश को व्यापार करने के लिए चल दिया। दोनों ने परदेस में जाकर चित्त लगाकर परिश्रम से अपना व्यापार शुरू किया। दोनों ने बाहर की यात्रा भी कर ली और धन भी कमाया। बहुत पुरानी कहावत है कि कुछ भी करो "कुत्ते की पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी रहती है"। जिसकी जो आदत पड़ जाती है। वह छूटती नहीं सोहन तो बेईमानी करने वाला आदमी था। वह परदेस में मौका देखा करता था। कि कब मोहन को जान से मार कर उसका सब धन हड़प ले। परंतु मोहन के नौकर स्वामी भक्त थे। इसलिए सोहन अपनी योजना में सफल नहीं हो पाया था। वह दिखावटी बातों में तो मोहन से भोली भाली बातें करता था। मगर उसके मन में कपट की कतरनी चलती रहती थी।

मोहन बहुत सीधा आदमी था। वह यह समझ भी नहीं पाया कि सोहन के विचार इतने गंदे भी होंगे। परंतु मोहन के नौकरों ने उसे एकांत में बताया कि सोहन के विचार बुरे हैं और किसी ना किसी दिन आपको अवश्य धोखा देगा। हम आपको सचेत कर रहे हैं। मोहन ने अपने सेवकों से ऐसी बात सुनी तो उसमें सोहन के साझे में व्यापार खत्म करना ही ठीक समझा। अब मोहन के पास कुल मिलाकर ₹200000 हो चुका था। मोहन सोहन से कहने लगा।
दोहा
बहुत दिनों परदेस में दीने मित्र बिताय।
बहुत दिनों से है रही, घर की याद सताय।।
इतनी बात सुन सोहन कहने लगा-
दोहा
जो इच्छा हो आपकी तो मुझको स्वीकार।
सभी भक्तों से आपके संग में हूं तैयार।।
सोहन की बात सुनकर मोहन बोला- हे मित्र परमेश्वर ने और भाग्य ने बड़ा साथ दिया इस प्रकार यहां आकर दो लाख कमाया। अब हम तुम दोनों एक एक लाख बंटेंगे और अपने घर चल कर कुछ समय चैन से बैठेंगे। सोहन बोला रुपए बांटने की ऐसी जल्दी क्या है, घर चलना है चलो वहीं बांट लिया जावेगा। मोहन यह बात सुनकर राजी हो गया और सोहन को साथ लेकर धन समेत अपने नगर को वापस आ गया।

नगर में  पहले सोहन का मकान पड़ता था। इसलिए सब धन को लेकर मोहन सोहन के मकान पर गया। कुछ देर बैठने के बाद मोहन ने सोहन से जाने का विचार किया और सोहन को धन बांटने को कहा। सोहन बोला ऐसी जल्दी क्या है? जो कि हम धन बांटने की परेशानी करें। अभी रात है कल दिन में बांट लेंगे। तब मोहन विश्वास करके सब धन वहीं छोड़ कर अपने घर चला गया। दो-तीन दिन के बाद मोहन सोहन के यहां आया और उसने धन बांटने की बात कही। उस समय सोहन ने उससे साफ कह दिया कि अपने हिस्से का धन तो पहले ही तुम ले गए थे। मेरे पास तुम्हारा कुछ नहीं है। मोहन दुखी होकर अपने घर चला आया फिर बाद में एकदिन नगर के प्रतिष्ठित लोगों की पंचायत जोड़ी। उसमें भी सोहन ने साफ इंकार कर दिया। सब बातचीत मोहन और सोहन के बीच में थी कोई गवाह नहीं था। जो पंचायत वाले ठीक फैसला करते।

अंत में मोहन ने राजा के पास जाकर न्याय की प्रार्थना की। राजा ने सोहन को बुलाकर कहा कि तुम मोहन का एक लाख रुपया क्यों नहीं देते। सोहन ने कहा कि मैंने सोते समय ही मरघट के पास वाले नीम के पेड़ के पास रुपया मोहन को दे दिया था। यह रुपयों का झूठा दोष मेरे ऊपर लगाता है। राजा ने कहा कि तुम लोगों का कोई गवाह भी है। मोहन ने उत्तर दिया कि हमारा गवाह कोई नहीं है। किंतु सोहन कहने लगा मैं उस पेड़ से गवाही दिलवा दूंगा। दूसरे दिन राजा ने पेड़ की गवाही देने का निश्चय किया मोहन और सोहन अपने अपने घर चले आए घर आकर सोहन ने अपने बाप को सिखा कर रात में ही उस पेड़ की खोह में बिठा दिया और कहा कि जब राजा पूछे तो कह देना। कि यहां एक लाख सोहन ने मोहन को दिया था।

दूसरे दिन राजा दरबारियों तथा मोहन के साथ उस पेड़ के पास गए और कहा। तू सच बता कि क्या सोहन ने मोहन को एक लाख रुपये दिया था। पेड़ से आवाज आई हां दिया था। मोहन ने सोहन के बाप की आवाज पहचान ली तो राजा से कान में कहा कि यह सोहन के पिता की आवाज है। राजा सोहन की बेईमानी पर बहुत क्रोध आया। उसने उस पेड़ में आग लगा दी जिसमें जलकर उसका बाप रो रो कर मर गया। तब राजा ने सोहन से मोहन का एक लाख रुपया भी दिला दिया। और कहा बेईमानी बहुत बुरी चीज है। उसका फल बहुत बुरा होता है। हे बुलाखी नाई! तुम यही घटना आज देख कर आए हो अब सो जाओ रात अधिक हो गई है सवेरे जल्दी जागना है।

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